प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के पुतले जलाने के बाद गुजरात पुलिस ने यहां 21 प्रदर्शनकारी किसानों पर केस किया था। लेकिन एक हफ़्ते से ज़्यादा समय हो गया है, लेकिन न तो कोई नोटिस जारी किया गया है और न ही कोई और कार्रवाई की गई है। लेकिन विरोध के पीछे के मुद्दे पर गुस्सा अभी भी बढ़ रहा है। शुक्रवार को 9,000 से ज्यादा किसानों ने मोरबी कलेक्ट्रेट पर धरना दिया, जिसमें दूसरे ज़िलों के किसान भी शामिल हुए।
विरोध का यह नया दौर उन सभी जमीन मालिकों को दिए गए नोटिस से शुरू हुआ है, जिनके खेतों से या तो ट्रांसमिशन टावर हैं या 765 kV हलवद ट्रांसमिशन लाइन और 800 kV ट्रांसमिशन लाइन के लाइन कॉरिडोर गुजर रहे हैं। 23 सितंबर को दिए गए इन नोटिस में उनसे कहा गया है कि वे दो दिन के अंदर कलेक्ट्रेट में मार्केट रेट कमेटी (MRC) के सामने पेश हों, ताकि वे अपनी जमीन का वैल्यूअर नॉमिनेट कर सकें, नहीं तो सरकार उनके लिए यह कर देगी।
जुलाई से विरोध कर रहे किसान
किसान नेताओं के लिए, यह उस पैटर्न से मेल खाता है जिसका वे जुलाई से विरोध कर रहे हैं। राज्य सरकार उन्हें ट्रांसमिशन लाइनों के लिए मुआवजे की प्रक्रिया में हिस्सा लेने के लिए मजबूर कर रही है, जो उसके द्वारा तय किए गए प्रतिशत पर आधारित है। इस विरोध प्रदर्शन ने बिजली की लाइनें बिछाने का काम रोक दिया है। उनका यह भी दावा है कि 17 सितंबर को जिन 21 लोगों पर मामला दर्ज किया गया था, उनमें से कई तो उस जगह पर मौजूद भी नहीं थे जहां पुतले जलाए गए थे। केस मोरबी पुलिस की लोकल क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर कर दिया गया है।
यह जेटपार में एक विरोध प्रदर्शन के तौर पर शुरू हुआ था, जो ज़्यादातर अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस के मालिकाना हक वाली एक स्पेशल पर्पस व्हीकल, हलवाद ट्रांसमिशन लिमिटेड द्वारा लगाई जा रही 765-kV ट्रांसमिशन लाइन के खिलाफ था। अब यह मोरबी में अलग-अलग कंपनियों द्वारा प्लान की गई सभी ट्रांसमिशन लाइनों और MRCs के जरिए मुआवज़े की पॉलिसी के खिलाफ विरोध में बदल गया है।
आंदोलन कर रहे युवा नेता
किसानों ने कहा कि 23 सितंबर के नोटिस में पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा लगाई जा रही 800-kV लाइन भी शामिल थी, जो पहली बार हुआ था। आंदोलन के युवा नेताओं में से एक नेहुल धीरजलाल अमृतिया कहते हैं, “हमने हर आदमी, औरत और बच्चे को कलेक्ट्रेट पर प्रोटेस्ट करने के लिए बुलाया है।” जेटपार और नवा देवलिया गांवों के किनारे उनके खेत को 765-kV ट्रांसमिशन लाइन के टावर के लिए खोदा गया है।
हालांकि यहां दूर तक ऐसे कई टावर हैं, लेकिन किसानों के विरोध के कारण बिजली की लाइनें कुछ हिस्सों में गायब हैं। मुआवज़े के फॉर्मूले पर, नेहुल कहते हैं, “यह टावर बेस के कब्ज़े वाले एरिया की कीमत का 200% और RoW (राइट ऑफ़ वे) कॉरिडोर के तहत एरिया की कीमत का 30% है। लेकिन इससे किसानों का पूरा नुकसान कवर नहीं होता है। हम सुझाव दे रहे हैं कि बिजली की लाइनें लिटिल रण ऑफ कच्छ (जहां आबादी कम है) से होकर जाएं। और अगर कुछ जिलों में यह मुमकिन नहीं है, तो लाइनों को अंडरग्राउंड कर दिया जाए। आप किसानों की कीमत पर सस्ता प्रोजेक्ट नहीं बना सकते।”
किसानों को मिला नोटिस
नए नोटिस के बाद किसानों ने एक और मुद्दा उठाया है समय का। उनका कहना है कि अधिकारियों के सामने पेश होने के लिए दो दिन का समय काफ़ी नहीं है, खासकर उन ज़मीन मालिकों के लिए जो विदेश में बसे हैं। नेहुल पूछते हैं कि सरकार को इतनी जल्दी क्या है। उन्होंने कहा, “यह एक कंपनी का बिजनेस प्लान है, मुआवज़ा कंपनी को देना है, तो सरकार उनके पक्ष में क्यों है और किसानों के पक्ष में क्यों नहीं?”
