ताज़ा खबर
 

सरकार कर रही है संसद के शीतकालीन सत्र में तीन तलाक खत्म करने की तैयारी

भारतीय मुसलिम महिला संगठन और दूसरे महिला अधिकार समूह यह फैसला आने के बाद से कानून बनाए जाने की मांग करते रहे हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: November 22, 2017 3:29 AM
तीन तलाक का मुद्दा इन दिनों पूरे देश में सुर्खियों में है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मुसलिम समाज में जारी एक बार में तीन तलाक कहने की प्रथा को पूरी तरह खत्म करने के लिए सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में एक विधेयक लाने पर विचार कर रही है। सरकारी सूत्रों ने बताया कि उचित विधेयक लाने या मौजूदा दंड प्रावधानों में संशोधन पर विचार करने के लिए एक मंत्रीस्तरीय समिति का गठन किया गया है।  इसी साल 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में तीन तलाक की प्रथा को गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया था। माना जा रहा है कि इस फैसले के बावजूद जमीनी स्तर पर एक बार में तीन तलाक कहने की प्रथा जारी है। भारतीय मुसलिम महिला संगठन और दूसरे महिला अधिकार समूह यह फैसला आने के बाद से कानून बनाए जाने की मांग करते रहे हैं।
सूत्रों ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को प्रभावी बनाने के क्रम में सरकार इस मामले को आगे बढ़ा रही है और एक उचित विधेयक लाने या मौजूदा दंड प्रावधानों में संशोधन करने पर विचार कर रही है।  जिससे एक बार में तीन तलाक कहना अपराध माना जाएगा। विधेयक तैयार करने के लिए मंत्रीस्तरीय समिति का गठन किया गया है और इस संबंध में संसद के शीतकालीन सत्र में विधेयक लाने की तैयारी है।

तलाक-ए-बिद्दत मुसलिम समाज में लंबे समय से चली आ रही एक प्रथा है, जिसमें कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को एक बार में तीन बार तलाक बोलकर रिश्ता खत्म कर सकता है। सायरा बानो ने इस प्रथा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और इसी पर शीर्ष अदालत ने 22 अगस्त को फैसला सुनाया था।मुसलिम महिला अधिकार समूहों का कहना रहा है कि शीर्ष अदालत के फैसले के बाद भी तलाक-ए-बिद्दत की पीड़ित महिलाओं को व्यावहारिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। तलाक होने के बाद महिलाओं के पास एकमात्र रास्ता पुलिस से संपर्क करने का है और कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं होने पर उन्हें न्याय मिलना मुश्किल है। सूत्रों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी ‘तलाक-ए-बिद्दत’ के जरिए तलाक दिए जाने के कई मामले सामने आए हैं। जागरूकता के अभाव व दंड की व्यवस्था की कमी के चलते ऐसा हो सकता है।

अदालत के फैसले के तत्काल बाद सरकार ने कहा था कि तीन तलाक पर कानून की जरूरत शायद नहीं पड़े क्योंकि अदालती फैसला इस देश के कानून की शक्ल ले चुका है। उस वक्त सरकार की यह राय थी कि भारतीय दंड संहिता के प्रावधान ऐसे मामलों से निपटने के लिए प्रर्याप्त हैं।सरकार की ओर से विधेयक लाने की योजना को राजनीतिक कदम करार देते हुए आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फारूकी ने कहा कि अदालत के फैसले के बाद कानून की कोई जरूरत नहीं थी। हमें लगता है कि सरकार इस मामले पर राजनीति कर रही है। यह राजनीतिक कदम है। उधर भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) ने तीन तलाक को लेकर विधेयक लाए जाने की सरकार की योजना का स्वागत करते हुए मंगलवारको कहा कि सरकार हिंदू विवाह कानून की तर्ज पर एक मुसलिम परिवार कानून बनाने के लिए ऐसा विधेयक लाए जो कुरान पर आधारित हो और देश के संविधान से भी मेल खाता हो।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 जीएसटी: न खुदा ही मिला न विसाले-सनम
2 कांग्रेस का तंज- ‘ब्रह्मा’ पीएम नरेंद्र मोदी ही जानते हैं कि संसद की शीतकालीन सत्र कब शुरू होगा
3 जम्मू-कश्मीर के शहीद पुलिस कर्मियों के परिजनों को मिलने वाले मुआवजे में केंद्र सरकार करेगी दस गुने का इजाफा