भारत के संसदीय इतिहास में 17 अप्रैल की तारीख एक अहम घटनाक्रम के रूप में याद रखी जाएगी। 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार को पहली बार लोकसभा में किसी बिल पर बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इसके अलावा परिसीमन से जुड़े दो अन्य संशोधन विधेयक भी सरकार को वापस लेने पड़े।
शुक्रवार को वोटिंग के वक्त लोकसभा में 528 सांसद मौजूद थे। बिल पास करने के लिए सरकार को 352 के मैजिक नंबर की जरूरत थी, लेकिन बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, वहीं विपक्ष 230 वोट पाने में कामयाब रहा। इस तरह सरकार 54 वोट से चूक गई और नारी शक्ति वंदन अधिनियम हकीकत नहीं बन पाया।
महिला आरक्षण पर अब क्या होगा?
इस बिल के गिरने का अर्थ है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण शायद अब लागू न हो पाए। अब 2026-27 की नई जनगणना के आंकड़े आने तक परिसीमन की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकेगी, और महिला आरक्षण को लेकर भी आगे नहीं बढ़ा जा सकेगा। ऐसे में जानकार मानते हैं कि 2033 से पहले महिला आरक्षण राजनीति में लागू होना मुश्किल है।
जानकारी के लिए बता दें कि मोदी सरकार को अपने 12 साल के कार्यकाल में इससे पहले भी संसद में विरोध झेलना पड़ा है। भूमि अधिग्रहण कानून और कुछ अन्य विधेयकों को लेकर सरकार को कदम पीछे भी खींचने पड़े थे, लेकिन तब सरकार वोटिंग के जरिए नहीं हारी थी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के मामले में सरकार ने वोटिंग करवाने का फैसला किया और 12 साल में पहली बार उसे हार का सामना करना पड़ा।
बीजेपी की आगे की रणनीति
संसद में मिली हार के बाद भाजपा ने अपनी नई रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। शनिवार को देशभर में बीजेपी विरोध प्रदर्शन करने वाली है। सोशल मीडिया के जरिए माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि विपक्ष किस तरह से महिला विरोधी रुख अपना रहा है। गृहमंत्री अमित शाह ने भी साफ तौर पर कहा है कि बीजेपी इसे एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में इस्तेमाल करेगी। सरकार इस समय पूरे विपक्ष को न सिर्फ महिला विरोधी, बल्कि दलित और आदिवासी विरोधी भी बताने की कोशिश कर रही है।
वहीं विपक्ष भी अपनी नई रणनीति के साथ तैयार है। अगर मोदी सरकार इंडिया गठबंधन को महिला विरोधी दिखा रही है, तो विपक्ष इसे ‘संविधान की जीत’ करार दे रहा है और ‘संविधान बचाने’ का तर्क सामने रख रहा है।
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