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देशकाल : आंदोलन राह भी चिराग भी

हर आंदोलन दुनिया में उम्मीद और परिवर्तन का एक नया पाठ लेकर आता है। इस लिहाज से आंदोलनों के इतिहास में झांकना और उनके बीच समान तत्वों की शिनाख्त करना आसान नहीं है। इस लिहाज से किसान आंदोलनों को देखें तो राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों से भारत का किसान देश और समाज के लिए उम्मीद और परिवर्तन की नई-नई फसलें उगाता रहा है।

Author Updated: January 13, 2021 12:25 AM
Farmerसांकेतिक फोटो।

प्रेम प्रकाश

यथास्थिति जड़ता की ही निशानी नहीं है बल्कि यह इस बात का भी संकेत है कि मनुष्य अपनी चेतना के स्तर पर निस्तेज साबित हो रहा है। इतिहासकार बीसवीं शताब्दी को मनुष्य, समाज और राष्ट्र की अवधारणा को क्रांतिकारी तरीके से विकसित और स्थापित होने की सदी मानते हैं।

इस दौर से और एक शताब्दी पीछे जाएं तो वह क्रांतिकारी स्पंदन महसूस होगा, जिसने राजमहलों से चलने वाली सत्ता को मनमाना करार दिया और लोकतंत्र की आधुनिक दरकार को मजबूती के साथ रेखांकित किया। 1789 से अगले एक दशक तक चली फ्रांस की राज्यक्रांति का ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’ का पैगाम आगे वह सूत्र साबित हुआ, जिसने मनुष्यता की शिनाख्त को नागरिकता में बदला।

इतिहास के लंबे दौर से आगे निकलते हुए बीते तीन दशकों के तारीखी घटनाक्रम से गुजरें तो बदलाव की वह प्रक्रिया साफ दिखेगी, जिसने विकास के भूमंडलीय तकाजों के बीच नागरिक समाज को उपभोक्ता वर्ग में तब्दील किया। इस बीच तकनीक का जोर और दखल बाजार से लेकर अभिव्यक्ति तक हर जगह इतना बढ़ा कि देश और समाज को देखने-समझने के पुराने आलोचकीय टेक बेमानी साबित हुए।

मशीनीकरण और अंधाधुंध खपत की सनक को लेकर दुनिया को 1909 में ही गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ के जरिए चेता दिया था। अलबत्ता इस चेतावनी को दरकिनार कर आगे बढ़ने की अक्लमंदी न सिर्फ भारत ने दिखाई बल्कि बाकी दुनिया भी इसी राह पर आगे बढ़ी। इस अक्लमंदी पर सवाल तब उठने लगे जब लगा कि आवारा पूंजी की ताकत के आगे इंसान और उसके संवेदनात्मक सरोकारों की अर्थवत्ता नहीं टिक पाएगी। ‘अवसरों के विस्फोट’ के एलान के साथ पूंजी और तकनीक ने रातोंरात एक ऐसी दुनिया रच दी जहां आभास को ही सच्चाई का अभ्यास करार दिया गया।

आभासी जामे में दुनिया की पुरानी बनावाट को बदलने में जुटी कुबेरी-आखेटी ताकतों की क्रूर मंशा को जहां नोम चोमस्की जैसे विचारकों ने दुनिया के सामने रखा, वहीं भारत में ‘आजादी बचाओ आंदोलन’ चला। आंदोलन की अगुआई कर रहे डॉ बनवारी लाल शर्मा देशभर के अपने दौरों में खासतौर पर युवाओं को यह समझा रहे थे कि बाजार की अनियंत्रित ताकत व्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर राष्ट्र की सार्वभौमिकता को र्णिायक चुनौती साबित होने जा रही है। आज इस रेशमी आभास से भिड़ने के लिए खुरदरे संकेत आंदोलनात्मकतौर पर फिर से उभरने लगे हैं।

