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दिल्ली जिमखाना क्लब: व्यायामशाला से मधुशाला तक का सफर

अप्रैल के अंत में जब राष्ट्रीय राजधानी के विशिष्ट इलाके लुटियन जोन में स्थित डेढ़ सदी पुराने जिमखाना क्लब के प्रबंधन को लेकर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय कानून प्राधिकरण (एनसीएलटी) का दरवाजा खटखटाया तो अपनी आपत्ति में नाम और उसके विपरीत काम की तुलना की। सरकार की ओर से दायर याचिका के 29वें बिंदु में स्पष्ट किया गया है, ‘जिमखाना का तात्पर्य व्यायामशाला या कसरत करने की जगह से है लेकिन समय के साथ यह मधुशाला में तब्दील होकर रह गया है।’

दिल्ली के जिमखाना क्लब में सदस्यता को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।

83 रुपए 33 पैसे महीने में 27 एकड़ की जमीन दिल्ली में। नाम है जिमखाना क्लब। नाम के अर्थ में जाएं तो जिमखाना क्लब का शाब्दिक अर्थ होगा सार्वजनिक व्यायामशाला एवं क्रीड़ा स्थल। लेकिन खेलों पर खर्च है मात्र 2.77 फीसद। जिमखाना क्लब पर सरकारी नजर के बाद जो हंगामा बरपा है उसके लिए इसके नाम में बहुत कुछ रखा है। सरकारी तर्क ने अपना अहम औजार क्लब का नाम और उसकी स्थापना के उद्देश्य को बनाया है।

अप्रैल के अंत में जब राष्ट्रीय राजधानी के विशिष्ट इलाके लुटियन जोन में स्थित डेढ़ सदी पुराने जिमखाना क्लब के प्रबंधन को लेकर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय कानून प्राधिकरण (एनसीएलटी) का दरवाजा खटखटाया तो अपनी आपत्ति में नाम और उसके विपरीत काम की तुलना की। सरकार की ओर से दायर याचिका के 29वें बिंदु में स्पष्ट किया गया है, ‘जिमखाना का तात्पर्य व्यायामशाला या कसरत करने की जगह से है लेकिन समय के साथ यह मधुशाला में तब्दील होकर रह गया है।’ इसी बिंदु में सरकार की आपत्ति है, ‘यहां केवल संभ्रांत वर्ग को ही प्रवेश मिलता है जिन्होंने क्लब की सदस्यता अपने मित्रों/रिश्तेदारों के लिए हड़प ली है जिसके फलस्वरूप यह एक सार्वजनिक क्लब न होकर सदस्यों की बपौती हो गया है’।

इस आरोप के जवाब में क्लब ने एनसीएलटी के सामने आरोप लगाया कि कंपनी मामलों के मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी को क्लब की सदस्यता नहीं मिलने के कारण उसका उत्पीड़न किया जा रहा है।

सरकार ने कंपनी अधिनियम की धारा 241 और 242 के तहत एनसीएलटी में दिल्ली जिमखाना क्लब के खिलाफ याचिका दायर की थी। कंपनी मामलों के मंत्रालय में सहायक निदेशक कुसुम यादव की ओर से दाखिल याचिका पर पीठ ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था।

क्लब में अनियमितताओं की शिकायतों की जांच की जिम्मेदारी कंपनी मामलों के मंत्रालय में उत्तर क्षेत्रीय अधिकारी राज सिंह को सौंपी थी, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में कई अनियमितताओं का उल्लेख किया है। सरकारी पक्ष का आरोप है कि क्लब का गठन खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया गया था। लेकिन पाया गया कि यह अपने उद्देश्य से भटक गया। यहां खेल गतिविधियों पर रत्ती भर भी काम नहीं होता। 95 फीसद गतिविधियां शराब, सिगरेट और खाने-पीने तक सीमित रह गई हैं। राज सिंह अपनी रिपोर्ट के नतीजे में कहते हैं कि बेहतर होता कि क्लब का प्रबंधन सरकार अपने हाथों में ले ले।

राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने क्लब का प्रबंधन अपने हाथ में लेने की सरकार की याचिका पर इस क्लब और उसके कामकाज का प्रबंधन करने वाली साधारण समिति को नोटिस जारी कर इस विशाल क्लब से केंद्र की याचिका पर जवाब देने को कहा था। सरकार ने कॉरपोरेट मामले के जरिए दायर आवश्यक याचिका में साधारण समिति पर धोखाधड़ी और कुप्रबंधन का आरोप लगाते हुए कंपनी कानून के तहत क्लब का प्रबंधन अपने हाथ में दिए जाने की अपील की थी।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई सुनवाई के दौरान दिल्ली जिमखाना क्लब की ओर से पेश अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा था कि क्लब सदस्यता के लिए अब नया आवेदन स्वीकार नहीं करेगा। इसके बाद 17 मई को हुई सुनवाई में क्लब प्रबंधन ने सरकार की याचिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें बदनीयती झलकती है। यह निजी क्लब है जिसकी स्थापना इसके सदस्यों के इस्तेमाल करने के लिए की गई थी और इसमें जनहित जैसा कोई तत्व शामिल नहीं है।
मंत्रालय का आरोप है कि क्लब की आम समिति ने कुप्रबंधन किया और कंपनी अधिनियम के तहत प्रबंधन का नियंत्रण लेने का प्रयास किया। वर्तमान सदस्यता न तो आनुवांशिक है और न हस्तांतरण के योग्य क्योंकि यह कंपनी लिमिटेड है। सरकार का आरोप है कि सदस्यता का आनुवांशिक उत्तराधिकार परिवारवाद है और यह लोकतांत्रिक नियम का न्यूनतम अनुपालन है।

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