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मोदी सरकार ने तीन साल चुप रहकर बदल दिया प्रणब मुखर्जी का फैसला, बना दिया मनपसंद IIT चेयरपर्सन

मोदी सरकार ने तीन साल की चुप्पी के बाद पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के एक मंजूर प्रस्ताव को बदल दिया। इस प्रस्ताव को बिना वापस लिए ही सरकार ने आईआईटी रुड़की में कोकोदकर की जगह रेड्डी को अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

IIT, iit roorkee, pranab mukharjeeमोदी सरकार ने बदल दिया पूर्व राष्ट्रपति का यह फैसला।

सरकार ने IIT रुड़की के चेयरपर्सन की नियुक्ति के मामले में चुपचाप फेरबदल कर दिया। दरअसल पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने वैज्ञानिक अनिल काकोदकर को अध्यक्ष नियुक्त करने को मंजूरी दी थी लेकिन तीन साल के बाद किसी और की नियुक्ति कर दी गई। खास बात यह है कि शिक्षा मंत्रालय ने बिना पहले के अप्रूवल की वापसी के ही नया प्रपोजल पेश कर दिया और बीवीआर मोहन रेड्डी की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति से मंजूरी ले ली। रेड्डी को आईआईटी हैदराबाद के साथ रुड़की का भी अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया।

सूत्रों का कहना है कि पूर्व मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के साथ कुछ अनबन की वजह से काकोदकर की नियुक्ति रोक दी गई थी। केआर नारायणन के वक्त राष्ट्रपति भवन में अधिकारी रहे एक शख्स ने बताया, ‘पहले वाले अप्रूवल को वापस लिए बिना ही नया प्रस्ताव लाना सही नहीं है। अगर प्रणव मुखर्जी ने मंजूरी दे दी थी तो इसे लागू करना चाहिए।’ शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने कन्फर्म किया है कि पहले वाले प्रस्ताव के वापसी के लिए कोई भी निवेदन राष्ट्रपति भवन नहीं भेजा गया था।

राष्ट्रपति भवन के अधिकारी ने कहा, ‘अगर पहले वाले मंजूर प्रस्ताव को सुपरसीड नहीं किया गया तो इसका मतलब है कि पहले वाली मंजूरी अब भी लागू होतीहै। ऐसे में मंत्रालय नया प्रस्ताव कैसे ला सकता है। कानूनी तौर पर यह गलत फैसला है।’ प्रकाश जावेड़कर ने काकोदकर की नियुक्ति का प्रस्ताव दिया था और अपना कार्यकाल खत्म करने से कुछ दिन पहले ही प्रणव मुखर्जी ने इसे मंजूरी दे दी थी। हालांकि 2015 में काकोदकर की स्मृति ईरानी के साथ अनबन हो गई। उन्होंने IIT बॉम्बे के चेयरपर्सन पद से इस्तीफा दे दिया।

स्मृति ईरानी ने एक टीवी इंटरव्यू में बताया था कि काकोदकर ने अपने लोगों को डायरेक्टर का पद देने की कोशिश की। हालांकि काकोदकर ने इसे झूठा आरोप करार दिया था। उन्होंने IIT पटना, भुवनेश्वर और रोपड़ में हुई नियुक्तियों में अहम रोल निभाया था। 2018 में राष्ट्रपति कार्यालय ने मंत्रालय से काकोदर की नियुक्ति के बारे में पूछा। इससे पहले राष्ट्रपति भवन ने विश्व भारती के कुलपति की नियुक्ति के प्रस्ताव को वापस लिया था लेकिन काकोदकर के केस में ऐसा नहीं हुआ।

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