गुरुग्राम में सोमवार को हुई भारी बारिश के कारण सुभाष चौक और रेल विहार के पास समेत कई सड़कें जलमग्न हो जाने से करीब एक दर्जन स्कूल बसें घंटों तक फंसी रहीं। यूनिवर्ल्ड गार्डन्स सोसायटी के निवासी और एक बैंक में कार्यरत 39 वर्षीय सिद्धार्थ कासिद कमर तक गहरे पानी में होते हुए हाईवे पर ठहरीं बसों के पास पहुंचे और अपनी 5 वर्षीय बेटी और अन्य बच्चों को सुरक्षित वापस लाए। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को अपनी आपबीती सुनाई।
मेरी बेटी पांच साल की है और यूकेजी में पढ़ती है। आमतौर पर वह दोपहर 2.15 से 2.45 के बीच घर लौटती है, लेकिन कल बारिश की वजह से हमें लगा कि स्कूल जल्दी बंद होगा। मैं वर्क फ्रॉम होम कर रहा था।
दोपहर 12 बजे स्कूल ने भेजा ईमेल
स्कूल (हेरिटेज एक्सपीरेंशियल) ने छुट्टी के बारे में दोपहर करीब 12 बजे एक ईमेल भेजा। तब से मैं उनके ऐप पर स्कूल बस की लोकेशन ट्रैक करता रहा। जब मैं नीचे गिर गया तो दिखा रहा था बस 35 मिनट दूर है। मेरी लंबाई 6 फुट है और सड़क पर पानी मेरी कमर तक आ चुका था। मैं सुभाष चौक के पास यूनिवर्ल्ड गार्डन्स का निवासी हूं, और बाढ़ग्रस्त इलाके को देखकर मुझे समझ आ गया कि बस यहां कभी नहीं पहुंच पाएगी। मैं लगातार यही सोचता रहा कि मैं वहां कैसे पहुंचूं?
बस ड्राइवर से बात कर लोकेशन पता चला
हमें पता चला कि बस रेल विहार में फंसी हुई है। मैंने अपनी सोसाइटी की एक और पैरेंट मीतू गुप्ता से बात की, उनकी भी बेटी फंसी हुई थी। हमने बस चालक को फोन किया और बस की लोकेशन का पता लगा लिया। मैं अपने एक दोस्त के साथ बस से उतरी और हाईवे पर पैदल चलना शुरू किया। हम पूरी तरह भीग चुके थे। मेरा एक फोन खराब हो गया और मेरा पर्स कहीं गिर गया। जब हम घटनास्थल पर पहुंचे, तो जो हमने देखा वह दिल दहला देने वाला था। कम से कम 10 बसें एक कतार में फंसी हुई थीं और उनके अंदर नर्सरी और केजी के छोटे-छोटे बच्चे थे।
मलबे की बीच से गुजरना थकाने वाला था
मेट्रो के निर्माण कार्य के कारण सब कुछ तोड़ डाला गया था। आधे किलोमीटर से अधिक दूर से मलबे के बीच गुजरना वैष्णों देवी की यात्रा से भी अधिक कठिन और थका देने वाला था। हमने फिर बस ढूंढी और मीतू और अपनी बेटी को उतारा। फिर हम अपनी सोसायटी की ओर चलने लगे। चलते-चलते अन्य माता-पिता के फोन आने लगे, जो अपने बच्चों को लाने के लिए मदद मांग रहे थे। मैंने मीतू को उसकी बेटी सौंपी, उसे वहीं रुकने को कहा और बाकी बच्चों को लेने के लिए वापस मुड़ गया।

मैं करीब 6 से 7 बच्चों को लेकर वापस आया और उन्हें एक कतार में सोसायटी की ओर चलने को कहा। मैं अपने बच्चे या किसी और को वहां अकेला नहीं छोड़ सकता था क्योंकि इससे डूबने का खतरा था। मुझे खुले गड्ढों से बचने के लिए बहुत सावधानी से चलना पड़ा। पूरा गुड़गांव बुरी तरह से डूब गया था। कक्षा 7 और 8 के बड़े छात्र मेरे हाथ और टी-शर्ट पकड़े हुए थे। बाकी बच्चों ने अपने बैग पकड़े हुए थे। और मैं अपनी पांच साल की बच्ची को गोद में लिए हुए था। मैंने सबसे पहले अपनी बच्ची को घर छोड़ा फिर वापस दूसरे बच्चों के मदद के लिए गया।
