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संन्यासी बनकर घरवालों से नहीं मोड़ सकते मुंह! कोर्ट का आदेश- दीजिए 10 हजार रुपए महीने का भत्ता

अपनी याचिका में माता-पिता ने कोर्ट को बताया कि दोनों शारीरिक रूप से अक्षम हैं और उनकी आय का भी कोई साधन नहीं है। पिता ने बताया कि वो चार साल पहले नौकरी से सेवानिवृत हो चुके हैं। उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी बेटे की उच्च शिक्षा में खर्च कर दी। बेटे से बड़ी उम्मीदें थी कि एक उम्र के बाद वह उनकी देखभाल करेगा।

Author नई दिल्ली | Published on: October 14, 2019 3:17 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

गुजरात में एक फैमिली कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर कोई शख्स संन्यासी या संसार का त्याग करता है तो वो माता-पिता की जिम्मेदारी से खुद को दूर नहीं कर सकता है। एक मामले में कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए एक संन्यासी से कहा कि वह अपने माता-पिता को 10,000 रुपए महीना गुजारा भत्ता दे। संन्यासी बेटे को गुजारा भत्ता देने का आदेश देने के साथ ही कोर्ट ने कहा कि एक बेटे के रूप में उसकी जिम्मेदारी है कि वो उन्हें गुजारा भत्ता दे और वह अपने जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकता।

मामला 27 वर्षीय धर्मेश गोल से जुड़ा है। जून 2015 में नौकरी छोड़ने के बाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (NIPER) से फार्मेसी में मास्टर करने वाले गोल संन्यासी बन गए। गोल इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ कृष्णा कॉन्शसनेस (ISKCON) की गतिविधियों से खासे प्रभावित थे और इसके चलते अक्षयपात्र, टच स्टोन और अन्नपूर्णा नाम की एनजीओ का संचालन शुरू किया। इस बीच उन्होंने अपने पिता लीलाभाई (64) और मां भीखीबैन (55) से अपने सारे रिश्ते तोड़ लिए। हालांकि परिजनों को ये जानकारी बेटे धर्मेश से नहीं मिली इसलिए दोनों ने बेटे को खोजने की खूब कोशिश की। बेटे की खोजबीन और घर वापस लाने के लिए लीलाभाई ने पुलिस से भी मदद की गुहार लगाई। बहुत कोशिशों के बाद भी जब बेटा घर नहीं लौटा तो माता-पिता ने बेटे के खिलाफ अहमदाबाद फैमिली कोर्ट में उन्हें 50,000 रुपए का गुजारा भत्ता देने के लिए मुकदमा दायर कर दिया।

अपनी याचिका में माता-पिता ने कोर्ट को बताया कि दोनों शारीरिक रूप से अक्षम हैं और उनकी आय का भी कोई साधन नहीं है। पिता ने बताया कि वो चार साल पहले नौकरी से सेवानिवृत हो चुके हैं। उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी बेटे की उच्च शिक्षा में खर्च कर दी। बेटे से बड़ी उम्मीदें थी कि एक उम्र के बाद वह उनकी देखभाल करेगा। कोर्ट में पिता ने दावा किया कि उन्होंने धर्मेश की शिक्षा पर 35 लाख रुपए खर्च किए थे।

माता-पिता ने कोर्ट को बताया कि पढ़ाई पूरी करने के बाद धर्मेश ने 60,000 रुपए प्रतिमाह की नौकरी करने से इनकार कर दिया और एक पुजारी के लालच में आकर धार्मिक एनजीओ चलाने लगा। पिता ने दावा किया कि धर्मेश एक लाख रुपए कमाता है। इस मामले में धर्मेश ने कोई दलील नहीं दी और इससे कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि बेटे ने बिना किसी वजह के अपने माता-पिता को छोड़ दिया।

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने माना कि धर्मेश महीने में 30,000 से 35,000 रुपए कमाता है और आदेश दिया कि वो अपने माता-पिता को हर महीना 10,000 रुपए का गुजारा भत्ता दे। कोर्ट ने आगे कहा कि गुजारे भत्ते की राशि इतनी अधिक भी नहीं होनी चाहिए जो बेटे के लिए एक सजा बना जाए।

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