मोरबी कलेक्टर स्वप्निल खरे का कहना है कि डर और आरोप बेबुनियाद हैं। उन्होंने कहा, “23 सितंबर के नोटिस का मकसद सिर्फ़ किसानों को यह बताना था कि प्रोसेस चल रहा है। वैल्यूएशन एक दिन में नहीं होगा। एक बार वैल्यूअर्स नॉमिनेट हो जाने के बाद, वैल्यूएशन के लिए 21 दिन दिए जाएंगे। जो लोग नहीं आ पाएंगे उन्हें पेश होने का एक और मौका मिलेगा।”
कुल कितने किसान प्रभावित हुए हैं, इस बारे में कलेक्टर का कहना है कि उनके पास सही संख्या नहीं है, क्योंकि यह मामला अलग-अलग कंपनियों और कई गांवों से जुड़ा है। हालांकि वह मानते हैं कि मुआवज़े का प्रोसेस बहुत धीमा चल रहा है। उन्होंने कहा, “हमने सात MRC बनाए हैं और 102 सर्वे नंबरों का वैल्यूएशन किया है, जिसमें 44 किसानों को पेमेंट किया गया है।”
गुजरात के ऊर्जा मंत्री ऋषिकेश पटेल कई कोशिशों के बाद भी कमेंट के लिए उपलब्ध नहीं थे। वहीं मोरबी के छह बार के विधायक कांतिलाल शिवलाल अमृतिया, जो राज्य मंत्री भी हैं, उनका कहना है कि किसान भले ही विरोध कर रहे हों, लेकिन नए प्रस्तावों के अनुसार, उन्हें पहले से तीन गुना ज़्यादा (मुआवज़ा) मिलेगा। जेटपार से 12 किमी पूरब में जूना देवलिया गांव में विनोद बावल अघारा उन लोगों में से थे जिनकी ज़मीन का सबसे पहले सर्वे किया गया था। उनका दावा है कि 2025 में उनकी ज़मीन पर एक 765-kV का टावर लगाया गया था, इस शर्त के साथ कि वह अपनी आपत्तियां सुरक्षित रखेंगे।
765-kV का टावर और पावर लाइन कॉरिडोर अघार की 42 बीघा जमीन में से 10 से होकर गुजरता है, जहां मूंगफली, अनार और अरंडी की खेती होती है। अघारा अपनी प्रोग्रेसिव फार्मिंग टेक्नीक के लिए 2011 में कृषि ना ऋषि अवॉर्ड के विजेताओं में से एक थे। उनका दावा है कि उनकी जमीन की कीमत 55-60 लाख रुपये से घटकर आधे से भी कम हो गई है।
इसके अलावा और भी डर हैं। मोरबी-हलवद रोड पर बसे निची मंडल गांव में नवल नरभेराम कुंदरिया ने 26 अगस्त को शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने गांव के किसानों की जमीन और खड़ी फसल को हुए नुकसान के लिए कानूनी कार्रवाई की मांग की, जो एक चालू हाई-टेंशन लाइन के गिरने से हुई थी।
राजेश पंचोटिया का कहना है कि उनके परिवार ने भी मोरबी-हलवद रोड पर स्थित सरमभाडा गांव में अगस्त में 220-kV लाइन टूटने से खेती की संपत्ति और उपकरणों को हुए नुकसान के बारे में शिकायत दर्ज कराई है। किसानों का कहना है कि इनमें से किसी भी शिकायत पर FIR दर्ज नहीं की गई है। मोरबी तालुका पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर एन एस घेटिया ने कहा कि शिकायतों को डायरी में दर्ज कर लिया गया है और आगे की कार्रवाई के लिए संबंधित ट्रांसमिशन कंपनी को भेज दिया गया है।
