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कोविड वैक्सीन पर सरकार ने कितना किया खर्च? सुप्रीम कोर्ट को केंद्र ने बताया

ब्रिटिश अखबार गार्जियन ने दो अप्रैल के अंक में लिखा है कि जब अमेरिका और पश्चिम यूरोप के देश वैक्सीनें विकसित करने के लिए अरबों डॉलर गला रहे थे, भारत ने सीरम इंस्टीट्यूट को कोई मदद नहीं दी थी।

सेंट्रल विस्टा पर 20-22 हजार करोड़ रुपए खर्च करने जा रही सरकार ने देश में कोविड वैक्सीनों के विकास के लिए कितना खर्च किया? आइए, पता करते हैं। पहले तो एक सवाल। क्या कोविशील्ड स्वदेशी वैक्सीन है? बिलकुल नहीं। यह वैक्सीन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और दवा कंपनी एस्ट्राज़ेनका के अनुसंधान का नतीजा है। क्या वैक्सीनों के विकास में भारत सरकार ने आर्थिक मदद दी? सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार ने कहा है कि हमने एक पैसा नहीं लगाया।

लेकिन, इमेज कुछ यही बनी कि सब कुछ भारत सरकार कर रही है। ऐसी धारणा 28 नवंबर से ही बनने लगी थी। उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुणे जाकर सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया का और हैदराबाद जाकर भारत बायोटेक लैब का दौरा किया था। सीरम इंस्टीट्यूट कोविशील्ड बनाती है और भारत बायोटेक कोवैक्सीन। हालांकि कोई दावा नहीं किया गया लेकिन जो छवि बनी वह यही थी कि वैक्सीनें भारत सरकार के नेतृत्व में बन रही हैं। इस छवि को टीके के बाद मिलने वाला प्रमाणपत्र और मजबूत कर देता है, जिस पर प्रधानमंत्री मोदी का चित्र अंकित होता है। नेतागण भी इस धारणा को बलवती करने वाले बयान देते आए हैं।

लेकिन, ब्रिटिश अखबार गार्जियन ने दो अप्रैल के अंक में लिखा है कि जब अमेरिका और पश्चिम यूरोप के देश वैक्सीनें विकसित करने के लिए अरबों डॉलर गला रहे थे, भारत ने सीरम इंस्टीट्यूट को कोई मदद नहीं दी थी। मदद भले ही न दी हो लेकिन इस वक्त तक भारत अनेक देशों को कोविशील्ड दे चुका था और उसकी जय-जयकार हो रही थी।

इस बात में दो राय नहीं कि कोविड महामारी से पहले वैक्सीन निर्माण में भारत दुनिया में नंबर एक था लेकिन अब अमेरिका और चीन आगे निकल गए हैं। आबादी की वजह से भारत का यह दावा बहरहाल, सही था कि वह दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चला रहा है।

गार्जियन की रिपोर्ट कितनी सच है इसका प्रमाण 11 मई को भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में दे दिया। उसने कोर्ट को बताया कि उसने पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और हैदराबाद के भारत बायोटेक को वैक्सीन रिसर्च के लिए कोई रकम नहीं दी। सीरम इंस्टीट्यूट को क्लीनिकल ट्रायल के लिए भी कोई रकम नहीं मिली। लेकिन, उन संस्थानों को कुछ मदद जरूर दी जो कोविशील्ड का क्लीनिकल परीक्षण कर रहे थे। सीरम के विपरीत भारत बायोटेक को क्लीनिकल ट्रायल के लिए 46 लाख रुपए जरूर मिले। यह रकम आइसीएमआर ने दी थी।

पिछले साल मई के महीने में कतिपय अखबारों में इस आशय की खबरें आ रही थीं कि वैक्सीन पर रिसर्च करने वाली कंपनियों को सौ करोड़ रुपए की मदद दी जाएगी। उस समय तक अमेरिका रिसर्च करने वाली कंपनियों को 15 हजार करोड़ की मदद दे चुकी थी। यही नहीं, वैक्सीन बनने से पहले ही उसने 40 करोड़ डोज़ का ऑर्डर दे दिया था।

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भले ही बाद में सरकार को कहना पड़ा हो कि वह वैक्सीन रिसर्च के लिए कुछ नहीं दे पाई, 12 नवंबर को वित्त मंत्री सीतारमन मीडिया को बता चुकी थीं कि वैक्सीन विकसित करने में लगी कंपनियों को 900 करोड़ की मदद दी जाएगी।

आज वैक्सीन की किल्लत के बीच ‘सब-कुछ-ठीक-है’ जैसे दावे हो रहे हैं। यहां सीरम इंस्टीट्यूट के मालिक अदार पूनावाला का पिछले साल का बयान महत्वपूर्ण है। पूनावाला ने पूछा था कि क्या भारत सरकार वैक्सीन खरीदने के लिए एक साल के अंदर 80 हजार करोड़ रुपए खर्च कर पाएगी? उन्होंने कहा था कि सरकार को इस संबंध में भारतीय और विदेशी मैन्यूफैक्चरर्स के साथ मिल बैठ कर योजना बनानी होगी ताकि वैक्सीनेश कार्यक्रम में कोई अड़चन न आए।

बाद में सरकार ने सीरम इंस्टीट्यूट को तीन हजार करोड़ और भारत बायोटेक को पंद्रह सौ करोड़ रुपए उधार देने की बात जरूर कही। इस बाबत बिजनेस स्टैंडर्ड ने रिपोर्ट लिखी थी। उसने अदार पूनावाला से इस रकम पर सवाल किया था। अदार ने कहा था कि उन्हे सरकार के आश्वासन पर विश्वास है। इसीलिए बैंक से उधार रकम ले ली है।

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