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लैला के प्‍यार में पागल थे जॉर्ज फर्नांडिस, जिस नीतीश को बनाया उन्‍होंने ही कैसे लगाया किनारा, पढ़िए पूरा किस्सा

बिहार सरकार ने तीन जून को जॉर्ज फर्नांडिस की जयंती मनाई और उनकी आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया। 2000 के दशक के आखरी वर्षों में नीतीश ने कैसे जॉर्ज को किनारा किया था, जानिए किस्‍सा

george fernandes, Nitish Kumar,जॉर्ज फर्नांडिस ने अखबार में प्रूफ रीडर के तौर पर कॅरिअर शुरू किया था। (फाइल फोटो)

तीन जून। जॉर्ज फर्नांंडिस की जयंती। वह जॉर्ज फर्नांंडिस जो उस पार्टी के संस्‍थापक थे, जिसके आज नीतीश कुमार मुखिया हैं। नीतीश कुमार ने तीन जून (2020) को मुजफ्फरपुर में जॉर्ज साहब की आदमकद प्रतिमा का ऑनलाइन (पटना से) अनावरण किया। लेकिन, एक वक्‍त था, जब नीतीश कुमार ने जॉर्ज को किनारे लगा दिया था। जिंदगी के आखिरी साल बीमारी, गुमनामी में काटते 2019 की जनवरी में जॉर्ज साहब दुनिया को अलविदा कह गए थे। जॉर्ज फर्नांडिस मुजफ्फरपुर सेे सांंसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री भी थे। 1974 में देश में इंदिरा गांधी के खिलाफ लहर उफान पर थी और कई संगठन एक हो रहे थे। जयप्रकाश नारायण (जेपी) की तूती बोल रही थी। उनसे प्रेरित होकर नीतीश जेपी मूवमेंट से जुड़े।

यहीं से नीतीश कुमार की सक्रिय राजनीति शुरू हुई थी। इस दौरान कर्पूरी ठाकुर, राम मनोहर लोहिया, वीपी सिंह और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे दिग्गजों से नीतीश की मुलाकात हुई। बाद मेें नीतीश और जॉर्ज ने मिलकर राजनीति मेें अपनी डंका बजाई। जॉर्ज फर्नांडिस ने अखबार में प्रूफ रीडर के तौर पर कॅरिअर शुरू किया। फिर सोशलिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन के आंदोलनों से जुड़े। बाद में राजनीति में एंट्री ली। समता पार्टी बनाई। एनडीए का हिस्‍सा बने। केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कई अहम मंत्रालयों में मंत्री रहे।

जॉर्ज और नीतीश नेे 1994 में कुल 14 सांसदों को लेकर जनता दल से अलग होकर जनता दल (जॉर्ज) बनाया।अक्टूबर में इसका नाम समता पार्टी कर दिया। 1995 के विधानसभा चुनाव में समता पार्टी लालू प्रसाद यादव से बुरी तरह पिटी। समता को केवल सात सीटें मिलीं। तब 1996 में जॉर्ज ने बीजेपी से गठजोड़ किया। दिल्‍ली की राजनीति में ऊपर उठते रहे, नीतीश बिहार में अपनी जमीन मजबूत करते रहे।

साल 2000 में नीतीश कुमार 8 दिन के लिए पहली बार बिहार के सीएम बने। बीजेपी की मदद से। 2003 में नीतीश ने बीजेपी से नाता तोड़ कर जनता दल यूनाइटेड बनाया। इसमें उन्‍हें जॉर्ज का पूरा सहयोग हासिल था। 2005 में नीतीश सीएम बने। 2007 में नीतीश कुमार ने तेवर दिखाए और जॉर्ज फर्नांडिस को पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया।शरद यादव जेडीयू अध्यक्ष बनाए गए। 2009 के लोकसभा चुनाव में भी जॉर्ज का टिकट (उनकी सीट नालंदा से) काट लिया गया। उन्होंने मुजफ्फरपुर से निर्दलीय चुनाव लड़ा, पर हार गए।

इस हार के बाद हालत यह थी कि दिल्ली में रहने का ठिकाना नहीं रह गया था। उनके दोस्तों ने उनके लिए किराए का मकान खोजना शुरू कर दिया था। इसी बीच जदयू ने उन्‍हें बिहार से राज्यसभा भिजवाया, तब यह संकट में खत्‍म हुआ था। 2009 में 4 अगस्त को उन्‍होंने राज्‍यसभा सांसद के तौर पर शपथ ली थी। वह अल्जाइमर से पीड़ित थे। शपथ के वक्‍त उनके बगल में लैला कबीर भी खड़ी थीं। जॉर्ज ने कभी उनसे बेहद प्‍यार किया था। 25 साल बाद जॉर्ज के जीवन में लैला की वापसी हुई थी।हालांकि बाद में जेडीयू ने उन्हें राज्यसभा भेजा। लेकिन, पार्टी में पहले किनारे लगा दिए गए जॉर्ज सेहत की वजह से सार्वजनिक जीवन से दूर होते गए और अकेलापन व गुमनामी में खोते चले गए।

किनारा करने का कारण: असल में जब 2005 में नीतीश कुमार को लालकृष्ण आडवाणी ने एनडीए के सीएम कैंडिटेट के रूप में प्रोजेक्ट किया था तो जॉर्ज फर्नांडिस को यह पसंद नहीं आया था। नीतीश ने शायद इसे ही दिल पर ले लिया था।

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