फ्रीडमैन की फिक्र

अमेरिकी लेखक-पत्रकार थॉमस फ्रीडमैन की 2005 में किताब आई- ‘द वर्ल्ड इज फ्लैट’। यह किताब इक्कीसवीं सदी का आभासी इतिहास है। उन्होंने बताया कि नई दुनिया में सबके लिए समान अवसर है। इस तरह वे नवपूंजीवाद के उस दावे को व्याख्यायित करते हैं जिसमें समानता का सिद्धांत समाज या राज्यशक्ति नहीं सुनिश्चित करेगा बल्कि यह पूंजी और तकनीक की साझी लिखावट से तय होगा।

अब जबकि हम उत्तर आधुनिकता के सूर्य को अमेरिका में ही ‘दक्षिणायन’ होते देख रहे हैं तो तीन बार के पुलित्जर पुरस्कार विजेता इस लेखक को फिर से पढ़ना चाहिए। 2016 में फ्रीडमैन की नई किताब आई- ‘थैंक यू फॉर बीइंग लेट: एन आॅप्टिमिस्ट्स गाइड टू थ्राइविंग इन द एज आॅफ एक्सेलरेशंस’। यहां फ्रीडमैन आगाह करते हैं कि भ्रामक और तेजी के अभूतपूर्व युग में दुनिया दाखिल हो चुकी है। लिहाजा आधुनिक जीवन का हर पहलू प्रभावित हो रहा है, लोग लगातार भयभीत होते जा रहे हैं, अस्थिर होते जा रहे हैं और नए-नए संकटों से घिरते जा रहे हैं।

किसान आंदोलन

मौजूदा दौर में आंदोलन की भूमिका उसी समझ से शुरू होती है, जहां परिवर्तन और पूंजी के नए जोर से आ रहे बदलावों के प्रति आशंका पैदा होती है। कमाल की बात है कि दुनिया भले कहने को आज पूंजीवाद समता की छतरी के नीचे आ गई हो, पर इस छतरी के नीचे प्रेम और सद्भाव की एकजुटता तो खैर नहीं दिख रही है, उलटे विभेद और बटवारे की पुरानी के साथ कई नई खिंची लकीरें जरूर विश्व समाज को बांट रही है।

नतीजतन जहां एक तरफ दुनिया आज क्रेता-विक्रेता और उत्पादक-उपभोक्ताजैसे खांचों में बंटी है, वहीं अमीर-गरीब और श्वेत-अश्वेत जैसा अमानवीय विभाजन और गहराया है। यही नहीं, सभ्यता के लंबे अनुभव में जिस खेती-किसानी को प्रकृति और मनुष्य का सबसे सुंदर अभ्यास माना गया, वह अभ्यास आज अपनी दरकार और शिनाख्त की आखिरी लड़ाई लड़ रहा है। देश में किसानों के संघर्ष को जो लोग तीन कानूनों के महज विरोध के रूप में देख रहे हैं, वे इस आंदोलन की स्लेट पर उभरी उस लिखावट को नहीं पढ़ पा रहे, जिसमें आने वाले समय में बदलाव और आंदोलन की गति और उसके हश्र से जुड़े कई अहम संकेत छिपे हैं।

उम्मीदों का खाता

दिल्ली की सीमाओं पर संघर्ष के लंबे धैर्य के साथ बैठे आंदोलनकारी किसानों से बात करें तो वे पूंजी की ताकत और राज्यसत्ता की भूमिका के बारे में कई आलोचकीय व्याख्याओं से आपको लैस कर देंगे। उनके बीच आपको उन क्रांतिकारियों की तस्वीरें और किताबें मिलेंगीं, जो फोर्ब्स की सूची में तो कभी जगह नहीं बना सके पर जब भी जमाने को ऊर्जा और ऊष्मा की जरूरत महसूस हुई उनके नाम ललकार के साथ लिए गए।

एक ऐसे दौर में जब आदमी का सामाजिक कहलाना फेसबुक या इंस्टाग्राम पर खाताधारी होना भर रह गया है, ये किसान आपको साझे चूल्हे और खुले लंगर के बीच पलने वाले सद्भाव से परिचित कराएंगे। मीडिया अब भी जिस तरह इस आंदोलन को अच्छे से व्याख्यायित करने में नाकाम रहा है, वह अपनी ही परंपरा की जड़ों से दूर होने और उसके प्रति नासमझ होने की खुदबयानी है। 21वीं सदी के दूसरे दशक में हम एक ऐसी महामारी के खौफ के साथ दाखिल हुए हैं, जो सेहत के संकट को ‘सभ्यता संकट’ जैसे आशय से जोड़ता है।

