Jharkhand Air Ambulance Crash News: झारखंड के लातेहार में अपने रेस्टोरेंट में शॉर्ट सर्किट के कारण लगी आग में घायल हुए संजय कुमार को जब 16 फरवरी को रांची के देवकमल अस्पताल में लाया गया, तो उनकी हालत गंभीर थी और वे 60-65% तक जल चुके थे। अस्पताल के सीईओ डॉ अनंत सिन्हा ने कहा कि उनके अस्पताल के डॉक्टरों ने परिवार के साथ ईमानदारी बरती। उन्होंने कहा, “60-65% जलने की स्थिति में, जिंदा रहने की कोई गारंटी नहीं होती। परिवार अक्सर बड़े केंद्रों में दूसरा विकल्प तलाशते हैं।”
संजय के परिवार ने भी ठीक यही किया। रिश्तेदारों की मदद से झटपट 8 लाख रुपये जुटाकर परिवार ने कुमार को एयर एंबुलेंस से दिल्ली के गंगा राम अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की। हालांकि, सोमवार शाम को मरीज को लेकर रांची से उड़ान भरने के तुरंत बाद विमान झारखंड के चतरा जिले के घने जंगलों में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में सवार सभी सात लोगों की मौत हो गई।
8 लाख रुपये की फीस जुटाने के लिए काफी मशक्कत की
विमान में संजय, उनकी पत्नी अर्चना देवी (35) और उनकी बहन का 17 साल का बेटा ध्रुव कुमार सवार थे। एयर एंबुलेंस में सवार यात्रियों में 32 साल के डॉक्टर विकास कुमार गुप्ता और पैरामेडिक सचिन कुमार मिश्रा भी शामिल थे। पायलट विवेक विकास भगत (27) और सवराजदीप सिंह (30) थे। दुर्घटना के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। मरीज के छोटे भाई सुजीत कुमार ने बताया कि रांची के अस्पताल में संजय की हालत में उम्मीद के मुताबिक सुधार नहीं होने के बाद परिवार ने एयर एंबुलेंस के लिए 8 लाख रुपये की फीस जुटाने के लिए काफी मशक्कत की।
सुजीत कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “उन्हें रांची के देवकमल अस्पताल ले जाया गया। कुछ दिनों बाद, हमें लगा कि उनकी हालत में उम्मीद के मुताबिक सुधार नहीं हो रहा है, इसलिए हमने बेहतर इलाज के लिए उन्हें दिल्ली ले जाने का फैसला किया।” उन्होंने आगे कहा, “हमने तुरंत परिवार से 5 लाख रुपये का इंतजाम किया। लेकिन कंपनी ने कहा कि पूरा भुगतान किए बिना वे उड़ान नहीं भरेंगे। उसके बाद, हमारे चाचा ने किसी तरह बाकी के 3 लाख रुपये का इंतजाम किया।” इस हादसे में परिवार के तीन सदस्यों की जान चली गई। सुजीत ने बताया कि संजय कुमार और उनकी पत्नी अर्चना देवी अपने पीछे आठ साल का बेटा छोड़ गए हैं।
देवकमल अस्पताल के सीईओ सिन्हा ने कहा कि संजय को गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था, लेकिन वहां के डॉक्टरों ने उन्हें स्थिर करने और सदमे से बाहर निकालने में कामयाबी हासिल की। सिन्हा ने कहा, “लेकिन इतने गंभीर जलने के मामलों में स्थिति हमेशा ही गंभीर होती है। हमने परिवार को सूचित कर दिया था कि इलाज में कम से कम तीन हफ्ते लगेंगे। स्थिति 50-50 थी, फिर भी हमें लगा कि हम उसे बचाने की पूरी कोशिश कर सकते हैं।”
हालांकि, परिवार उन्हें दिल्ली ले जाने के लिए उत्सुक था। सिन्हा ने बताया, “उनका मानना था कि सड़क के रास्ते से इतनी गंभीर हालत वाले मरीज को ले जाने में बहुत ज्यादा समय लगेगा—15 से 16 घंटे। सोमवार को दोपहर करीब 1:30-2 बजे हमें सूचना मिली कि एयर एंबुलेंस का इंतजाम कर दिया गया है।” उन्होंने बताया कि ऐसे में आमतौर पर एक पैरामेडिक और एक डॉक्टर शामिल होते हैं। परिवार ने रांची सदर अस्पताल से डॉक्टर विकास कुमार गुप्ता को संजय के साथ विमान में भेजने की व्यवस्था की।
