महाराष्ट्र ने हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सामने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की फंडिंग में हो रही देरी को लेकर गंभीर चिंता जताई है। राज्य के अधिकारियों ने इस हफ्ते हुई बैठक में बताया कि पिछले दो वित्तीय वर्षों में पेंडिंग पड़ी राशि 1,800 करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुकी है। इतनी बड़ी राशि के लंबित होने के कारण राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, वित्तिय वर्ष 2024-25 के करीब 800-840 करोड़ रुपये अब तक जारी नहीं किए गए हैं। जबकि वित्तिय वर्ष 2025-26 में भी 1,058 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि लंबित है। यह मुद्दा 26 मई को नई दिल्ली में हुई बैठक में उठाया गया, जहां महाराष्ट्र सरकार ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सामने अपना वार्षिक प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन प्लान पेश किया।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन केंद्र सरकार की प्रमुख स्वास्थ्य योजना है, जिसके तहत मातृ स्वास्थ्य सेवाएं, ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम, आशा कार्यकर्ता, एंबुलेंस सेवाएं और संविदा पर नियुक्त मेडिकल स्टाफ जैसी व्यवस्थाओं के लिए राज्यों को फंड दिया जाता है।

अगले वित्तीय वर्ष पर आ गया बोझ

अधिकारियों का कहना है कि पिछले वर्षों में मंजूर कई स्वास्थ्य प्रोजेक्ट अब “कैरी-फॉरवर्ड देनदारियों” में बदल गए हैं। यानी जिन योजनाओं के लिए पैसा मंजूर हुआ था, उनका भुगतान समय पर नहीं हुआ और अब उनका बोझ अगले वित्तीय वर्ष पर आ गया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “फंड जारी होने में देरी के कारण 1,800 करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया हो गया है, जिससे महाराष्ट्र में एनएचएम के तहत भारी वित्तीय दबाव पैदा हो गया है।”

स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि राज्य सरकार ने 26 मई की बैठक में अपनी सभी चिंताएं केंद्र के सामने रख दी हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों से फंड लंबित हैं और कई योजनाएं सिर्फ इसलिए अधूरी हैं क्योंकि पैसा समय पर नहीं मिला।

कैसे काम करती है एनएचएम की फंडिंग?

एनएचएम के तहत कुल फंड का 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देती है और 40 प्रतिशत राज्य सरकार। लेकिन अधिकारियों के मुताबिक, जब तक केंद्र अपनी मंजूरी जारी नहीं करता, तब तक राज्य भी अपना हिस्सा जारी नहीं कर सकता। एक अधिकारी ने कहा, “केंद्र से 60 प्रतिशत हिस्से का आदेश आए बिना राज्य अपनी 40 प्रतिशत राशि जारी नहीं कर सकता।”

अधिकारियों के अनुसार फंड में देरी का असर अब कई जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं पर दिखने लगा है। संविदा पर काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों का वेतन, जरूरी दवाइयों की खरीद, डायग्नोस्टिक सेवाएं, एंबुलेंस भुगतान, ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य कार्यक्रम इन सेवाओं में शामिल हैं।

नंदुरबार जिले में ही एनएचएम से जुड़ी लंबित देनदारियां 4.08 करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुकी हैं।
एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हम रोजाना सप्लायर्स से अनुरोध कर रहे हैं कि वे सेवाएं बंद न करें क्योंकि इससे मरीजों की देखभाल सीधे प्रभावित होगी।” उन्होंने कहा कि कई बार अधिकारियों को अपनी जेब से पैसे लगाकर डीजल भरवाना पड़ा ताकि दवाइयों की वैन पुणे से ग्रामीण अस्पतालों तक पहुंच सके।

आशा कार्यकर्ताओं का वेतन भी अटका

राज्य में लगभग 45,000 एनएचएम कर्मचारी हैं, जिनमें आशा कार्यकर्ता, डॉक्टर, नर्स, ANM, टेक्नीशियन, काउंसलर और एंबुलेंस स्टाफ शामिल हैं। मजदूर संगठनों और आशा कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कई महीनों से वेतन नहीं मिला है। CITU की राज्य उपाध्यक्ष शुभा शमीम ने कहा, “आशा कार्यकर्ताओं को छह महीने से वेतन नहीं मिला है।” उन्होंने बताया कि 1 जून से मुंबई के आजाद मैदान में प्रदर्शन किया जाएगा।

हालांकि वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि विभाग बाद में मिलने वाली किश्तों से वेतन भुगतान को संभालने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में मिले 1,138 करोड़ रुपये में से करीब 850 करोड़ रुपये पुराने बकाए चुकाने में खर्च कर दिए गए।

अब सिर्फ जरूरी सेवाओं को प्राथमिकता

अधिकारियों के मुताबिक विभाग अब केवल सबसे जरूरी सेवाओं को प्राथमिकता दे रहा है। एक अधिकारी ने कहा, “एंबुलेंस, दवाइयों की सप्लाई और इमरजेंसी सेवाएं बंद नहीं हो सकतीं। इसलिए फिलहाल एजेंसियों और वेंडरों का भुगतान टालकर किसी तरह मरीजों की सेवाएं जारी रखी जा रही हैं।” अधिकारियों को उम्मीद है कि अगर जून या जुलाई तक एनएचएम की अगली किस्त जारी हो गई तो स्थिति कुछ सामान्य हो सकती है।

यब भी पढ़ें – मप्र: सीधी में 12 महीने में 53 महिलाओं की प्रसव संबंधी कारणों से मौत, मातृ मृत्यु दर ने खोली स्वास्थ्य विभाग की नाकामी की पोल

मध्य प्रदेश का सीधी जिला इनदिनों स्वास्थ्य विभाग के स्कैनर तले है। वजह – मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality Rate)। जिले में मातृ मृत्यु दर घटते नहीं दिख रही, जिस कारण अब विभाग ने संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। साथ ही यह पता लगाने कि कोशिश की जा रही है कि आखिर क्या वजह है कि राज्य में मातृ मृत्यु दर घटने के बावजूद जिला इस ‘दंश’ से उबर नहीं पा रहा है। पूरी खबर पढ़ें….