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निकोला टेस्ला ऊर्जा का वेदांत

वैज्ञानिकों का जीवन आमतौर पर सामान्य नहीं होता है। यह बात तब और बड़ी और सही लगने लगती है जब हम महान वैज्ञानिक निकोला टेस्ला की बात करते हैं।

Author Updated: January 27, 2021 2:09 AM
Nicolaप्रतिभा के लिहाज से टेस्ला मानव इतिहास का एक ऐसा नाम है, जिसका मूल्यांकन आज भी टेढ़ी खीर है।

टेस्ला के बारे में आज खूब लिखा-पढ़ा जा रहा है। पर जितनी ज्यादा उनके बारे में चर्चा हो रही है, उनके जीवन से जुड़े नए-नए रहस्य भी उतने ही खुलते जा रहे हैं। कुछ विद्वानों का यह कहना आधारहीन नहीं है कि बुद्धि और प्रतिभा के लिहाज से टेस्ला मानव इतिहास का एक ऐसा नाम है, जिसका मूल्यांकन आज भी टेढ़ी खीर है। उनके ज्ञान का विस्तार वेदांत से अक्षय ऊर्जा की चिंता तक फैला था। दुर्भाग्य यह कि विज्ञान जगत की जिन नैतिक स्फीतियों ने उन्हें अपने समय में ठगा, वही स्फीतियां आज बाजार के जोर पर तकनीकी पराक्रम दिखा रही हैं। विज्ञान और मिथक को समानधर्मा बना देने वाले इस महान वैज्ञानिक के जीवन से जुड़े दिलचस्प संदर्भों की चर्चा कर रहे हैं प्रेम प्रकाश।

जिस बिजली के बल्ब के आविष्कार ने दुनिया के सामने आधुनिक विज्ञान की ताकत का लोहा मनवाया उसके आविष्कारक की महानता को उसके दौर में ही चुनौती मिल गई थी। दरअसल, हम बात कर रहे हैं महान वैज्ञानिक निकोला टेस्ला की। विद्युत विज्ञान की दुनिया में पिता सदृश समादर पाने वाले थॉमस अल्वा एडिसन को उनके जीवन में ही न सिर्फ सैद्धांतिक बल्कि नैतिक चुनौती दी थी टेस्ला ने। जिस टेस्ला को बाद में पागल तक करार दिया गया, वो बहुत श्रद्धा के साथ एडिसन के पास पहुंचे थे।

1884 में टेस्ला जब आॅस्ट्रिया से न्यूयॉर्क पहुंचे तो उनके पास एडिसन के ही एक पूर्व सहयोगी का सिफारिशी पत्र था। एडिसन को संबोधित इस पत्र में लिखा था, ‘मैं इस दुनिया के दो महान लोगों को जानता हूं। इनमें से एक तुम (एडिसन) हो और दूसरा यह व्यक्ति (टेस्ला)।’

विज्ञान का शोक

दिलचस्प यह कि टेस्ला के साथ काम करने के दौरान ही एडिसन के आगे यह साफ होने लगा था वह न सिर्फ दुनिया के एक ऐसे मस्तिष्क के साथ काम कर रहा है, जो समय की दूरी को विज्ञान से पाटने की काबिलियत रखता है। बात ऊर्जा के विकल्प या इसके सतत स्रोत को लेकर भविष्यदर्शी बात करने की हो या फिर तरंगों के जरिए विस्तार और नियंत्रण के नियमन की, टेस्ला ये सारी बातें उस दौर में सैद्धांतिक प्रामाणिकता के साथ कह रहे थे, जब बिजली के दो तारों से एक बल्ब के जलने को महान आविष्कार ठहराया जा रहा था।

इसे विश्व इतिहास का दुर्भाग्य कहें या विज्ञान जगत का शोक कि टेस्ला को अपने साथ काम करने के लिए या तो एडिसन जैसे सहयोगी मिले, जिनके लिए विज्ञान कमाई और प्रचार का जरिया था या फिर ऐसे लोग जिनके लिए टेस्ला हमेशा रहस्यमयी या अविश्वसनीय बने रहे।
एक ऐसे दौर में जहां एक तरफ तो उत्तर आधुनिकता की चौंध है, वहीं दूसरी तरफ ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की समझ इस ऊंचाई पर पहुंच गई है कि ईश्वर के अंत की घोषणा के बाद दुनिया को सत्य से आगे सत्येत्तर (पोस्ट ट्रुथ) होने-देखने की हड़बड़ी है; टेस्ला के बारे में बातें करना जरूरी भी है और दिलचस्प भी।

