विदेशी अनुदान विनियमन (संशोधन) विधेयक (FCRA) को लेकर चल रहे गतिरोध के बीच सरकार इसे जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (JPC) के पास भेजने के बारे में सोच रही है। मंगलवार को सूत्रों ने यह जानकारी इंडियन एक्सप्रेस को दी। बता दें कि यह बिल सदन में विचाराधीन है। विपक्ष इस बिल की वापसी की मांग पर अड़ा है जबकि सरकार किसी भी हाल में इसे पारित कराना चाहती है। इसी संघर्ष के बीच यह बिल JPC के समक्ष भेजा जा सकता है।

मानसून सत्र में भी पास नहीं हो सका यह बिल

बता दें कि FCRA विधेयक इसी साल बजट सत्र के दौरान लोकसभा में पेश किया गया था, लेकिन विपक्ष के लगातार हंगामे की वजह से इस बिल पर चर्चा नहीं हो पाई इसे कराना तो दूर की बात। विपक्षी पार्टियां इस विधेयक के खिलाफ हैं। कांग्रेस, TMC, लेफ्ट पार्टियों और DMK समेत विपक्षी दल इस विधेयक को पूरी तरह से वापस लेने की मांग पर अड़े हैं। इस बीच एक केंद्रीय मंत्री ने एक्सप्रेस को बताया है कि बिल में इसका विरोध करने जैसा कुछ भी नहीं है। यह किसी भी समुदाय के खिलाफ नहीं है। हालांकि, हम बिल को आगे की बातचीत के लिए JPC को भेजने के लिए तैयार हैं। हालांकि मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हो जाएगा।

FCRA विधेयक के JPC के पास जाने पर पॉलिटिकल पार्टियां

  • FCRA कानून को लेकर विपक्ष लगातार इसे वापस लेने की मांग कर रहा है तो वहीं सिविल सोसाइटी और धार्मिक संस्थाओं (खासकर चर्च) ने इस इस विधेयक पर आपत्ति जताई है।
  • CPM के एक सांसद ने कहा है, “इस बिल के जरिए सरकार विदेशी चंदे के इस्तेमाल को रेगुलेट करने की कोशिश नहीं कर रही है। यह असल में उन्हें लेने वाले ऑर्गनाइजेशन को रेगुलेट करने की कोशिश की जा रही है। यह कतई मंजूर नहीं किया जाएगा। बिल के प्रोविजन बहुत सख्त हैं। हम चाहते हैं कि बिल पूरी तरह से वापस ले लिया जाए। लेकिन अगर सरकार बिल वापस नहीं लेना चाहती है, तो हमें इसे JPC को भेजने में कोई दिक्कत नहीं है।”
  • कांग्रेस ने भी कहा है कि बिल वापस लिया जाना चाहिए। हालांकि सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी भी इसे JPSC को भेजने पर राजी होगी।
  • DMK MP पी विल्सन पिछले हफ्ते चर्च लीडर्स के एक डेलीगेशन के साथ अमित शाह से मिले थे और बिल के प्रोविजन को क्रिश्चियन कम्युनिटी के लिए नुकसानदायक माने जाने पर चिंता जताते हुए एक मेमोरेंडम सौंपा था। मेमोरेंडम में बिल को वापस लेने या इसे JPC को भेजने की मांग की गई थी तो ऐसे में DMK भी इसे JPC के पास भेजने पर राजी होगी।
  • मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात की थी और राज्य के क्रिश्चियन कम्युनिटी की चिंताओं से उन्हें अवगत कराया था।

इस विधेयक को JPC के पास भेजे जाने के मायने

अगर सरकार FCRA विधेयक को JPC के पास भेजती है तो इस फैसले को केरल और तमिलनाडु में ईसाई समुदाय तक उसकी राजनीतिक पहुंच के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। BJP केरल में अपनी चुनावी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है और ईसाई समुदाय के साथ रिश्ते बनाने की पूरी कोशिश कर रही है, जिसका सपोर्ट उसे राज्य में भविष्य में किसी भी चुनावी बढ़त के लिए जरूरी लगता है।

यह समय इसलिए भी अहम है क्योंकि BJP, DMK का सपोर्ट उस डिलिमिटेशन बिल पर हासिल करने की कोशिश कर रही है जिसे सरकार जल्द ही लाने की योजना बना रही है। हालांकि सरकार के पास बिल को पार्लियामेंट से पास कराने के लिए नंबर हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि सरकार बिना सही चर्चा के बिल पास नहीं करना चाहती।

JPC क्या है?

JPC और सेलेक्ट कमेटी, दोनों ही एड हॉक कमेटियां हैं जो किसी बिल की ज्यादा डिटेल में जांच करने के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन मुख्य अंतर उनकी बनावट में है। JPC में संसद के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं और इसका स्ट्रक्चर लोकसभा और राज्यसभा द्वारा पास किए गए प्रस्तावों से तय होता है, जबकि सेलेक्ट कमेटी एक सदन द्वारा बनाई जाती है और इसमें सिर्फ उसी सदन के सदस्य होते हैं।

दोनों ही मामलों में, कमेटी बिल की हर क्लॉज की जाँच कर सकती है। सरकार और स्टेकहोल्डर्स की बात सुन सकती है, सबूत मांग सकती है और बदलाव के भी सुझाव दे सकती है। इसकी सिफारिशें सरकार पर लागू नहीं होतीं। हालांकि उनका पार्लियामेंट में काफी वजन होता है। JPC को आम तौर पर एक बड़े सिस्टम के तौर पर देखा जाता है क्योंकि यह दोनों सदनों के MPs को जांच प्रोसेस में शामिल करती है।