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हरियाणा में दलबदलुओं से भाजपा की हालत पतली

विवेक सक्सेना नई दिल्ली। हरियाणा में सरकार बनाने का सपने देख रही भाजपा की स्थिति हास्यास्पद हो गई है। जहां उसने अब तक अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तक घोषित नहीं किया है, वहीं दूसरी ओर उसका असली मुकाबला अपने ही नाराज नेताओं से है। भाजपा के एक तिहाई से ज्यादा उम्मीदवार ऐसे हैं जिन्होने […]

Author October 1, 2014 09:03 am
राजस्थान में भाजपा सरकार और संगठन की बिगड़ती छवि से पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व खासा चिंतित

विवेक सक्सेना

नई दिल्ली। हरियाणा में सरकार बनाने का सपने देख रही भाजपा की स्थिति हास्यास्पद हो गई है। जहां उसने अब तक अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तक घोषित नहीं किया है, वहीं दूसरी ओर उसका असली मुकाबला अपने ही नाराज नेताओं से है। भाजपा के एक तिहाई से ज्यादा उम्मीदवार ऐसे हैं जिन्होने हाल ही में दलबदल किया था। जबकि कुछ महीने पहले दलबदल करने वाले नेता पार्टी में हुई अपनी उपेक्षा से काफी नाराज हैं।
अगर यह कहा जाए कि केंद्र में सरकार बनाने के बाद हरियाणा में अपने बलबूते सरकार बनाने की रणनीति में जुटी भाजपा का असली मुकाबला अपने ही असंतुष्ट नेताओं से है, तो कुछ गलत नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि विधानसभा की 90 सीटों पर होने वाले चुनाव के लिए 100 से ज्यादा असंतुष्टों ने परचा भर दिया है। बुधवार को नाम वापस लेने की आखिरी तारीख है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पूरी कोशिश कर रहे हैं कि ज्यादा से ज्यादा असंतुष्ट नाम वापस ले लें। उन्होंने प्रदेश में हाल की जनसभाओं के बाद राज्य के पार्टी नेताओं से इस बारे में बात भी की, पर अभी तक उन्हें कोई खास कामयाबी नहीं मिली है।

बड़खल से चंदर भाटिया, गुलाचीका से फूल सिंह से लेकर सुरिदंर सिंह बरवाला सरीखे दिग्गज नेताओं ने बगावत कर दी है। सरिंदर सिंह तो बरवाला से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। मालूम हो कि वे हिसार से दो बार लोकसभा सांसद व देवीलाल और ओम प्रकाश चौटाला की सरकारों में मंत्री भी रह चुके हैं। यमुना नगर, हिसार, पानीपत, करनाल, रिवाड़ी, गुड़गांव हर जगह पार्टी नेताओं ने टिकट वितरण पर नाराजगी जताई है।

भाजपा नेताओं में यह चर्चा आम है कि पार्टी ने जानबूझ कर सावित्री जिंदल के खिलाफ बहुत कमजोर उम्मीदवार डा. कमल गुप्ता को खड़ा किया। इस सीट पर जी चैनल के मालिक सुभाष चंद्रा चुनाव लड़ना चाहते थे जो हर तरह से उनका मुकाबला कर सकते थे। पर हाईकमान ने सावित्री जिंदल की राह आसान कर दी। यही स्थिति अंबाला में भी है। वहां विनोद शर्मा के खिलाफ बाहरी उम्मीदवार दिया गया, ताकि उन्हें जीतने में दिक्कत न हो।

हरियाणा के भाजपा नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी पर पहले से ही बनियों व शहरी लोगोें की पार्टी होने का ठप्पा लगा है। इस कृषि प्रधान राज्य में मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा ने केंद्र की राजग सरकार पर किसानों की अनदेखी करने का जो अभियान छेड़ा है, वह भाजपा को बहुत भारी पड़ सकता है। मालूम हो कि मुख्यमंत्री हुड्डा ने हाल में ही धान बाहुल्य तरावड़ी व चीका इलाकों में जनसभाओं को संबोधित करते हुए यह आरोप लगाया कि जब उन्होने केंद्र सरकार को धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए पत्र लिखा तो उन्हें जवाब दिया गया कि किसानों को पहले से ही पर्याप्त मूल्य मिल रहा है। उन्होंने यह संकेत भी दिया कि वे किसानों के हित में कोई कड़ा कदम उठा सकते हैं। भाजपा के पास इस आरोप का कोई जवाब ही नहीं है, क्योंकि सरकार की ओर से पत्राचार जारी कर दिया गया है।

दूसरी ओर पिछले कुछ महीनों में भाजपा में शामिल हुए कांग्रेस सहित दूसरे दलों के नेता अपनी उपेक्षा से नाराज हैं। कांग्रेस में दशकों से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार रहे एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि उनकी हैसियत का ख्याल रखा जाएगा। वे तो अपने 30 समर्थकों को टिकट दिलवाना चाहते थे, पर खुद उन्हें ही टिकट नहीं दिया गया। अब उनके समर्थक उन्हें छोड़ कर जाने लगे हैं।

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