अध्यात्म और विज्ञान

जो लोग इतिहास और भविष्य के बीच शताब्दियों के सबक को याद करना जरूरी समझते हैं, उनके लिए भी यह चमत्कृत कर देने वाली बात है कि डेढ़ सदी पहले दुनिया में एक ऐसा शख्स जन्म ले चुका था, जिसके दिमाग के बारे में कहा गया कि वह कैमरे की तरह काम करता है। आठ भाषाओं पर बराबर की महारत रखने वाले टेस्ला कल्पना और विज्ञान को एक सतह पर ला खड़ा करने वाले शख्सियत थे।
वे एक तरफ विवेकानंद जैसे संत से मिलकर अध्यात्म और विज्ञान के सत्य को एकीकृत देखने की सूक्ष्म समझ तक पहुंच गए थे, वहीं दूसरी तरफ बिंदु और ब्रह्मांड के वैदांतिक सूत्र को वैज्ञानिक सम्मति देने की ललक से भर उठे थे। अगर यह सब समय से और सहजता से संपन्न होता तो अध्यात्म और विज्ञान का ध्रुवीय अलगाव आज एकीकृत सिद्धांत का नाम होता।

कई आविष्कार

10 जुलाई 1856 को जन्म लेने वाले टेस्ला आॅस्ट्रियाई नागरिक थे, लेकिन बाद में उन्होंने अमेरिका की नागरिकता ले ली थी। टेस्ला ही वो शख्स थे जिन्होंने एसी करंट का आविष्कार किया। एडिसन ने डीसी (डायरेक्ट करंट) का आविष्कार जरूर किया था, लेकिन डीसी करंट के साथ मुश्किल यह थी कि वह लंबी दूरी तक नहीं भेजा जा सकता था। इसलिए टेस्ला का आविष्कार काफी महत्त्वपूर्ण साबित हुआ। इसी तकनीक पर आज दुनियाभर में बिजली की आपूर्ति होती है।

इसी तरह 1898 में टेस्ला ने एक नाव बनाई जो रिमोट से चलती थी। यह आविष्कार अपने वक्तसे इतना आगे का था कि लोगों को लगा कि टेस्ला ने प्रशिक्षित जानवर को उसके अंदर डाल रखा है। यही वह आविष्कार था जो आज तीन ‘एडवांस टेकनीक’में काम आता है। दुनिया का पहला रोबोट, दुनिया की पहली गाइडेड मिसाइल और दुनिया का पहला रिमोट कंट्रोल, ये तीनों आविष्कार टेस्ला ने एक ही प्रयोग में कर डाले थे।

टेस्ला को भविष्य का वैज्ञानिक कहा जाता है। उनसे जुड़े अध्ययन बताते हैं कि उन्होंने 1926 में ही स्मार्टफोन का खयाल बुन लिया था। टेस्ला ही थे जिन्होंने पहला पनबिजली स्टेशन बनाया। उन्होंने ही सिद्धांत दिया कि रेडियो तरंगें पूरी दुनिया में भेजी जा सकती हैं। उन्होेंने ‘रेडियो कॉइल’ का भी आविष्कार किया और इसी तकनीक पर आज रेडियो, टेलिफोन, सेलफोन और टीवी चलते हैं।

धोखा और असहयोग

टेस्ला अपने जीवन में किस तरह संदेह, धोखा और असहयोग के शिकार होते गए, इसके एकाधिक प्रसंग हैं। मसलन, टेस्ला एक ‘ग्लोबल वायरलेस कम्यूनिकेशन सिस्टम’ तैयार करना चाहते थे। योजना एक बड़े इलेक्ट्रिक टावर से पूरी दुनिया के साथ सूचनाएं साझा करने और दुनिया को मुफ्त बिजली देने की थी। इसके लिए उन्हें निवेशकों के एक समूह से पैसे मिल गए थे। पर जब लांग आइसलैंड में प्रयोगशाला और बड़ा ट्रांसमिशन टॉवर बनाने का काम शुरू किया तो निवेशकों को उनकी योजना पर संदेह होने लगा। उन्हीं दिनों एडिसन की तरह मार्कोनी ने भी टेस्ला के लिए आगे की राह मुश्किल कर दी और अपने लिए अवसरवादी अनुकूलता हासिल की।

