भारत में रोजाना औसतन एक करोड़ से दस करोड़ कंटेंट सोशल मीडिया पर पोस्ट किये जाते हैं। इन सबके बीच सरकार ने सोशल मीडिया पर सख्ती बढ़ाई है। सरकार ने पिछले पांच महीनों में औसतन हर 68 सेकंड में एक ब्लॉकिंग आदेश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को दिया। पिछले पांच महीनों में लगभग 1.95 लाख ऐसे ब्लॉकिंग आदेश दिए गए हैं। यानी सरकार ने हर दिन 1275 ब्लॉकिंग आदेश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भेजे हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस को मिले डेटा के मुताबिक इस साल मार्च और जुलाई के बीच इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर भेजे जाने वाले ऑनलाइन कंटेंट पर रोक लगाने के लिए सरकार के निर्देशों में बढ़ोतरी देखी गई है। खास बात यह है कि इस समय में दिल्ली के जंतर-मंतर पर एग्जाम लीक के खिलाफ छात्रों का विरोध प्रदर्शन भी शामिल था, जो जून की शुरुआत में शुरू हुआ था। प्रदर्शन 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म किया गया था।
तेजी से बढ़ा आंकड़ा
इस बढ़ोतरी को समझने के लिए पिछले साल द इंडियन एक्सप्रेस को मिले RTI रिकॉर्ड से पता चला कि अक्टूबर 2024 और अक्टूबर 2025 के बीच सहयोग पोर्टल के ज़रिए 19 ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कुल 2,312 ब्लॉकिंग आदेश भेजे गए। यानी हर दिन औसतन छह ऐसे आदेश भेजे गए थे।
इंस्टाग्राम को मिले अधिक आदेश
हालांकि महीने का ब्रेक-अप मौजूद नहीं है, लेकिन एक सीनियर सरकारी अधिकारी ने कहा कि ब्लॉकिंग ऑर्डर का बड़ा हिस्सा विरोध प्रदर्शनों के दौरान खासकर इंस्टाग्राम पर जारी किया गया था। हैरानी की बात है कि तीनों प्लेटफॉर्म में से इंस्टाग्राम को सबसे अधिक आदेश भेजे गए। इंस्टाग्राम को पांच महीने के समय में लगभग 1 लाख ब्लॉकिंग आदेश मिले, जो कुल आदेश का लगभग आधा है। फेसबुक जिसके यूजर ग्रोथ में दुनिया भर में कमी आई है, उसको लगभग 80,000 आदेश मिले, जबकि यूट्यूब को लगभग 15,000 मिले।
कुल मिलाकर मेटा के मालिकाना हक वाले प्लेटफॉर्म फेसबुक और इंस्टाग्राम को तीनों कंपनियों को जारी किए गए हर 10 आदेशों में से लगभग 9 आदेश मिले। इन आंकड़ों में ब्लॉकिंग ऑर्डर भी शामिल हैं, जिनमें से हर आदेश सैकड़ों अलग-अलग कंटेंट या अकाउंट को कवर कर सकता है, जिनमें से ज़्यादातर गृह मंत्री के सहयोग पोर्टल (ब्लॉकिंग नोटिस भेजने के लिए बनाया गया एक प्लेटफॉर्म) के ज़रिए अलग-अलग केंद्रीय और स्टेट एजेंसियों द्वारा जारी किए गए हैं।
सहयोग पोर्टल के जरिए मिला आदेश
गृह मंत्रालय की 2024-25 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक पूरे साल में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) एक्ट के सेक्शन 79(3)(b) के तहत मार्च 2025 तक 1.11 लाख से ज़्यादा ‘संदिग्ध ऑनलाइन कंटेंट’ ब्लॉक किए गए, जिसमें सहयोग पोर्टल के ज़रिए भी कंटेंट शामिल है। ब्लॉक करने के आदेश कितने बड़े हैं, यह कहानी का सिर्फ़ एक हिस्सा है, दूसरा हिस्सा मेटा का जवाब है।
इंडियन एक्सप्रेस को पता चला है कि सरकार की तय तीन घंटे की टेकडाउन टाइमलाइन का पालन करने के लिए मेटा ने अपने API (एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफ़ेस) को सहयोग पोर्टल के साथ इंटीग्रेट कर दिया है, जिससे सिस्टम पर अपलोड किए गए सरकारी निर्देशों के ज़रिए फ़्लैग किए गए कंटेंट को कंपनी द्वारा अलग से इंसानी रिव्यू किए बिना, अपने प्लेटफ़ॉर्म से अपने आप हटाया जा सकता है।
इस ऑटोमेशन से मेटा के लिए इन कंटेंट टेक-डाउन निर्देशों का पालन करने से पहले उनमें से किसी का भी रिव्यू करने या उन्हें चुनौती देने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। सोशल मीडिया पर यूजर्स द्वारा शेयर की गई जानकारी के अनुसार इंस्टाग्राम पर सेंसरशिप अभियान में छात्रों के प्रदर्शन, सरकार की इथेनॉल फ्यूल ब्लेंडिंग पॉलिसी की आलोचना, और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से जुड़े कंटेंट के साथ-साथ डीपफेक को सपोर्ट करने वाले कई पोस्ट को टारगेट किया गया।
