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नाहक नौ महीने जेल में रहे गोरखपुर के डॉ. कफील खान, दो साल बाद जांच में हुए बरी

जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि डॉ. खान न तो ऑक्सीजन सप्लाई की टेंडरिंग में शामिल थे, न ही उसके भुगतान या रख-रखाव के लिए जिम्मेदार थे। जांच कमेटी ने एक बड़ी बात कही है कि 10 से 12 अगस्त के बीच करीब 54 घंटों तक लिक्वि़ड ऑक्सीजन की सप्लाई की कमी थी।

डॉ. कफील खान।(फाइल फोटो/पीटीआई)

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के शिशु रोग विभाग के निलंबित डॉक्टर कफील खान को दो साल बाद विभागीय जांच समिति ने क्लीनचिट दे दिया है। 10 अगस्त 2017 को ऑक्सीजन की कमी की वजह से बीआरडी अस्पताल में 70 बच्चों की मौत हो गई थी। तब कफील खान को विभागीय लापरवाही, भ्रष्टाचार और ठीक से सरकारी ड्यूटी नहीं करने के आरोपों में सस्पेंड कर दिया गया था। खान को करीब नौ महीने तक जेल भी काटनी पड़ी थी। विभागीय जांच रिपोर्ट भी 16 अप्रैल को ही आ गई थी लेकिन खान को गुरुवार (26 सितंबर) को क्लीन चिट दी गई।

बता दें कि 10 अगस्त, 2017 की रात जब डॉ. कफील ड्यूटी पर थे, तब अचानक ऑक्सीजन की सप्लाई खत्म होते ही आईसीयू विभाग में भर्ती कई नवजात और बच्चों ने दम तोड़ दिया था। उस वक्त डॉ. कफील ने बच्चों को बचाने के लिए अस्पताल के बाहर से ऑक्सीजन सिलिंडर लाया था। इस घटना से शुरुआत में डॉ. कफील मीडिया में हीरो बनकर उभरे थे।

इसके थोड़े ही दिन बाद 22 अगस्त को उन्हें लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित कर दिया गया और उनके खिलाफ विभागीय जांच बैठा दी गई। इसके बाद 2 सितंबर 2017 को उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। इसके बाद 25 अप्रैल 2018 को कफील खान को कोर्ट से जमानत मिली, तब वो जेल से बाहर आ सके। इसके बाद खान हाईकोर्ट चले गए, जहां मार्च 2019 में कोर्ट ने विभागीय जांच 90 दिनों में पूरा करने का आदेश दिया। अब दो साल बाद उन्हें मामले में क्लीन चिट मिली है।

डॉ. कफील ने ट्विटर पर इस बावत जानकारी साझा की है और उम्मीद जताई है कि जिन अभिभावकों ने अपने नौनिहाल खोए हैं, उन्हें भी जल्द इंसाफ मिलेगा और सरकार उनसे माफी मांगेगी। विभागीय जांच समिति ने 15 पन्नों की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि डॉ. कफील इन्सेफ्लाइटिस वार्ड के नोडल अफसर नहीं थे, इसलिए यह उनकी लापरवाही नहीं थी, जिसकी वजह से बच्चों की मौत हुई।

जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि डॉ. खान न तो ऑक्सीजन सप्लाई की टेंडरिंग में शामिल थे, न ही उसके भुगतान या रख-रखाव के लिए जिम्मेदार थे। जांच कमेटी ने एक बड़ी बात कही है कि 10 से 12 अगस्त के बीच करीब 54 घंटों तक लिक्वि़ड ऑक्सीजन की सप्लाई की कमी थी। डॉ. खान ने आरोप लगाया है कि स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह को बचाने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाया गया था।

मामले के जांच अधिकारी और स्टांप एवं निबंधन विभाग के प्रमुख सचिव हिमांशु कुमार की रिपोर्ट के मुताबिक, डॉक्टर खान के खिलाफ ऐसा कोई भी सुबूत नहीं पाया गया जो चिकित्सा में लापरवाही को साबित करता हो।जांच रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में एक आरटीआई आवेदन के जवाब में सरकार ने भी स्वीकार किया है कि 11/12 अगस्त 2017 को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में 54 घंटे तक तरल ऑक्सीजन की कमी थी और डॉक्टर कफील खान ने वहां भर्ती बच्चों को बचाने के लिए वास्तव में जंबो ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था की थी।

डॉक्टर खान ने इसे अपनी जीत बताते हुए सरकार से मांग की है कि उन्हें नौकरी पर बहाल किया जाए और यह भी बताया जाए कि उस वक्त मेडिकल कॉलेज में इन्सैफेलाइटिस से पीड़ित करीब 70 बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन है।मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य गणेश कुमार ने बताया कि डॉक्टर खान को वह जांच रिपोर्ट बृहस्पतिवार को सौंप दी गई है।
(भाषा इनपुट्स के साथ)

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