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गोपाल दास नीरज: छह साल में ही हुए अनाथ, यमुना में गोते लगा बीनते थे सिक्के, देव आनंद लेकर आए थे बंबई

काफी पहले उन्होंने एक गीत लिखा था- ‘अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए…'कह सकते हैं कि ये गीत वो आज के वक्त के लिए लिख रहे थे। नफरत के इस दौर में उनकी ये गीत काफी दुरुस्त बैठती है। इटावा के पुरवाली गांव में जन्में गोपाल दास सक्सेना 'नीरज' के जिंदगी की कहानी दमदार मोड़ और रोमांचक पड़ाव लिये हुए हैं।

Author July 20, 2018 10:33 AM
गोपाल दास नीरज (फाइल फोटो)

उनकी पैदाइश यूपी के इटावा की थी। लेकिन उम्र के आखिर तक वह अलीगढ़ में रहे। तबतक, जबतक कि 93 साल की उम्र में बीमारी की वजह से उन्हें दिल्ली के एम्स में भर्ती ना कराना पड़ा। इसी अस्पताल से वो दुनिया छोड़ आखिरी सफर पर निकल गये। काफी पहले उन्होंने एक गीत लिखा था- ‘अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए…’कह सकते हैं कि ये गीत वो आज के वक्त के लिए लिख रहे थे। नफरत के इस दौर में उनकी ये गीत काफी दुरुस्त बैठती है। इटावा के पुरवाली गांव में जन्में गोपाल दास सक्सेना ‘नीरज’ के जिंदगी की कहानी दमदार मोड़ और रोमांचक पड़ाव लिये हुए हैं।

समाजवादी पार्टी की पिछली सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया था। 2007 में हिन्दुस्तान की हुकूमत ने उन्हें पद्म भूषण की उपाधि से सम्मानित किया। 2011 में उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के साथ अपने छुटपने की जिंदगी, अपने हिस्से के संघर्ष को साझा किया था। शुरुआती जीवन के हिस्से मखमली नहीं थे। जब महज 6 बरस के थे पिता का साया सिर से उठ गया था, 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। बालक गोपाल के जिम्मे परिवार का पहिया खींचने की जिम्मेदारी आई। एक वक्त ऐसा आया, जब उफनती यमुना की गोद में छलांग लगाते और श्रद्धालुओं द्वारा फेंके गये सिक्के निकालते। उन्होंने कहा था, “मैंने छोटे-छोटे काम किये, जैसे कि जब मेरी पीजी पूरी हुई, मैंने टाइपिस्ट का काम किया, कुछ दिनों तक सरकार के लिए काम किया, लेकिन मुझे उनका सिस्टम पसंद नहीं आया। नीरज जीवन के अंतिम लम्हों तक बीड़ी का कश खींचते रहे।

गोपाल दास नीरज ने अलीगढ़ के निवासी आर चंद्रा की फिल्म ‘नयी उमर की नयी फसल’ के लिए गाने लिखे। फिल्म तो नहीं चली लेकिन गाने बेहद लोकप्रिय हुए। इस फिल्म से निकला ‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’ आज भी अपने अंदाज और संदेश कहने के लिए लोंगो की जुबां पर रहता है। एक मुशायरे में महशूर अभिनेता देव आनंद ने उन्हें ‘कारवां गुजर गया’ गाते सुना तो वे इतने प्रभावित हुए उन्हें अपने फिल्म में काम करने के लिए मुंबई ले आए। मुंबई में गोपाल दास नीरज ने फिल्म प्रेम पुजारी के लिए गीत लिखे। ये गीत जब रिलीज हुए तो इतिहास ही बन गये। आज भी ‘फूलों के रंग से’ और ‘रंगीला रे’ गीतों को गुनगुनाते देखना एक छोटे से ख्वाब को मुकम्मल होते देखना जैसा है। इस गीत को एस डी बर्मन ने संगीत दिया था और फिर जो जादू पैदा हुआ उसने सुनने वालों की कानों में मिसरी घोल दी। इस गीत के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन करने से पहले ही ‘नीरज’ दादा को 1000 रुपये मिले। ‘रंगीला रे’ गीत लिखने के वक्त गोपाल दास को कहा गया था कि उन्हें ये गीत इन्ही दो शब्दों से शुरू करने हैं। जब ये गीत बनकर देवआनंद साहब के कानों में गूंजा तो इसकी जादूगरी ने उन्हें ‘नीरज’ का ताउम्र फैन बना दिया। कहा जाता है कि देव आनंद जिंदगी के आखिर तक उनसे संपर्क में रहे। नीरज ने देव आनंद की आखिरी फिल्म चार्जशीट के लिए भी गीत लिखे।

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