Sonam Wangchuk News: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक पर शुक्रवार देर रात जंतर-मंतर पर हमला किया गया।
अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा, “गुंडों ने जंतर-मंतर पर सोनम सर पर हमला करने की कोशिश की। उन पर कोई चीज़ फेंकी गई, लेकिन खुशकिस्मती से उन्हें चोट नहीं आई। कुछ दिन पहले, मैंने चेतावनी दी थी कि पुलिस के एक अंदर के आदमी ने मुझे बताया था कि प्रोटेस्ट में रुकावट डालने के लिए लोगों को जंतर-मंतर भेजा जाएगा।”
अगर सोनम सर को कुछ होता है तो सरकार जिम्मेदार होगी- दीपके
कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके ने आगे कहा, “अगर सोनम सर को कुछ होता है, तो सरकार जिम्मेदार होगी क्योंकि जंतर-मंतर पर शांति से चल रहे प्रोटेस्ट को खत्म करने का साफ प्लान है।” इसके अलावा उन्होंने एक अलग पोस्ट में कहा, “आज कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनमें लोगों ने अशांति फैलाई, फिर भी पुलिस घंटों तक निष्क्रिय रही। इसे जारी रहने देकर वे एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को बाधित करने के प्रयासों को बढ़ावा दे रहे हैं।”
वहीं, सोनम वांगचुक ने कहा कि भारत में छोटे आंदोलनों ने कई सरकारों को गिरा दिया है और यहां मुद्दा शिक्षा का है। सोनम वांगचुक ने कहा, “हां मैं अभी भी जिंदा हूं, 20 प्रतिशत मेरा चला गया है, मेरी मांसपेशियां, अंग चले गए हैं और आखिर में दिमाग अभी यह नौबत नहीं आई है आज 20वां दिन खत्म हो रहा है। चलिए मैं साबित करता हूं कि मेरा दिमाग ठीक है।”
तीन बार भारत में सरकारें गिरीं- सोनम वांगचुक
सोनम वांगचुक ने आगे कहा, “यहां पर बहुत से लोग हम से पूछते हैं कि इस आंदोलन से जवाबदेही आएगी। क्या आप लोगों के इस आंदोलन से शिक्षा मंत्री इस्तीफा देंगे। मैं आप लोगों से पूछता हूं कि भारत की जनता को अपने बच्चों की जान और जिंदगी यानी की शिक्षा ज्यादा प्यारी है या प्याज। अब तो आप लोग सोच रहे होंगे कि अब तो इसका दिमाग भी चला गया। आपको पता है कि भारत के आंदोलन की ताकत। तीन बार भारत में सरकारें गिरी।”
यहां पर बात तो बच्चों के जीवन की है- सोनम वांगचुक
सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने कहा, “एक बार 1980 में केंद्रीय सरकार गिरी और 1998 में दिल्ली की सरकार गिरी और उसी साल राजस्थान में सरकार गिरी। जनता की आंदोलन की वजह से यह सब हुआ। वो आंदोलन किस बात पर था। वो आंदोलन प्याज को लेकर था। प्याज की कीमत से भारत में सरकार गिरती हैं तो यहां पर हम बात कर रहे हैं बच्चों के जीवन की। 20 से ज्यादा आत्महत्याएं हुई हैं और भी होंगी। आपके घर की भी बारी आएगी तो क्या इस आंदोलन से एक जवाबदेही तक नहीं लाई जाएगी। एक इस्तीफा नहीं होगा। 20 जुलाई को मेरे साथ संसद तक मार्च कीजिए। हमारी ताकत आप ही हैं। वरना मैं कौन होता हूं, मैं क्या होता हूं, मैं तो एक अकेला भूखा इंसान हूं।”
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किसी भी लोकतंत्र में जनता की ओर से अगर सरकार के रुख या उसकी नीतियों पर सवाल उठाया जाता है, तो एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वाभाविक स्थिति है। ऐसे में सरकार का दायित्व होता है कि वह उन सवालों पर विचार करे, हर संभव और संतुष्ट करने वाला उचित उत्तर दे। विडंबना यह है कि कई बार सरकार की ओर से जन-आंदोलनों को लेकर उदासीनता या फिर उपेक्षा का भाव दिखाया जाता है और इसी वजह से कोई समस्या सुलझने के बजाय और ज्यादा जटिल हो जाती है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…
