बॉम्बे हाई कोर्ट ने गोवा में मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट को किसी का नाम हटाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। साथ ही, किसी प्रशासनिक सॉफ्टवेयर की तकनीकी दिक्कत कानून से ऊपर नहीं हो सकती।

याचिकाकर्ताओं परेश सालगांवकर और उनके परिवार के पांच सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे। परिवार ने बताया कि वे SIR शुरू होने से पहले उसी सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र में दूसरे घर में शिफ्ट हुए थे। पता बदलने के लिए BLO ने उन्हें Form 8 भरने को कहा, लेकिन फॉर्म की जांच के दौरान सिस्टम में उनके वोटर ID यानी EPIC का रिकॉर्ड नहीं मिला। इसके बाद ERONET सिस्टम में अधिकारियों के पास फॉर्म को स्वीकार करने की जगह सिर्फ “Reject” का विकल्प दिखाई दे रहा था।

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी ने उन्हें सूचित किया कि उनके ईपीआईसी को मतदाता सूची से हटा दिया गया है। परिणामस्वरूप, उनके फॉर्म 8 आवेदनों पर कार्रवाई नहीं की जा सकती है। इसके बाद परिवार के पास सिर्फ Form 6 भरने का विकल्प बचा था। दरअसल, ERONET में डिलीट किए गए EPIC यानी वोटर ID को दोबारा रिव्यू करने या बहाल करने का कोई विकल्प मौजूद नहीं था।

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि फॉर्म 6 भरने की सलाह कानून के हिसाब से सही नहीं है। Form 6 उन लोगों के लिए होता है जो पहली बार वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाना चाहते हैं। जबकि परिवार पहले से वोटर था और सिर्फ उसी विधानसभा क्षेत्र में अपना पता बदल रहा था। ऐसे मामले में Form 8 भरना जरूरी है।

बुधवार को जस्टिस अमित एस. जमसांडेकर और जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस की बेंच ने कहा कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट किसी का नाम हटाने का आधार नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि अगर ऐसा होने लगे तो Form 6, 7 और 8 का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा। ये फॉर्म अलग-अलग परिस्थितियों के लिए बनाए गए हैं। फॉर्म 6 नए वोटर के लिए, फॉर्म 7 वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए और फॉर्म 8 पता बदलने जैसे बदलाव के लिए।

अदालत ने चुनाव आयोग से कहा कि सॉफ्टवेयर ने फॉर्म-8 स्वीकार करने की अनुमति नहीं देता है। अदालत ने कहा कि वह (याचिकाकर्ता) कभी भी नया मतदाता नहीं था। वह पहले से ही मतदाता था, लेकिन आपके सिस्टम के लिए नया बन गया।

पीठ ने चुनाव आयोग से पूछा कि बिना किसी व्यक्ति को सुनवाई का मौका दिए उसका नाम वोटर लिस्ट से हटाने की ताकत आयोग को किस कानून के तहत मिली है? बेंच ने कहा कि हमें कानून में दिखाइए कि बिना सुनवाई के नाम हटाने का अधिकार आपको कहां दिया गया है? कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी लेने के बजाय पूरी गलती सिस्टम पर डाल दी। आदेश में यह तक लिख दिया गया कि सिस्टम ने आवेदन रिजेक्ट कर दिया। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि वह इस मामले को लेकर बहुत चिंतित है। बेंच ने सवाल उठाया कि ऐसे कितने और लोग होंगे, जिन्हें इसी तरह वोटर लिस्ट से हटा दिया गया और वे कोर्ट तक पहुंच भी नहीं पाए?

अदालत ने पूछा कि आखिर सिस्टम में दिक्कत क्या है? जब किसी व्यक्ति का फॉर्म 8 आता है तो अधिकारी को खुद जांच करनी चाहिए कि उसने वास्तव में पता बदला है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि अगर अधिकारी जांच के बाद पाता है कि व्यक्ति सच में शिफ्ट हुआ है, तो वह सिस्टम में बदलाव कैसे करेगा? अगर सॉफ्टवेयर आवेदन स्वीकार नहीं कर रहा है, तो अधिकारी के पास उसे ओवरराइड करके सही करने का कोई रास्ता क्यों नहीं है?

बेंच ने कहा कि इस बात का कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है कि अधिकारी सिस्टम की गलती को ठीक करके अपना आदेश उसमें दर्ज क्यों नहीं कर सकता। कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि अगर यही व्यवस्था चलती रही तो लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हट सकते हैं। बेंच ने कहा कि अभी तो सिर्फ एक परिवार का मामला है। जरा सोचिए, अगर बड़ी संख्या में लोग अपना घर बदल चुके हों तो क्या होगा?

चुनाव आयोग ने दो राज्यों में SIR का शेड्यूल बढ़ाया

चुनाव आयोग ने बुधवार को आंध्र प्रदेश और मेघालय में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) की समयसीमा बढ़ा दी। ECI के मुताबिक, अब आंध्र प्रदेश में अंतिम वोटर लिस्ट 16 अक्टूबर को और मेघालय में 26 अक्टूबर को जारी की जाएगी।

आयोग ने बताया कि बुधवार शाम 4:30 बजे नई दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन में बैठक हुई। बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त एसएस संधू और विवेक जोशी शामिल हुए। इलेक्शन कमीशन ने कहा कि बैठक में आंध्र प्रदेश और मेघालय में चल रही SIR प्रक्रिया की तारीखें बढ़ाने का फैसला लिया गया।

KPSC भर्ती घोटाला: टॉप रैंकर्स के सही-गलत जवाब भी मिले एक जैसे, 14 उम्मीदवारों पर पेपर लीक से फायदा लेने का आरोप

कर्नाटक लोक सेवा आयोग यानी KPSC की वेटरनरी डॉक्टर भर्ती परीक्षा में कथित पेपर लीक को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। जांच में सामने आया है कि जनवरी में वेटरनरी डॉक्टरों की भर्ती के लिए हुई KPSC परीक्षा में 14 टॉप रैंक वाले उम्मीदवारों को कथित पेपर लीक से फायदा मिला। पढ़ें पूरी खबर।