केजरीवाल का दावा
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि उनके कुछ इंस्टाग्राम पोस्ट भारत में ब्लॉक कर दिए गए थे। डिजिटल राइट्स एक्टिविस्ट का कहना है कि मेटा द्वारा अपनाया जा रहा ऑटोमेटेड टेकडाउन मैकेनिज्म खतरनाक है, क्योंकि कंपनियों को कानूनी तौर पर कंटेंट तभी टेकडाउन करना होता है जब उन्हें किसी कानूनी आदेश की असली जानकारी मिलती है।
API का विरोध
दिल्ली में मौजूद इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के वकील और फाउंडर डायरेक्टर अपार गुप्ता ने कहा, “एक API जो अपने आप टेकडाउन करता है, उसे इसकी कोई जानकारी नहीं होती। मेटा में कोई भी आदेश नहीं पढ़ता। कोई यह चेक नहीं करता कि यह तय रैंक के किसी ऑफिसर से आया है या नहीं या इसमें वे कारण बताए गए हैं जिनकी अब बदले हुए नियम में ज़रूरत है। मशीन-टू-मशीन एग्जीक्यूशन एक कंडीशनल लीगल ड्यूटी को बिना शर्त कम्प्लायंस में बदल देता है।”
IT एक्ट, 2000 के सेक्शन 79(3)(b) के तहत इनमें से कई आदेश गृह मंत्रालय के सहयोग पोर्टल के ज़रिए जारी किए जाते हैं, जिससे तीनों सोशल मीडिया कंपनियां जुड़ गई हैं। इस प्रोविज़न के मुताबिक, प्लेटफॉर्म्स को उन पोस्ट को हटाना होता है जिन्हें अलग-अलग सरकारी और कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने गैर-कानूनी माना है ताकि उन्हें यूजर-जनरेटेड कंटेंट से मिली लीगल इम्युनिटी बनी रहे।
भारत बड़ा मार्केट
हालांकि, ये टेकडाउन आदेश सरकार द्वारा IT एक्ट के सेक्शन 69(A) के तहत जारी किए गए आदेश के अलावा हैं, जिसका इस्तेमाल ऑनलाइन सेंसरशिप के निर्देश जारी करने के लिए किया जाता है, लेकिन यह ज़्यादातर राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक आदेश से जुड़े अपराधों तक ही सीमित है। भारत में 60 करोड़ से ज़्यादा सोशल मीडिया यूजर हैं और अनुमान है कि देश में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर रोज़ाना 1 करोड़ से 10 करोड़ के बीच कंटेंट पोस्ट किया जाता है, जो टॉप टेक कंपनियों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा यूज़र बेस मार्केट है।
हालांकि सोशल मीडिया पर पोस्ट की संख्या हमेशा सरकारों से मिलने वाले टेकडाउन नोटिस के अनुपात में नहीं हो सकती है। उदाहरण के लिए मेटा की ताजा पारदर्शिता रिपोर्ट के अनुसार जुलाई-दिसंबर 2025 के बीच, कंपनी ने इंडोनेशिया में 2 करोड़ 30 लाख से ज़्यादा कंटेंट हटाया, जिसका यूजर बेस भारत के एक तिहाई से भी कम है। इसी समय में कंपनी ने भारत में 41,000 से ज़्यादा कंटेंट हटाए, हालांकि यह संख्या जनवरी-जून 2025 के बीच प्लेटफॉर्म द्वारा ब्लॉक किए गए 28,000 कंटेंट से दोगुनी से भी ज़्यादा थी।
क्यों कंटेंट ब्लॉक करता है मेटा?
मेटा का यह भी कहना है कि जब वह सरकारों और कोर्ट से कानूनी आग्रह के आधार पर कंटेंट ब्लॉक करता है, तो ज़्यादातर मामलों में वह यूज़र्स को बताता है कि किस स्टेट अथॉरिटी ने रिक्वेस्ट भेजी थी, जिसके कारण रोक लगाई गई थी। हालांकि, भारत और कुछ दूसरे मार्केट में कानूनी ज़िम्मेदारियों और रेगुलेटरी बातों के कारण ऐसा नहीं है।
मेटा, गूगल को भेजे गए सवालों का पब्लिकेशन तक कोई जवाब नहीं मिला। गृह मंत्रालय और IT मंत्रालय ने इस मुद्दे पर सवालों का जवाब नहीं दिया। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि कंपनियों को सरकार के ब्लॉकिंग के आदेशों का पालन बढ़ाने के लिए जिस चीज़ ने मजबूर किया है, वह है कंटेंट को पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से हटाना। फरवरी में IT मंत्रालय ने इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 में बदलावों को नोटिफाई किया, जिसमें 24-36 घंटे के बजाय 2-3 घंटे के अंदर कंटेंट हटाने की विवादित जरूरत थी।
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