हमारे देश में बेटियों के जीवन और संरक्षण के लिए सरकार और समाज के स्तर पर तमाम कवायदें होती रही हैं और इसके मद्देनजर समय-समय पर विशेष आयोजन होते रहे हैं। मगर ऐसा क्यों है कि आज भी बच्चियों की शिक्षा, सुरक्षा और अधिकार से जुड़े लक्ष्य अधूरे हैं? लैंगिक समानता का विमर्श तब तक अधूरा है, जब तक बालिकाओं की दशा और दिशा का ईमानदारी से मूल्यांकन नहीं होता। महज दिवस और समारोह मना लेने भर से बच्चियों के संपूर्ण विकास का दावा नहीं किया जा सकता।
आज स्वतंत्रता प्राप्ति के सात दशक बाद लाखों बालिकाओं की शिक्षा अधूरी रह जाती है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है। उनके स्वास्थ्य की जिस तरह से उपेक्षा होती है, यह किसी से छिपा नहीं है। उचित पोषण के अभाव में उन्हें कई बीमारियां घेर लेती हैं। चिंता की बात है कि तमाम योजनाओं के बावजूद सामाजिक सोच में आज भी बदलाव नहीं आया। समाज में बालिकाओं को लेकर दोहरी मानसिकता रही है। घर से लेकर बाहर तक उनसे भेदभाव होता है।
आज भी भ्रूण हत्या एक बड़ी चुनौती है। बालिका किसी तरह बच जाती है, तो आगे चल कर उसे शिक्षा से वंचित रखने की साजिश होती है। हालांकि जागरूकता बढ़ने से लोग बेटा-बेटी को समान मानने लगे हैं। शहरों में तस्वीर जरूर बदली है, लेकिन ग्रामीण और वंचित तबकों में बालिकाएं अब भी उपेक्षित हैं।
आज बालिकाएं जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, चाहे वह खेल का क्षेत्र हो या शिक्षा। लड़कियां खेलों में स्वर्ण पदक जीतने से लेकर अंतरिक्ष में जाने तक के लिए तैयार हो रही हैं। तमाम संघर्षों और बाधाओं को पार करने के बाद आगे चल कर कई बालिकाएं विभिन्न क्षेत्रों में शीर्ष पदों तक पहुंचीं। मगर इतना सब कुछ प्राप्त कर लेने के बावजूद आज भी उनकी सुरक्षा समाज के लिए चिंता का विषय है।
अगर राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें, तो भारत में 2023 में महिलाओं से हुए अपराध के करीब 4.48 लाख मामले दर्ज किए गए, जो 2022 के मामलों से अधिक था। वास्तविकता यह भी है कि ब्यूरो के आंकड़े केवल पुलिस में दर्ज कराए गए मामलों को दर्शाते हैं। जबकि पारिवारिक हिंसा, उत्पीड़न और घरेलू परेशानियों का बहुत बड़ा हिस्सा अक्सर दर्ज नहीं होता।
लोगों के अनुभव बताते हैं कि घरेलू हिंसा और परिस्थितिजन्य डर के कारण कई मामलों की शिकायत ही नहीं की जाती। कई मामलों में तो विभिन्न प्रकार के डर, दबाव और धमकियों की वजह से की गई शिकायत भी वापस ले ली जाती है। इनके अलावा, मौजूदा समय में डिजिटल और आनलाइन हिंसा भी तेजी से समाज में जड़ें जमा रही हैं। इसे रोकने के लिए कानून और सुरक्षा प्रणालियां पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो सकी हैं, जिनका खमियाजा लड़कियों को भुगतना पड़ रहा है।
केंद्र और राज्य सरकारें अपनी ओर से इस समस्या के निराकरण के लिए कई कदम उठा रही हैं। निर्भया अधिनियम, पाक्सो अधिनियम, घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, बाल विवाह निषेध अधिनियम जैसे कानून और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, निर्भया फंड, महिला हेल्प लाइन, महिला थाने और ‘पिंक पेट्रोलिंग’ जैसी योजनाएं इसके उदाहरण हैं। मगर लड़कियों की सुरक्षा केवल कानून और योजनाएं बना देने भर से सुनिश्चित नहीं होगी, बल्कि कड़ाई से इनका अनुपालन भी उतना ही जरूरी है।
एक बहुत बड़ा दायित्व सामाजिक सोच से जुड़ा है। आज भी जिस तरह की सोच समाज में लड़कियों को लेकर बनी हुई है, उसे स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। इसमें कोई संदेह नहीं कि स्थितियों में परिवर्तन आया है, परंतु अभी भी परिवर्तन का दायरा सीमित है और अधिकांश लड़कियों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
यह एक ऐसी लड़ाई है जिसमें सरकारी, सामाजिक और व्यक्तिगत प्रयासों में समन्वय बेहद जरूरी है। लड़कियों की सुरक्षा केवल कानून व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक प्रतिबद्धता, सामाजिक चेतना और सामूहिक जिम्मेदारी का सवाल बन चुका है। बेटियों को खुलकर अपनी बात कहने का अधिकार और समान अवसर देना होगा।
सबसे जरूरी यह समझना है कि लड़कियों की सुरक्षा का खतरा कहां से आता है। इसके लिए लड़कों से भी खुल कर बात करनी होगी और ऐसे संस्कार देने होंगे, जिनमें वे लड़कियों को बराबरी का इंसान समझें। गलत करने वाले को बचाने की मानसिकता ही असली खतरा है।
परिवार में ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहां लड़कियों को हर स्तर पर समान अधिकार और सम्मान मिले। बालिकाएं केवल परिवार या समाज की नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति की आधारशिला हैं। शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य, समान अवसर और सम्मान—इन सबके बिना विकास अधूरा रहेगा। लक्ष्य ऐसा समाज बनाना होना चाहिए, जहां हर लड़की निडर होकर अपने सपनों की उड़ान भर सके।
