सरकार की डीप-टेक कंपनियों को आर्थिक मदद देने वाली योजना फिलहाल अटक गई है। इस योजना के तहत रिसर्च करने वाली नई निजी कंपनियों को फंड दिया जाना था। कंपनियों का चयन करने वाली एजेंसी को पहले चरण के बाद अभी तक आगे की रकम नहीं मिली है। इसलिए वह नई कंपनियों को फंड देने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा पा रही है। ऐसे में एकमात्र एजेंसी ने नए आवेदन लेना बंद करने का फैसला किया है। द इंडियन एक्सप्रेस को यह जानकारी मिली है।
मंगलवार को टेक्नोलॉजी डिवेलपमेंट बोर्ड (TDB) ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर एक नोटिस जारी किया। इसमें कहा गया है कि ‘प्रशासनिक कारणों’ से इस महीने के बाद फंडिंग के लिए नए आवेदन लेना बंद कर दिया जाएगा। TDB, डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (DST) के तहत काम करने वाली एक वैधानिक संस्था है।
हालांकि कई सूत्रों ने बताया कि 1 लाख करोड़ रुपये के रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (RDI) फंड के तहत कंपनियों का चयन करने वाली फिलहाल एकमात्र एजेंसी TDB को नई कंपनियों को फंड देने के लिए जरूरी रकम अभी तक नहीं मिली है।
DST को अब तक 23000 करोड़ रुपये का बजट
नियमों के मुताबिक, यह पैसा DST को जारी करना होता है। DST ही RDI फंड का प्रशासनिक जिम्मेदार विभाग है। सरकार ने DST को इस योजना के लिए अब तक 23,000 करोड़ रुपये का बजट दिया है। इसमें पिछले साल के बजट में 3,000 रुपये करोड़ और इस साल के बजट में 20,000 करोड़ रुपये शामिल हैं।
DST सचिव उमेश वाघमारे से टिप्पणी के लिए कई बार संपर्क किया गया लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया। द इंडियन एक्सप्रेस ने उनके आधिकारिक ईमेल पर भी सवाल भेजे थे।
इस साल की शुरुआत में टीडीबी को इस फंड के तहत 2000 करोड़ रुपये मिले थे। अप्रैल में कंपनियों के चयन के पहले दौर में यह पूरी रकम खर्च हो गई। इस दौरान 22 कंपनियों को कुल 2192 करोड़ रुपये के सॉफ्ट लोने देने की मंजूरी दी गई।
10 अगस्त को द इंडियन एक्सप्रेस ने बताया था कि इन 22 कंपनियों में से 15 के निवेश संबंध, चयन समिति के सात सदस्यों से जुड़े थे। इससे हितों के टकराव और प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे थे। हालांकि, इन सदस्यों ने कहा था कि जिन कंपनियों से उनके संबंध थे, उनके मूल्यांकन की प्रक्रिया से उन्होने खुद को अलग कर लिया था।
सूत्रों के मुताबिक, TDB ने अगस्त में फंडिंग के दूसरे दौर के लिए कंपनियों का चयन पूरा कर लिया था। इसके बाद कुछ और आवेदनों की जांच और चयन की प्रक्रिया शुरू की गई लेकिन बाद में इसे रोक दिया गया। सूत्रों ने बताया कि दूसरे दौर में चुनी गई कंपनियों को TDB अभी तक लेटर ऑफ इंटेंट भी जारी नहीं कर पाया है।
300 से ज्यादा कंपनियां कर चुकीं आवेदन
अब तक 300 से ज्यादा कंपनियां इस योजना के तहत फंड के लिए आवेदन कर चुकी हैं। इनमें से करीब 100 कंपनियों के आवेदनों की जांच की जा चुकी है और 35 कंपनियों का चयन हुआ है। इनमें 22 कंपनियां पहले दौर और 13 कंपनियां दूसरे दौर में चुनी गईं।
पहले दौर में चुनी गई कंपनियों में अंतरिक्ष क्षेत्र की अग्निकुल कॉसमॉस (Agnikul Cosmos) और गैलेक्सीआई (GalaxEye), क्वांटम टेक्नोलॉजी की क्यूनू लैब्स (QuNu Labs) और रोबोटिक्स क्षेत्र की आइडियाफोर्ज (ideaForge) और एंड्योरएयर (EndureAir) जैसी कंपनियां शामिल थीं।
