उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में तेज आवाज में DJ बजने के दौरान कक्षा 2 की एक छात्रा की मौत के मामले ने ध्वनि प्रदूषण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले का खुद संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ध्वनि प्रदूषण के मुद्दे पर सुनवाई शुरू की है। कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा है कि लाउडस्पीकर और तेज आवाज वाले उपकरणों के नियमों को लागू कराने की जिम्मेदारी किसकी है।

घटना 22 सितंबर की बताई जा रही है। एक जुलूस के दौरान स्कूल के बाहर तेज आवाज में DJ बज रहा था। इसी दौरान बच्ची अपनी कक्षा में अचानक गिर गई। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

तेज आवाज में बजाया जा रहा था DJ

स्कूल प्रशासन की ओर से दर्ज FIR में आरोप लगाया गया कि जुलूस के दौरान बहुत तेज आवाज में DJ बजाया जा रहा था, जिसके कारण बच्ची की तबीयत बिगड़ी और उसकी मौत हो गई। मामले में DJ के मालिक और ऑपरेटर को गिरफ्तार किया गया है। वहीं, स्थानीय पुलिस चौकी प्रभारी को निलंबित किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि अभी यह तय नहीं हुआ है कि बच्ची की मौत तेज आवाज के कारण हुई थी। अदालत ने कहा कि तेज आवाज में लाउडस्पीकर या संगीत बजाए जाने और उसके तुरंत बाद बच्ची के कक्षा में गिरने की घटना को देखते हुए मामले पर संज्ञान लेना आवश्यक है।

ध्वनि प्रदूषण पर हाईकोर्ट की गंभीर टिप्पणी

28 सितंबर को न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ला की खंडपीठ ने ध्वनि प्रदूषण से जुड़ी कई जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान कहा कि सड़कों पर ध्वनि प्रदूषण से जुड़े नियमों का उल्लंघन रोजाना देखने को मिलता है।

अदालत ने सवाल उठाया कि ध्वनि प्रदूषण को रोकने और कंट्रोल करने की जिम्मेदारी किसकी है तथा इस दिशा में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर कदम उठाने के बाद भी नियमों का उल्लंघन जारी रहता है, तो इसकी नियमित निगरानी के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

नियमों के पालन और जागरूकता पर जोर

हाईकोर्ट ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है। लोगों के बीच नियमों को लेकर जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है। अदालत के अनुसार, नियमों की जानकारी का अभाव भी उल्लंघन के प्रमुख कारणों में से एक है।

अदालत ने सरकार और संबंधित अधिकारियों से इस दिशा में आवश्यक कदम उठाने में सहयोग करने को कहा। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर नियमों का उल्लंघन जारी रहता है, तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जानी चाहिए।

भारत में ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 में प्रावधान मौजूद हैं। अदालत ने इन्हीं कानूनी प्रावधानों के प्रभावी अनुपालन पर ध्यान केंद्रित किया है।

कई विभागों और अधिकारियों को बनाया पक्षकार

मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी। हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गृह, परिवहन, वन एवं पर्यावरण, आवास एवं शहरी नियोजन और नगर विकास विभागों के प्रमुख अधिकारियों को भी इस मामले में शामिल करने का निर्देश दिया है।

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक, सेंट्रल के पुलिस कमिश्नर, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, लखनऊ पुलिस, नगर निगम के अधिकारियों और लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को भी इस मामले में शामिल किया है।

बलरामपुर के जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और मुख्य चिकित्सा अधिकारी को भी इस मामले में शामिल किया गया है। कोर्ट ने स्कूल प्रशासन को भी मामले में शामिल करने का निर्देश दिया है, ताकि बच्ची की मौत से जुड़ी घटना और परिस्थितियों की जानकारी लेने में स्कूल से मदद मिल सके।

अभिभावकों और स्कूल को लेकर कोर्ट की चेतावनी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि बच्ची के माता-पिता और स्कूल प्रशासन पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि राज्य का कोई भी व्यक्ति या अधिकारी स्कूल के काम में बिना जरूरत दखल न दे।

इस मामले की अगली सुनवाई में अदालत का ध्यान मुख्य रूप से ध्वनि प्रदूषण के नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका, निगरानी व्यवस्था और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की प्रक्रिया पर रहेगा।

अदालत ने अभी तक बच्ची की मौत की असली वजह को लेकर कोई फैसला नहीं दिया है। तेज DJ की आवाज और बच्ची की मौत के बीच कोई संबंध था या नहीं, यह आगे की जांच और कोर्ट की सुनवाई के बाद ही साफ होगा।

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