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स्‍वतंत्रता सेनानी के परिवार को बताया ‘अतिक्रमणकारी’, सम्‍मान में मिली जमीन का मांग रहे किराया

30 अगस्त को गढ़वाली के परिवार को यह नोटिस दिया गया है। इसमें कहा गया है कि साल 1989 से 2004 तक लीज रेंट का भुगतान करने के साथ ही साल 2005 के बाद पहले तीस सालों के लिए लीज की रकम पचास फीसदी बढ़ोतरी के साथ निर्धारित की जाएगी।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

पेशावर विद्रोह के महानायक हवलदार मेजर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर उत्तराखंड में कई सरकारी योजनाएं चल रही हैं। राज्य में उनके नाम पर मेडिकल कॉलेज भी है और सचिवालय में सभागार भी उन्हें के नाम पर हैं। मगर स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने वाले मेजर चंद्र सिंह गढ़वाली के परिवार पर अब अतिक्रमणकारी होने का ठप्पा उत्तर प्रदेश के बिजनौर वन विभाग ने लगा दिया है। विभाग ने उनके परिवार को एक नोटिस भी भेजा है, जिसमें कहा गया है कि परिवार उस जमीन को वापस कर दे। इसके अलावा गढ़वाली के परिवार से कई गुना लीज रेंट भी मांगा गया है।

दरअसल तब संयुक्त यूपी के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने गढ़वाली को घर बनवाने के लिए बिजनौर वन विभाग की कोटद्वार-भाबर में गांव हल्दूखाता से सटे क्षेत्र में 10 एकड़ जमीन दी थी। खबर है कि इस जमीन की लीज रकम गढ़वाली के वंशज जमा नहीं कर पाए। इससे बिजनौर वन विभाग ने गढ़वाली के परिवार को अतिक्रमणकारी घोषित कर भूमि खाली करने के निर्देश दिए हैं। जानकारी के मुताबिक जमीन कुल नब्बे साल के लिए लीज पर दी गई थी। इसमें शर्त ये थी जमीन हर तीस साल बाद रिन्यू कराई जाए। गढ़वाली के बेटे आनंद और खुशाल सिंह की काफी कोशिशों के बाद भी वो लीज की रकम नहीं जमा करा पाए। इस दौरान दोनों का निधन भी हो गया। अब दोनों की पत्नियों को जमीन खाली करने के निर्देश दिए गए हैं।

30 अगस्त को गढ़वाली के परिवार को यह नोटिस दिया गया है। इसमें कहा गया है कि साल 1989 से 2004 तक लीज रेंट का भुगतान करने के साथ ही साल 2005 के बाद पहले तीस सालों के लिए लीज की रकम पचास फीसदी बढ़ोतरी के साथ निर्धारित की जाएगी। इसपर गढ़वाली की दोनों बहुओं का कहना है कि उनकी आर्थिक हालत ऐसी नहीं कि वो लीज की रकम जमा कर सकें।

कौन थे गढ़वाली?
23 अप्रैल 1930 को हवलदार मेजर चंद्र सिंह भंडारी के नेतृत्व में पेशावर गई गढ़वाली बटालियन को अंग्रेज अफसरों ने खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में भारत की आजादी के लिए लड़ रहे निहत्थे पठानों पर गोली चलाने का हुक्म दिया। मगर भंडारी ने यह हुक्म मानने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वो निहत्थे लोगों पर गोली नहीं चलाएंगे। पूरी बटालियन ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इसे इतिहास में पेशावर विद्रोह के नाम से जाना जाता है। इस बगावत के जुर्म में गढ़वाली और उनके 61 साथियों को कठोर कारावास की सजा दी गई। साथ ही अंग्रेजी हुकूमत ने गढ़वाली के पैतृक ग्राम दूधातोली में उनकी भूमि व मकान को भी कुर्क कर दिया।

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