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गुजरात 2015: पटेल आंदोलन और स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा का खराब प्रदर्शन

पटेलों के लिए आरक्षण की मांग पर आंदोलन से 2015 में 21 साल के नौजवान हार्दिक पटेल गुजरात की सियासत में एक नया सितारा बन कर उभरे जबकि स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस ने ग्रामीण इलाकों में सत्तारूढ़ भाजपा को पछाड़ कर नई जमीन सर की....

Author अमदाबाद | December 21, 2015 12:08 AM
भारतीय जनता पार्टी

पटेलों के लिए आरक्षण की मांग पर आंदोलन से 2015 में 21 साल के नौजवान हार्दिक पटेल गुजरात की सियासत में एक नया सितारा बन कर उभरे जबकि स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस ने ग्रामीण इलाकों में सत्तारूढ़ भाजपा को पछाड़ कर नई जमीन सर की। इस साल मानसून के दौरान गुजरात भारी बारिश का साक्षी बना और कई जिलों में बाढ़ जैसी स्थिति बनी। इसमें जान-माल की तबाही भी हुई। मानसून के दौरान ही ढेर सारे अन्य जिलों में कम बारिश हुई और पिछले साल से ही कम बारिश से जूझ रहे इन जिलों में कृषि संकट गहराया। इस साल के दौरान बदनाम मुठभेड़ों के विभिन्न मामलों में गिरफ्तार अनेक वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को राहत मिली और उन्हें जेल से रिहाई हासिल हुई। इसमें डीजी वंजारा और एडीजीपी पीपी पांडेय सरीखे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर नौकरी पर फिर से बहाल हो गए।

उधर, 2002 के गुजरात दंगों पर भाजपा सरकार से टकराने वाले वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी संजीव भट को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इस बीच, गुजरात हाई कोर्ट ने 2012 के चुनाव के सिलसिले में आदर्श चुनाव आचार संहिता के कथित उल्लंघन और हलफनामे के दो मामलों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में फैसला दिया।

संख्यात्मक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली पटेल समुदाय की महत्त्वाकांक्षा के कारण राज्य में आरक्षण आंदोलन शुरू हुआ जिसका नेतृत्व पटेल युवकों के पास है। हार्दिक पटेल ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में छोटी-छोटी रैलियां आयोजित करने के बाद 25 अगस्त को अमदाबाद में एक विशाल रैली आयोजित की और खुलेआम राज्य की भाजपा सरकार को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि अगर पटेलों को ओबीसी कोटा में शामिल नहीं किया गया तो ‘कमल नहीं खिलेगा’।

इस रैली में हार्दिक गिरफ्तार कर लिया गया जिसके बाद राज्य में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। अगले दो दिनों के दौरान हिंसा में एक पुलिसकर्मी समेत 10 लोग मारे गए। राज्य की भाजपा सरकार ने संविधान का हवाला देते हुए पटेलों को आरक्षण देने से साफ मना कर दिया। अक्तूबर में हार्दिक और उसके शीर्ष सहयोगियों को गिरफ्तार कर राजद्रोह के आरोपों में जेल में डाल दिया गया।

गुजरात हाई कोर्ट ने भी हार्दिक के खिलाफ दो अलग-अलग मामलों में प्रथम दृष्टया राजद्रोह के आरोपों की पुष्टि की। हार्दिक अभी सूरत के लाजपोर जेल में बंद हैं। भाजपा सरकार ने स्थानीय निकाय चुनाव टालने की कोशिश की। वह इसके लिए एक अध्यादेश भी लाई। लेकिन हाई कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया और तत्काल चुनाव कराने का आदेश दिया। अदालती आदेश पर नवंबर में छह नगरनिगमों, 52 नगरपालिकाओं, 31 जिला पंचायतों और 230 तालुका पंचायतों के चुनाव कराए गए। दो दिसंबर को जारी नतीजों में कांग्रेस ने ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर जिला और तालुका पंचायतों में जीत हासिल कर राज्य की राजनीति में वापसी की।

स्थानीय निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा ने छह नगर निगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा। उसे 52 में से 40 नगरपालिकाओं में जीत हासिल हुई। कांग्रेस पिछले 20 साल के दौरान गुजरात में कोई उल्लेखनीय चुनाव जीत नहीं पाई थी। वह इन नतीजों को 2017 के विधानसभा चुनावों के लिए एक सोपान के तौर पर देख रही है। स्थानीय निकाय के चुनावी नतीजों से इस छवि को चुनौती मिली कि मोदी के गृहराज्य में भाजपा परास्त नहीं की जा सकती। ऐसा लगता है कि चुनावी नतीजों पर सिर्फ पटेल आरक्षण आंदोलन का ही नहीं बल्कि पिछले दो साल के दौरान राज्य के अनेक जिलों में अल्पवृष्टि और कुछ जिलों में भारी बारिश से कृषि की स्थिति और उसके प्रति राज्य सरकार के रुख का भी प्रभाव पड़ा है।

साल के दौरान सोहराबुद्दीन और इशरत जहां मुठभेड़ कांडों में कथित रूप से संलिप्त सभी पुलिस अधिकारी जमानत पर रिहा हो गए। इनमें वंजारा, पांडेय और पुलिस उपाधीक्षक एनके अमीन शामिल हैं। राज्य की भाजपा सरकार ने पांडेय, अमीन और एक अन्य पुलिस उपाधीक्षक तरुण बारोट को नौकरी पर बहाल कर दिया जबकि रिटायर हो चुके वंजारा का फरवरी में जेल से निकलने पर किसी नायक की तरह स्वागत किया गया।

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