सरकार ने नवंबर 2025 में RDI फंड शुरू किया था। इसका मकसद क्वांटम, स्पेस, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए और अहम क्षेत्रों में रिसर्च करने वाली कंपनियों को आर्थिक मदद देना था। इसमें ऐसी स्टार्टअप कंपनियां भी शामिल हैं जो अपना पहला प्रोडक्ट तैयार कर रही हैं।
इस फंड का उद्देश्य उन तकनीकों के लिए पैसा जुटाने में मदद करना था जिन्हें देश की आर्थिक तरक्की और रणनीतिक आत्मनिर्भरता के लिए जरूरी माना गया है।
इस योजना के तहत छह साल में 1 लाख करोड़ रुपये देने का लक्ष्य रखा गया था। इसमें ज्यादातर पैसा कम ब्याज वाले लंबी अवधि के कर्ज के रूप में दिया जाना था। यह फंड अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) के तहत रखा गया है। ANRF एक स्वतंत्र वैधानिक संस्था है और प्रशासनिक रूप से DST के अधीन है।
RDI फंड के तहत निजी कंपनियों को किसी रिसर्च प्रोजेक्ट की कुल लागत का 50 फीसदी तक लंबी अवधि का सस्ता कर्ज दिया जा सकता है। बाकी 50 फीसदी रकम कंपनी को गैर-सरकारी स्रोतों से जुटानी होगी।
नियमों के मुताबिक, फंड पाने वाली कंपनियों का चयन सेकंड लेवल फंड मैनेजर (SLFM) नाम की एजेंसियां करेंगी। शुरुआत में निजी कंपनियों को फंड देने का अनुभव रखने वाली दो सरकारी संस्थाओं को SLFM बनाया गया था। इनमें टेक्नोलॉजी डिवेपलमेंट बोर्ड (TDB) और जैव प्रोद्योगिकी विभाग के तहत आने वाली बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) शामिल हैं।
बड़ी रकम को देखते हुए निजी क्षेत्र की करीब 30-40 अन्य संस्थाओं को भी SLFM के तौर पर नियुक्त किए जाने की उम्मीद थी। लेकिन फंड शुरू होने के करीब एक साल बाद भी अब तक सिर्फ 2192 रुपयेकरोड़ की रकम ही कंपनियों के लिए उपलब्ध कराई गई है। यह रकम TDB ने पहले दौर में चुनी गई कंपनियों के लिए तय की थी।
योजना की धीमी रफ्तार की सबसे बड़ी वजह
योजना की धीमी रफ्तार की सबसे बड़ी वजह नई SLFM एजेंसियों की नियुक्ति में देरी है। SLFM बनने के लिए आवेदन जनवरी में बंद हो गए थे और एक समिति ने मई में अपनी सिफारिशें भी दे दी थीं। इसके अलावा, दूसरी नामित SLFM एजेंसी BIRAC अभी कंपनियों के चयन की प्रक्रिया शुरू नहीं कर पाई है। इसकी वजह टैक्स से जुड़े कुछ नियमों और प्रक्रियाओं को लेकर स्थिति साफ नहीं होना है।
टीडीबी एक वैधानिक संस्ता है जबकि BIRAC एक गैर-लाभकारी कंपनी है जो कंपनी अधिनियम की धार 9 के तहत बनी है। RDI फंड के नियमों के तहत SLFM किसी चुनी हुई कंपनी को दिए गए कर्ज को इक्विटी यानी कंपनी में हिस्सेदारी में बदल सकता है। इससे मिलने वाले लाभांश पर टैक्स लग सकता है।
इसी वजह से BIRAC ने फंड से कंपनियों को पैसा देना शुरू करने से पहले वित्त मंत्रालय से इन मुद्दों पर स्थिति साफ करने को कहा है।
इंडस्ट्री से जुड़े एक सूत्र ने कहा, ”जिस रफ्तार से यह योजना चल रही है, उससे छह साल में 1 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य पूरा होना मुश्किल है। RDI फंड सरकार की एक अहम पहल है। यह पैसा भारत के टेक्नोलॉजी सेक्टर के विकास के लिए जरूरी है। कई कंपनियों को अपनी तकनीक को आगे बढ़ाने के लिए इस फंड की जरूरत है।”