मार्कोनी ने एंड्रू कार्नेगी और थॉमस एडिसन के वित्तीय सहयोग से अपनी रेडियो टेक्नोलॉजी में काफी तरक्की की। ऐसे में टेस्ला के पास अपनी परियोजना को बीच में ही छोड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। 1917 में टेस्ला को दीवालिया घोषित कर दिया गया। उनका बनाया टॉवर तोड़ दिया गया और मलबे से बकाया कर्ज की वसूली की गई।

जीवन के अंतिम कुछ वर्ष टेस्ला ने न्यूयॉर्क के एक होटल में बिताए। सात जनवरी 1943 को उनका निधन हो गया। उनकी मौत के बाद अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने मार्कोनी के कुछ अहम पेटेंट अमान्य कर दिए और टेस्ला के रेडियो से जुड़े आविष्कारों को बाद में मान्यता मिली।

मिथकीय पुरुष

टेस्ला के बारे में आज बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है और ज्यों-ज्यों उनके बारे में नई जानकारियां और शोध सामने आ रहे हैं, उनके साथ यह तथ्य भी रेखांकित हो रहा है कि विज्ञान की दुनिया अपनी नैतिकता बहुत पहले खो चुकी थी। लिहाजा, शोध और आविष्कार के कारण यशस्वी करार दिए जाने का इतिहास प्रतिभा से खिलवाड़ का भी इतिहास है।

इस महान वैज्ञानिक से से जुड़े मिथकों का दायरा कितना बड़ा और रहस्यमयी है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि टेस्ला इस धरती के वासी थे ही नहीं। वे एक एलियन थे या यह भी कि वे एलियंस के साथ बात करते थे, उन्हें लेकर इस तरह का भ्रम या मान्यता उनके जीवित रहते ही प्रचलित हो चुकी थी।

जीवन के अंतिम दिनों में टेस्ला कबूतरों से बातें करते थे। खासतौर पर एक सफेद मादा कबूतर से। वे उस कबूतर पर मोहित हो चुके थे। उस कबूतर ने टेस्ला की बांहों में ही अंतिम सांस ली। टेस्ला ने तब घोषणा की कि वह जान गया है कि उसने इस जिंदगी का अपना काम संपन्न कर लिया है।

रहस्य और विज्ञान के 86 बसंत

टेस्ला अपने जीवन में ही यह मानने लगे थे कि वो जो कुछ भी करना चाहते हैं, दुनिया अभी उसके लिए तैयार नहीं है। यही कारण है कि वे जीवन के अंतिम दिनों में कुछ विचलित भी रहे। अलबत्ता यही वह दौर भी था, जब उनके बारे में लोगों की जिज्ञासाएं भी बढ़ रही थीं।

1931 में उन्हें ‘टाइम’ पत्रिका के आवरण पर जगह मिली, उस वक्त वे 75 साल के थे। ‘टाइम’ ने उनके किए तमाम आविष्कारों की चर्चा की थी और बताया था कि टेस्ला कैसे अपने आविष्कारों के जरिए एक ऐसी दुनिया रचने में लगे हैं, जहां विज्ञान चमत्कार से आगे व्यवहार का हिस्सा हो।

उनके बारे में 1934 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने लिखा कि टेस्ला ‘डेथ बीम’ पर काम कर रहे थे, जो आकाश में उड़ रहे दुश्मन के दस हजार जहाजों को एक साथ मारने में सक्षम था। टेस्ला ने इसे बनाने के लिए उस वक्तके बड़े कारोबारी जेपी मोर्गन से अनुदान की बात की लेकिन उसे अतीत में सहायता करने वाले मोर्गन ने और पैसे देने से इनकार कर दिया।

हालांकि, टेस्ला ने सोवियत संघ से 25 हजार डॉलर का प्रस्ताव मिला था, लेकिन परियोजना परवान नहीं चढ़ सकी। 1943 में जब उनकी मृत्यु हुई तो वे 86 साल के थे और अपने कई अधूरे प्रयोगों और परियोजनाओं के कारण कर्ज में बेतरह डूबे थे। साधन और सहयोग के बिना एक ऐसी असाधारण प्रतिभा दुनिया से विदा हो गई, जो मानवता को बहुत कुछ देना चाहती थी।

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