ऐसे में समाज का सबसे जमीनी तबका आगे बढ़कर हमें यह बता रहा है कि विकास की असलियत तब तक आभासी ही रहेगी जब तक वह प्रकृति और परंपरा से नहीं जुड़ेगी। दरअसल, अपनी मांगों और सरोकारों के प्रति गहरी समझ से लैेस किसान ‘वाट्सऐप यूनिवसिर्टी’ के फैलाए उस अंधेरे के खिलाफ भी लड़ रहे हैं जो हमें अपने ही समाज, परिवेश और देशकाल के बारे में संगठित तौर पर गुमराह कर रहे हैं।

आंदोलन की फसल

श्रम के सरोकार जब मशीनी उपक्रम में बदलते हैं तो मानवीय संवेदनाएं किस तरह बौखला जाती हैं, इसकी मिसाल है कि घर से लेकर दफ्तर तक और संसद से लेकर सड़क तक हम हर जगह आज कट्टरता से भरी भिड़ंत देख रहे हैं। इस संकट को समझने के लिए अगर साहित्येहास की मदद लें तो कम से कम हिंदी साहित्य का इतिहास यह आगे बढ़कर कहता है कि हमारी अक्षर संवेदना के लिए दो शब्द सबसे कीमती हैं। और ये शब्द हैं- लोक और परंपरा।

भारत में खेती-किसानी का रिश्ता इन दोनों से जुड़ा है। यह रिश्ता प्रांजल तो है ही क्रांतिकारी भी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि देश ने 1857 में जब फिरंगी दासता के खिलाफ पहली अंगड़ाई दिखाई तो उसमें खाकी के साथ हरियाली भी शामिल थी। बल्कि अब तो इस बात की गवाही के लिए कई नए तथ्य भी मौजूद हैं कि कैसे देश में किसानों ने संघर्ष को खरीफ और रबी की फसलों की तरह उगाना सीखा।

चंपारण का सबक

भारतीय कृषक समाज भले लंबे समय तक उत्पीड़न या शोषण का शिकार रहा हो पर चेतना का अलाव उनके बीच हमेशा जलता रहा है। यही कारण है कि गांधी भी जब भारत लौटे तो वे किसानों के बीच सबसे पहले पहुंचे। 1909 में जिस ग्राम सभ्यता, उद्यम और जीवन पर वे भरोसा जता चुके थे, 1917 आते-आते वे उनके बीच जाकर बैठे।

चंपारण में किसानों के बीच सत्याग्रह के अपने प्रयोग के बीच उन्होंने कहा कि उन्होंने यहां ‘अहिंसा देवी’ के साक्षात दर्शन किए। फिर यहीं से वे सत्याग्रह के प्रयोग को राष्ट्रीय आंदोलन की निर्णायक परिणति तक ले गए। गांव और खेती-किसानी की नजदीकी समझ ने उनकी इस राय को और सुदृढ़ किया कि साधन और उत्पादन का विकेंद्रीकरण होना चाहिए क्योंकि केंद्रीकरण की प्रवृत्ति हिंसक खमियाजे तक ले जाती है।

लिहाजा, देश में चल रहे मौजूदा किसान आंदोलन के हश्र को टकटकी बांधकर देखने से ज्यादा जरूरी है कि हम यह समझें कि विकास की चमकदार समझ के बीच गांव-गंवई की हरित और मटमैली लीक हमें मनुष्यता और नागरिकता के खारिज होने के प्रति न सिर्फ जागरूक कर रहा है बल्कि इसके लिए आंदोलनात्मक तैयारी से भी जुड़ने की अपील कर रहा है।

अभी दुनिया के कई हिस्सों में लोकतंत्र की मांग से लेकर नस्ली विभेद के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि किसानों का भी आंदोलन की राह पर चल पड़ना यह जताता है कि संकट का अंधेरा हमारी बुनियादी शिनाख्त तक पहुंच चुका है। लिहाजा, आगे की लड़ाई कुछ पाने से ज्यादा खुद को बचाने की कवायद है। ल्ल

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