टेक प्रोफेशनल अरुण कुमार तिवारी की पिछले हफ्ते माउंट एवरेस्ट से उतरते समय हिलेरी स्टेप के पास मौत हो गई थी। वह हैदराबाद के रहने वाले थे। उनके परिवार ने अरुण कुमार तिवारी का शव पहाड़ पर ही छोड़ने का फैसला किया है। अरुण कुमार तिवारी को पहाड़ों से ज्यादा कुछ भी प्यारा नहीं था।
अरुण कुमार तिवारी ने पिछले लगभग दो दशकों में किलिमंजारो, डेनाली और कंचनजंगा की चोटियों को सफलतापूर्वक फतह कर चुके हैं। अरुण कुमार के जीजा सुधीर उपाध्याय ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ““उन्हें एक आईटी प्रोफेशनल के तौर पर अपना काम बहुत पसंद था, लेकिन पहाड़ों से उन्हें उससे भी ज्यादा प्यार था। उन्होंने अर्जेंटीना और रूस में भी चढ़ाइयां की थीं।”
उन्होंने आगे कहा, “पिछले साल एक असफल प्रयास के बाद एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने का उनका इरादा और भी पक्का हो गया था। यही वह जगह है जहां उन्हें रहना सबसे ज्यादा पसंद था और यहीं हम उन्हें छोड़ रहे हैं।”
डेथ जोन के पास बिगड़ गई हालत
अभियान के ऑर्गेनाइजर के मुताबिक, जब तिवारी ने 21 मई को चोटी पर चढ़ाई पूरी की थी, तब वे पहले से ही कमजोर थे और हिलेरी स्टेप के पास पहुंचने पर उनकी सेहत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। इस इलाके को डेथ जोन भी कहा जाता है। हैदराबाद की एक आईटी कंपनी में सीनियर डायरेक्टर तिवारी ने 30 साल की उम्र में ही पहाड़ों पर चढ़ना शुरू कर दिया था। उपाध्याय उन्हें एक हंसमुख इंसान बताते हैं। वह अपने परिवार और नौकरी के प्रति बहुत समर्पित थे।
पत्नी और दो बेटियों के लिए बहुत मुश्किल था फैसला
अरुण की पत्नी और दो बेटियों के लिए यह फैसला बहुत मुश्किल था। उपाध्याय ने कहा, “इस फैसले की एक वजह यह थी कि उन्हें हिमालय से बहुत प्यार था। यह भगवान शिव का घर, देवभूमि और वैकुंठधाम है। अब वह भगवान शिव के साथ हैं। वह पहाड़ों में ही समा गए हैं।”
लेकिन एक और भी मजबूत वजह है, अगर शव को नीचे लाया जाता, तो उसकी हालत कैसी होती। उपाध्याय ने कहा, “बर्फ की वजह से, शव को निकालने के लिए टीम को बर्फ को काटना और तोड़ना पड़ेगा क्योंकि -63 डिग्री तापमान में शव अकड़ गया होगा, इसलिए वह टूट जाएगा और हड्डियां भी टूट सकती हैं। एक बार शव मिल जाने पर, उसे एक स्लेज से बांधकर कैंप 4 से कैंप 1 तक घसीटकर नीचे लाया जाएगा। हम नहीं चाहते कि उसके साथ इस तरह का अनादर हो।”
परिवार ने अपना फैसला हैदराबाद की कंपनी ‘बूट्स एंड क्रैम्पॉन्स’ के सह-संस्थापक भरत थामिनेनी को बताया। इसी कंपनी ने तिवारी के एवरेस्ट अभियान का आयोजन किया था। भरत ने कहा, “उनके परिवार ने हमें उसी दिन (21 मई) जानकारी दी। उन्होंने पहाड़ों के प्रति उनके प्रेम और हिमालय को लेकर उनकी मान्यताओं का जिक्र किया।”
2025 में तिवारी को 7200 मीटर की ऊंचाई पर चढ़ाई करते समय बीमार पड़ने के कारण अपनी चढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी। इस बार, उन्होंने चढ़ाई पूरी करने की जिद की। हालांकि, जब उन्हें अस्वस्थ महसूस होने लगा तो उनके शेरपा गाइडों ने उन्हें कैंप लौटने को कहा था।
एक अन्य पर्वतारोही संदीप अरे की भी एवरेस्ट पर मृत्यु हो गई। मूल रूप से आंध्र प्रदेश के रहने वाले, लेकिन बेंगलुरु में बसे अरे ने भी एवरेस्ट फतह किया था, लेकिन तिवारी की ही तरह, नीचे उतरते समय उन्हें भी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आ गईं। उनकी मृत्यु कैंप 2 के पास हुई।
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वर्ष 2017 में महज 20 साल की उम्र में दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट को फतह करने वाले मध्यप्रदेश के पर्वतारोही मधुसूदन पाटीदार ने गुरुवार 7 अगस्त 2025 को आरोप लगाया कि अफसरों की अनदेखी से वह राज्य के सबसे बड़े खेल अलंकरण ‘विक्रम पुरस्कार’ से चूक गए। पाटीदार की याचिका पर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली राज्य की अन्य पर्वतारोही भावना डेहरिया को साहसिक खेलों की श्रेणी में वर्ष 2023 का विक्रम पुरस्कार प्रदान किए जाने पर मंगलवार (5 अगस्त) को अंतरिम रोक लगा दी थी। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…