मेरी बेटी बहुत डरी और थकी हुई थी। बाढ़ से भरी सड़कों को देखकर उसने मासूमियत से पूछा क्या होली है? हर जगह पानी क्यों है? थोड़ी देर बाद उसने कहा, मुझे ठंड लग रही है और भूख भी लग रही है। यह सुनकर मेरा दिल बैठ गया और मुझे बहुत गुस्सा और बेबसी महसूस हुई।
अधिकारियों पर गुस्सा
मेरा गुस्सा गुरुग्राम के अधिकारियों पर था। हम भारी-भरकम टैक्स और स्कूल की तगड़ी फीस झेलते हैं और शहर का यह हाल है। अब मुझे इससे नफरत हो गई है। उन्हें उचित चेतावनी जारी करनी चाहिए थी और सड़कों की देखरेख करनी चाहिए थी। सबसे बुरा अनुभव उन बसों के अंदर की बेबसी थी।
सुरक्षा कारणों से, बस कर्मचारियों ने कहा कि वे माता-पिता की सहमति के बिना सभी को नहीं उतार सकते। मैं सभी बच्चों को सुरक्षित रूप से यूनिवर्ल्ड ले जाने के लिए तैयार थी। एक छोटा बच्चा, जो यूकेजी में पढ़ता है, मेरी तरफ देख रहा था, उम्मीद कर रहा था कि मैं उसे बस से उतार दूँ, लेकिन मैं उसके पिता को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती थी। यह देखकर मेरा दिल टूट गया। वह बेचारा बच्चा, जो मेरी सोसाइटी में रहता है, शाम 5:45 बजे ही घर पहुँच पाया।
दोनों सदमें में थे
बच्ची को ढूंढने और घर पहुंचाने में मुझे करीब डेढ़ घंटा लग गया। सड़कें जाम थीं और हर जगह लोग फंसे हुए थे, मैं दोपहर 2:20 बजे घर से निकला और आखिरकार शाम 4:40 बजे लौटा। मेरी पत्नी इतनी चिंतित थी कि कमर तक पानी होने के बावजूद वह भी बाहर निकली और सुभाष चौक की ओर चलने लगी। हम दोनों पूरी तरह सदमे में थे।
प्रशासन और स्कूलों ने छोटे बच्चों वाले परिवारों के प्रति बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं दिखाई। किसी को तुंरत जानकारी नहीं दी; किसी ने भी हमें अपडेट देने के लिए फोन या ईमेल नहीं किया। यह बेहद दयनीय था। अपने पेशेवर जीवन में, मैं 45 लोगों की एक टीम का नेतृत्व करता हूँ, और हम यह सुनिश्चित करते हैं कि बुनियादी शिष्टाचार और संचार हो; यहाँ के अधिकारियों ने इनमें से कुछ भी नहीं दिखाया।
बच्ची की जान जोखिम में नहीं डालूंगा
आज स्कूलों में ऑनलाइन कक्षाएं शुरू हो गईं। अगर ऐसा नहीं होता, तो मैं अपनी बेटी को स्कूल भेजने की सोच भी नहीं सकता था। मैं उनकी अक्षमता के कारण उसकी जान जोखिम में नहीं डालूंगा।
गुरुग्राम में रहना अब बिलकुल भी ठीक नहीं है। हम यहाँ नहीं रहना चाहते। सरकार को भारी टैक्स और महंगे किराए के बावजूद मेरा परिवार हर साल इस नरक जैसी स्थिति से गुजरता है। अब हम इस शैक्षणिक सत्र के खत्म होते ही गुड़गांव से बाहर जाने के बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं।
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दिल्ली और आसपास के इलाकों में सोमवार को करीब 2 घंटे की बारिश ने तापमान में तो गिरावट ला दी, लेकिन कामकाजी लोगों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी। दरअसल, मूसलाधार बारिश के बाद जगह-जगह जलभराव और ट्रैफिक जाम की समस्या सामने आई है। इसी को देखते हुए गुरुग्राम प्रशासन ने मंगलवार के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ की एडवाइजरी जारी कर दी है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
