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Gsat-7A: और खतरनाक हो जाएगी भारतीय वायु सेना! जानें नए भारतीय सैटेलाइट की खूबियां

भारत की सामरिक क्षमता को बढ़ाने वाले इस मिलिटरी सैटेलाइट को बनाने में 500-800 करोड़ रुपये का खर्च आया है। इसमें 4 सोलर पैनल लगे हैं, जिनके जरिए लगभग 3.3 किलोवाट बिजली पैदा की जा सकती है।

Author Updated: December 19, 2018 5:10 PM
Gsat-7A सैटेलाइट से भारतीय वायुसेना की शक्ति में कई गुना इजाफा हो जाएगा. (इसरो फोटो/ पीटीआई)

भारतीय वायुसेना के पास एक और मारक क्षमता हाथ लग गई है। बुधवार को इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) ने Gsat-7A कम्यूनिकेशन सैटेलाइट लॉन्च किया। इस सैटेलाइट को बुधवार शाम 4:10 पर श्रीहरिकोटा स्थित लॉन्च पैड से GSLV-F11 राकेट के जरिए जीओ ऑरबिट में भेजा गया। Gsat-7A  की वजह से भारतीय वायुसेना के विभिन्न ग्राउंड रेडार स्टेशन, एयरबेस और AWACS एयरक्राफ्ट आपस में इंटरलिंक हो जाएंगे और इससे ग्लोबल ऑपरेशन को अंजाम देने में काफी आसानी हो जाएगी। भारतीय एयरफोर्स भी अमेरिका की तर्ज पर नेटवर्क आधारित युद्ध कौशल में माहिर हो जाएगा।

सबसे खास बात यह है कि इस सैटेलाइट से वायुसेना के ड्रोन ऑपरेशन की क्षमता काफी बढ़ जाएगी। गौरतलब है कि भारत अमेरिका के प्रीडेटर-बी और सी (sea) गार्डियन ड्रोन्स को हासिल करने की कोशिश में है। इन ड्रोन्स की खासियत यह है कि ये अधिक ऊंचाई पर सैटेलाइट कंट्रोल के जरिए दूर से भी दुश्मन पर सटिक हमला करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में इस तकनीक के जरिए भारत की सामरिक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।

Gsat-7A सैटेलाइट के फीचर्स: भारत की सामरिक क्षमता को बढ़ाने वाले इस मिलिटरी सैटेलाइट को बनाने में 500-800 करोड़ रुपये का खर्च आया है। इसमें 4 सोलर पैनल लगे हैं, जिनके जरिए लगभग 3.3 किलोवाट बिजली पैदा की जा सकती है। इसके अलावा इसमें ऑर्बिट में आगे-पीछे जाने के लिए बाई-प्रोपेलैंट का केमिकल प्रोपल्शन सिस्टम भी लगाया गया है। गौरतलब है कि इसरो Gsat-7A से पहले Gsat-7 सैटेलाइट 29 सितंबर,2013 में ही लॉन्च कर चुका है। Gsat-7 को रुक्मिणि नाम से जाना जाता है।

रुक्मिणि को भारतीय नेवी के लिए तैयार किया गया था। इसके जरिए नेवी के युद्धक जहाजों, पनडुब्बियों और फाइटर-प्लेन के संचार में सुविधा मिलती है। हालांकि, बताया यह भी जा रहा है कि आगामी सालों में इसरो Gsat-7 सी उपग्रह भी छोड़ने की तैयारी कर सकता है। यह सैटेलाइट Gsat- 7बी के मुकाबले काफी क्षमतावान होगा।

स्पेस में भारत की क्षमता: भारत की सामरिक क्षमता को बढ़ाने में इन सैटेलाइट्स का बहुत हाथ रहा है। अब तक भारत के पास 13 मिलिटरी सैटेलाइट्स हैं। जिनमें अधिकतर रिमोट-सेंसिंग वाले हैं। इन सैटेलाइट्स में कार्टोसैट सीरीज और रीसैट सैटेलाइट शामिल हैं। इनका इस्तेमाल नेविगेशन, कम्यूनिकेशन और निगरानी के लिए किया जाता है। इसी तकनीक के जरिए भारतीय सेना को पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक में कापी मदद मिली थी। मिलिटरी सैटेलाइट के मामले में अमेरिका के पास सबसे अधिक क्षमता है। इस वक्त हमारी धरती के चारों तरफ करीब 320 मिलिटरी सैटेलाइट घूम रहे हैं। इनमें से तकरीबन आधे सैटेलाइट अमेरिका के हैं। इसके बाद रूस और चीन के चक्कर काटते रहते हैं। यही वजह है कि इन सभी को देख भारत ने भी स्पेस में अपनी सामरिक क्षमता को ताकवतर बनाने पर बल दिया है।

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