डॉ. गुप्ता के पिता बजरंग प्रसाद ने बताया कि उनके बेटे ने 2015 में ओडिशा के कटक से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और बाद में उनकी पोस्टिंग रांची में हुई। मूल रूप से बिहार के औरंगाबाद जिले के मानिका के रहने वाले गुप्ता रांची में अपनी पत्नी और आठ साल के बेटे के साथ रहते थे। बजरंग प्रसाद ने कहा, “वह हमेशा मदद के लिए तत्पर रहते थे। हमने उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने और अपना करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। हमने कभी ऐसी कल्पना भी नहीं की थी। वह अपने जीवन के सबसे अच्छे दौर में थे, दिन-रात मरीजों की सेवा कर रहे थे। सब कुछ एक पल में खत्म हो गया।”
परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य
विमान में मौजूद अन्य पैरामेडिक सचिन मिश्रा थे। 22 साल के सचिन के बड़े भाई विनीत ने बताया कि उन्होंने दुर्घटना से ठीक एक दिन पहले सचिन से बात की थी। सचिन ने लगभग डेढ़ साल तक एक मेडिकल एविएशन कंपनी में पैरामेडिक के रूप में काम किया और वह एयर एंबुलेंस क्रू का हिस्सा थे जो देश भर के अस्पतालों में मरीजों को ले जाते थे। मूल रूप से बिहार के सिवान जिले के रहने वाले, वे झारखंड में रहते थे और जमशेदपुर में किराए के मकान में रहते थे।
अपनी आखिरी बातचीत को याद करते हुए विनीत ने बताया कि सचिन ने हाल ही में हाईयर ग्रेड क्वालिफिकेशन के लिए मेडिकल फील्ड का एग्जाम दिया था। विनी ने कहा, “परिणाम अगले दिन घोषित होने वाला था। मेरे पास उसका रोल नंबर और रोल कोड था, इसलिए मैंने ऑनलाइन चेक किया। वह पास हो गया था। मैंने सोचा कि उसे फोन करके बधाई दूं।”
जब उन्होंने फोन करने की कोशिश की, तो सचिन ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा, “मैंने एक-दो बार फोन किया, फिर पांच-छह बार, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। बाद में मुझे मेडिकल कंपनी से फोन आया जिसमें मुझे बताया गया कि मेरे भाई का निधन हो गया है।” विनीत के अनुसार, सचिन अविवाहित थे और परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे। उनके पिता का 2005 में निधन हो गया था। विनीत ने बताया, “पिता की मृत्यु के बाद, मैंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और उन्हें अपने बेटे की तरह पाला। मैंने उन्हें पढ़ाया-लिखाया ताकि वे अपना करियर बना सकें।” उन्होंने आगे कहा, “वह हम सभी का सहारा थे।”
प्रतिभाशाली छात्र
विमान के दो पायलटों में से एक विवेक विकास भगत के पिता ने दिल्ली में अपनी चाची को फोन करके बताया था कि वह सोमवार रात को वहां पहुंचेंगे। देव सहाय ने बताया, “उन्होंने चाची से खाना तैयार रखने को कहा और बताया कि वह रात तक घर आ जाएंगे। चाची ने खाना तैयार रखा और रात करीब 12 बजे तक इंतजार करती रहीं, उन्हें पता नहीं था कि क्या हुआ है।”
विवेक एक आदिवासी परिवार से थे और उनके पिता सहाय इंजीनियर हैं। सहाय ने बताया कि विवेक ने कानपुर में चार साल की एविएशन ट्रेनिंग पूरी की थी। कोर्स पूरा करने के बाद, वे टाइप-रेटिंग प्रोग्राम के लिए दक्षिण अफ्रीका गए। सहाय ने कहा, “भारत लौटने के बाद उन्होंने सितंबर 2022 से विमान उड़ाना शुरू किया।”
