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भीमा कारेगांव मामले में आरोपियों के खिलाफ ‘प्लांट’ किए गए सबूत? यूएस फॉरेंसिक लैब के हेड स्पेंसर ने कहा- पहले ऐसा नहीं हुआ

सामाजिक कार्यकर्ता रोना विल्सन के वकील मिहिर देसाई ने लैपटाप की जांच के लिए अमेरिकी कंपनी आर्सनल कंसल्टिंग को संपर्क किया था। आर्सनल कंसल्टिंग के मुताबिक हैकर ने रोना विल्सन के लैपटॉप को हैक करने के लिए नेटवायर नाम के मैलवेयर का इस्तेमाल किया।

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भीमा कोरेगांव मामले में जेल में बंद सामाजिक कार्यकर्ता रोना विल्सन (फाइल फोटो )

साल 2018 में महराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा के बाद से जाँच एजेसियों ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, लेखकों समेत कई लोगों की गिरफ़्तारी की है। इसी मामले में गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ता रोना विल्सन के मामले में एक नया खुलासा किया गया है। कहा यह जा रहा है कि रोना विल्सन के लैपटॉप में जान बुझ कर हैकर्स के द्वारा सबूत प्लांट किये गए थे जिसके बाद पुलिस ने उस लैपटॉप को सीज कर लिया था।

सामाजिक कार्यकर्ता रोना विल्सन के वकील मिहिर देसाई ने लैपटाप की जांच के लिए अमेरिकी कंपनी आर्सनल कंसल्टिंग को संपर्क किया था। आर्सनल कंसल्टिंग के मुताबिक हैकर ने रोना विल्सन के लैपटॉप को हैक करने के लिए नेटवायर नाम के मैलवेयर का इस्तेमाल किया। सबसे पहले लैपटाप की जासूसी की गयी और फिर जानबूझ कर कई फाइलों को डाउनलोड करवाने की कोशिश की गयी। इन फाइलों में वो लेटर भी शामिल है जिसे पुलिस ने सबूत के तौर पर कोर्ट में पेश किया है। डाउनलोड की गयी सभी फाइल लैपटॉप के हिडेन फोल्डर में सेव थी जो ठीक से खुलती भी नहीं थी। इतना ही नहीं करीब 22 महीने तक विल्सन के लैपटॉप की जासूसी की गयी थी।

लैपटाप हैकिंग के मामले की जांच करने वाली कंपनी आर्सनल कंसल्टिंग के हेड स्पेंसर ने कहा है कि इससे पहले कभी भी इस तरह से हैकिंग नहीं हुई थी। साथ ही स्पेंसर ने यह भी कहा कि हम किसी भी तरह से हैकर्स की पहचान करने में शामिल नहीं होंगेबुधवार को बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर की गयी याचिका में आर्सनल कंसल्टिंग की रिपोर्ट को शामिल किया गया और विल्सन के खिलाफ मामलों को निरस्त करने का आग्रह भी किया गया।

आपको बता दूँ कि भीमा कोरेगांव के मामले में पुलिस ने देश के अलग-अलग हिस्सों से गौतम नवलखा, वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा और वरनोन गोंजालवेस, रोना विल्सन समेत 14 लोगों को गिरफ्तार किया है। पुणे पुलिस के अनुसार 31 दिसंबर 2017 को पुणे में यलगार परिषद की सभा के बाद भीमा-कोरेगांव युद्ध स्मारक पर जातीय हिंसा भड़क गई थी। शुरुआत में इस मामले की जांच पुणे पुलिस कर रही थी लेकिन  अब यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अधीन है।

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