ट्रांसमिशन लाइन पर है विवाद
जेटपार से लगभग 5 किमी पश्चिम में स्थित वाघपार गांव में अरुण मगन सनावडा, जो अपने भतीजे के साथ 10 बीघा ज़मीन के मालिक हैं, वह कहते हैं कि उनकी ज़मीन का सर्वे 800-kV ट्रांसमिशन लाइन के लिए किया गया था। वे कहते हैं, “वे गुजरात मॉडल की तारीफ़ करते रहते हैं। लेकिन जब किसानों के लिए काम करने की ज़रूरत होती है, तो गुजरात मॉडल कहां होता है?”
विधायक के भाई भी प्रदर्शन में शामिल
योगेश मणिलाल कदिवर बताते हैं कि उनकी स्थिति और भी मुश्किल है। पिलुडी में उनके 10 बीघा कपास के खेत का सर्वे 800-kV लाइन के टावर और कॉरिडोर, दोनों के लिए किया गया है और यह 765-kV लाइन के कॉरिडोर में भी आता है। उनका कहना है कि इन दो प्रोजेक्ट्स में उनकी 70% से ज़्यादा ज़मीन चली जाएगी। इस विरोध प्रदर्शन की एक खास बात यह है कि इसमें विधायक कांतिलाल अमृतिया के भाई रतिलाल शिवलाल अमृतिया भी शामिल हैं।
रतिलाल ने कहा, “हम किसी राजनीतिक पार्टी के ख़िलाफ नहीं हैं, बल्कि सरकार में उन लोगों के ख़िलाफ हैं जो इस मुद्दे के लिए ज़िम्मेदार हैं। हम सिर्फ़ किसानों के लिए लड़ रहे हैं। जेटपार मेरा पुश्तैनी घर है। आजकल बहुत से युवा सिरेमिक इंडस्ट्री में काम करने जाते हैं। अगर वहां कोई समस्या आती है और वे अपने खेतों में काम करने के लिए वापस नहीं आ पाते हैं, तो उनका क्या होगा?” हालांकि कांतिलाल बिजली ट्रांसमिशन लाइनों के रूट में किसी भी बदलाव की संभावना को खारिज करते हैं। वह कहते हैं, “रूट नहीं बदला जाएगा। अगर वे चाहें, तो पहला टावर मेरी ही ज़मीन पर लगाया जा सकता है।”
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वडोदरा नगर निगम के 400 आंगनवाड़ी केंद्रों से जुड़े 5500 बच्चों को पिछले एक हफ्ते से हर दिन मिलने वाला दूध का गिलास नहीं मिला है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अमूल ब्रांड चलाने वाले गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन ने कथित तौर पर 17 सितंबर से वडोदरा शहर की सभी आंगनवाड़ियों में दूध के पैकेट भेजना बंद कर दिया। इसकी वजह पैसों के भुगतान को लेकर विवाद बताया जा रहा है। पढ़ें पूरी खबर