विवेक को प्रतिभाशाली बताते हुए सहाय ने कहा कि उसने पांच पायलट पेपर को एक ही बार में पास कर लिए थे। दुर्घटना के बारे में पता चलने की कहानी सुनाते हुए सहाय ने बताया कि उस रात उनका फोन साइलेंट मोड पर था। उन्होंने कहा, “लगभग 1:30 बजे मेरी नींद खुली और मैंने देखा कि कई मिस्ड कॉल आए हुए थे। मुझे तुरंत ही कुछ गड़बड़ महसूस हुई।” इसके बाद वे एक ड्राइवर के साथ दुर्घटनास्थल के लिए रवाना हुए। उन्होंने बताया, “वहां पूरा जिला प्रशासन –डीसी , एसपी और अन्य अधिकारी मौजूद थे। उन्हें शुरू में पता नहीं था कि पायलटों में से एक मेरा बेटा है। जब मैं वहां पहुंचा, तब जाकर बात साफ हुई।”
उन्होंने खुद मलबे को देखा। उनके अनुसार, विमान में आग नहीं लगी थी। उन्होंने कहा, “पायलटों ने जलने से बचाने या यात्रियों पर दुर्घटना के प्रभाव को कम करने के लिए फ्यूल खाली कर दिया था। इसी वजह से कोई बड़ी आग नहीं लगी। विमान पूरी तरह से जला नहीं था और कोई भी झुलसा नहीं था।”
अमृतसर का पूरा इलाका सदमे में
विमान के दूसरे पायलट, सवराजदीप सिंह, पंजाब के अमृतसर के गोविंद नगर इलाके के रहने वाले थे। पिछले 15 सालों से सवराजदीप के घनिष्ठ मित्र रहे सिमरनदीप सिंह ने बताया, “जब रात करीब 11:30 बजे फोन आया, तब यह स्पष्ट नहीं था कि वास्तव में क्या हुआ था। हमें नहीं पता था कि वह सुरक्षित हैं या नहीं। हम उम्मीद लगाए बैठे रहे।” उन्होंने आगे कहा, “लगभग 2:30 बजे परिवार को उनकी मृत्यु की सूचना मिली। यह इतना दुखद है कि हमारे पास अपने शोक को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं।” सवराजदीप के परिवार में उनकी पत्नी, तीन महीने का बेटा, माता-पिता और भाई हैं।
दिनभर, शहर और आसपास के इलाकों से रिश्तेदार, पड़ोसी और शुभचिंतक शोक संतप्त परिवार से मिलने आते रहे। घर का माहौल असहनीय शोक से भरा हुआ था। सवराजदीप की युवा पत्नी रिश्तेदारों से घिरी बैठी अपने नवजात बेटे को गोद में लिए हुए थी, जबकि उसके माता-पिता इस भयावह खबर को स्वीकार करने की कोशिश कर रहे थे।
बचाव अभियान में करनी पड़ी मशक्कत
चतरा के जिला अस्पताल में पोस्टमार्टम विभाग की देखरेख कर रहे अधिकारी नीरज कुमार ने बताया कि प्रशासन को सोमवार रात करीब 9 बजे दुर्घटना की सूचना मिली। उन्होंने बताया कि बचाव और राहत कार्यों के लिए अस्पताल की एक टीम को तुरंत भेजा गया। हालांकि, दुर्घटनास्थल घने और खतरनाक जंगल क्षेत्र के अंदर मौजूद था। वहां पर पहुंचने का रास्ता बहुत ही ज्यादा संकरा था।
उन्होंने कहा, “जंगल की स्थिति की वजह से एंबुलेंस जंगल में नहीं घुस सकी। चतरा जिले से कुछ एंबुलेंस और लातेहार जिले से कुछ एंबुलेंस की व्यवस्था की गई, लेकिन वे भी अंदर नहीं जा सकीं। इसलिए, घटनास्थल तक पहुंचने के लिए पिकअप सहित छोटे वाहनों की व्यवस्था की गई।” कुमार के अनुसार, बचाव अभियान पूरी रात जारी रहा। उन्होंने बताया, “रात भर में छह शव बरामद किए गए। आखिरी शव सुबह तड़के मिला। सुबह करीब 6:30 बजे, आखिरी शव मिलने के बाद, सभी शवों को अस्पताल ले जाया गया।” उन्होंने आगे कहा कि पोस्टमार्टम शुरू होने तक पीड़ितों के ज्यादातर परिवार वाले अस्पताल पहुंच चुके थे।
कुमार ने कहा कि दुर्घटना की भयावहता के बावजूद, शवों पर जलने के कोई निशान नहीं थे। उन्होंने कहा, “हमारी जानकारी के अनुसार, कोई बड़ी आग नहीं लगी थी।” पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शवों को उनके संबंधित परिवारों को सौंप दिया गया।
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झारखंड में चतरा जिले के कर्माटाड जंगल में सोमवार शाम एक चार्टर्ड एअर एंबुलेंस के हादसे का शिकार होने और उसमें सभी सात लोगों की मौत ने एक बार फिर इस सवाल को गहरा किया है कि क्या दिनोंदिन विमान सेवाएं असुरक्षित होती जा रही हैं। पूरी खबर यहां क्लिक कर पढ़ें…
