कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महिला द्वारा एक पुरुष के खिलाफ दायर रेप की शिकायत को रद्द कर दिया, और यह दोहराया कि वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने रिश्तों को बाद में अपराध नहीं माना जा सकता। मामले की सुनवाई करते हुए जज ने कहा कि दिल टूटना दुखद है पर उसे अपराध नहीं माना जा सकता।

मामले में टिप्पणी करते हुए जज ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने कहा, “जहां दो वयस्क अपनी मर्जी से, लंबे समय तक आपसी सहमति से यौन संबंध बनाते हैं, तो बाद में अगर पुरुष उस महिला से शादी करने से मना कर देता है – भले ही यह कितना भी दुखद क्यों न हो – तो भी यह बात अपने आप में उस करीबी रिश्ते को IPC की धारा 376 के तहत दंडनीय रेप के अपराध में नहीं बदल देती।”

बता दें कि दोनों पक्ष आयरलैंड में मिले थे और दो साल तक रिश्ते में रहे थे। शिकायतकर्ता पहले एक मुश्किल शादी में थी और उसका एक 7 साल का बच्चा भी है। तलाक के बाद, वह आरोपी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगी। बाद में, यह रिश्ता ठीक से नहीं चल पाया, और जब आरोपी भारत आया, तो उसने शिकायतकर्ता से बातचीत बंद कर दी।

‘कानून दिल टूटने को अपराध नहीं मानता’

यह देखते हुए कि यह रिश्ता विदेश में बना था, कोर्ट ने कहा, “पूरी शिकायत को पढ़ने पर उसमें कहीं भी जबरदस्ती, शुरुआत में कोई धोखा, या बल प्रयोग की बात सामने नहीं आती। इसमें साथ रहने, एक ही घर में रहने, घरेलू जिम्मेदारियां बांटने और 2 साल तक आपसी सहमति से बने करीबी रिश्ते की बात कही गई है… यह करीबी रिश्ता आयरलैंड में बना, साथ रहना आयरलैंड में हुआ, और साझा जीवन भी आयरलैंड में ही बीता। इसके बाद जो हुआ, वह हिंसा का आरोप नहीं है, बल्कि विश्वासघात का आरोप है। इसलिए, यह शुरुआत से ही धोखे के आधार पर यौन संबंध बनाने का मामला नहीं है; यह एक जानी-मानी बात है कि ‘कानून दिल टूटने को अपराध नहीं मानता’।”

कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि शादी का वादा तभी झूठा माना जाता है, जब वह इस इरादे से किया गया हो कि उसे कभी पूरा नहीं किया जाएगा।

जज ने कहा, “कानून की नजर में शादी का वादा तभी ‘झूठा’ माना जाता है, जब यह साबित हो जाए कि वह वादा महज एक बहाना, एक धोखेबाज चाल थी, जिसे पूरा करने का कोई इरादा ही नहीं था। बाद में मन बदल जाना, भावनात्मक असंगति, परिवार का विरोध, या महज अनिच्छा – ये बातें शुरुआत में मौजूद आपराधिक इरादे में तब्दील नहीं हो जातीं।”

हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते

शिकायत पर आगे की जांच को रद्द करते हुए, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि आपराधिक न्याय प्रणाली को टूटे हुए रिश्तों से जुड़े विवादों में एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। “आपराधिक न्याय प्रणाली राज्य की शक्ति का एक साधन है; इसे असफल रिश्तों से उत्पन्न होने वाले निजी विवादों में एक हथियार बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। तथ्य, भले ही उन्हें पूरी तरह से स्वीकार कर लिया जाए, एक ऐसे रिश्ते के अलावा और कुछ भी जाहिर नहीं करते जो विवाह में परिणत नहीं हुआ। ऐसी परिस्थितियों में जांच की अनुमति देना न्याय को आगे नहीं बढ़ाएगा, बल्कि उसे विकृत कर देगा।”

जानकारी अनुसार इस मामले में आरोपी का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता विक्रम हुइलगोल और अधिवक्ता मोहन कुमार जी ने किया। राज्य का प्रतिनिधित्व अतिरिक्त विशेष लोक अभियोजक अधिवक्ता बी.एन. जगदीश ने किया। शिकायतकर्ता का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता परमेश्वरप्पा सी. ने किया।

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