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…जब जनरल करिअप्पा ने कहा था- संविधान को खत्म करें, देश को सैन्य शासन की जरूरत; जानिए पूरा वाकया

जनरल करिअप्पा लिखते हैं कि अगर आम आदमी को लगता है कि राष्ट्रपति और सैन्य शासन उन्हें सुरक्षा, बेहतर प्रशासन और बेहतर जीवन देगा तो उन्हें यह मांगने का अधिकार है।

Author Edited By रवि रंजन नई दिल्ली | Updated: January 20, 2020 10:20 AM
जनरल जीके करिअप्पा

बात लगभग चार दशक पहले की है। साल 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी को बड़ी जीत मिली थी। इस जीत के कुछ सप्ताह बाद भारतीय सेना के पहले कमांडर इन चीफ जनरल के एम करिअप्पा ने एक स्पष्ट नोट में रेखांकित किया कि वह “एक सैन्य शासन के पक्ष में थे”। करिअप्पा बाद में फिल्ड मार्शल भी बनें। उनका मानना था कि देश में चीजों को सही करने के लिए यह एक अस्थायी उपाय है। भारतीयों को ‘जागने’ और ‘बोलने’ के लिए प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने कहा था कि 90 प्रतिशत “लोकतंत्र को बचाने के लिए राष्ट्रपति और सैन्य शासन के लिए मतदान करें”।

7 अप्रैल 1971 का हस्ताक्षरित नोट हाल ही में कर्नाटक के राज्य अभिलेखागार में मिला है। करिअप्पा ने अपनी टिप्पणी पर एक संसदीय बहस कराने को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की थी और मार्च 1970 में धनबाद में प्रेस से अनौपचारिक बातचीत की थी। इसके बाद उन्होंने यह नोट जनता के लिए एक स्पष्टीकरण के रूप में लिखा था। संसद में उन टिप्पणियों के लिए करियप्पा की भारी आलोचना की गई थी। तब यह बताया गया कि वह अपनी टिप्पणी के लिए माफी मांगने के लिए इन नेताओं से मिले थे, जिसका उन्होंने खंडन करते हुए कहा था कि वे “एक इंच भी पीछे नहीं हटे”।

चार पन्नों के टाइप नोट में करिअप्पा ने संविधान, सभी राजनीतिक दलों और भाषाई राज्यों को समाप्त करने और “साक्षरता” के आधार पर वयस्क मताधिकार को प्रतिबंधित करने की भी वकालत की थी। ब्रिटेन में लेबर, लिबरल और कंजर्वेटिव की तर्ज पर वह भारत में भी सिर्फ तीन राजनीतिक दल चाहते थे। वे चाहते थे कि जब सैन्य शासन के बाद ‘चीजें सामान्य हो जाए’ तो देश में आम चुनाव हो और एक नया संविधान बने।

उनका मानना था कि जब नया संविधान बन जाए तब देश में ‘राष्ट्रपति सह सैन्य शासन को समाप्त कर दिया जाए और फिर से लोकतंत्र स्थापित हो।’ भाषाई राज्यों को ‘देश की एकता के लिए मौत की घंटी’ बताते हुए उन्होंने राष्ट्र को प्रशासनिक और आर्थिक सुविधा के लिए सेना की तर्ज पर ‘सेना, सैन्य क्षेत्र, सैन्य उप-क्षेत्र’ के तौर पर क्षेत्रों में विभाजित करने का प्रस्ताव दिया था।”

जनरल करिअप्पा एक सम्मानित और प्रसिद्ध सैन्य अधिकारी थे। 15 जनवरी को वे भारत के पहले कमांडर-इन-चीफ बने थे। इस वजह से इस दिन को सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है। वे 1953 में सक्रिय सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे। रिटायरमेंट के बाद वे दो बार लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन हार गए। 1986 में जब राजीव गांधी की सरकार बनी तो उन्हें फील्ड मार्शल बनाया गया। 1993 में 94 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

नोट में उन्होंने लिखा कि राष्ट्रपति और सैन्य शासन का उनका प्रस्ताव स्थायी नहीं है। यह सिर्फ व्यवस्था के सामान्य होने तक के लिए है। वे लिखते हैं कि अगर आम आदमी को लगता है कि राष्ट्रपति और सैन्य शासन उन्हें सुरक्षा, बेहतर प्रशासन और बेहतर जीवन देगा तो उन्हें यह मांगने का अधिकार है।

हालांकि, वे स्पष्ट करते हैं कि वह “सैन्य तख्तापलट के पक्ष में कभी नहीं थे”। वह आगे लिखते हैं कि “भारत में सैन्य तख्तापलट न हो सकता है और न कभी होगा।” इसके पीछे उन्होंने तीन वजह बताए: विशाल देश, तीन अलग-अलग सेवाएं और तीनों के अपने प्रमुख।” सेवा में विभिन्न समुदायों के लोगों के शामिल होने को भी उन्होंने एक कारण बताया। जनरल करिअप्पा ने सैन्य शासन लागू होने के संभावित कारणों का भी जिक्र किया है। वे कहते हैं कि “यदि राजनेता स्वेच्छा से देश को सेना को सौंप दें जैसा कि पड़ोसी देश में किया गया था” या “यदि लोग इस तरह के शासन की मांग करते हैं” तो सैन्य शासन लागू हो सकता है।

लेखक और पत्रकार सुगत श्रीनिवासराजू ने इस नोट की खोज की। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “राज्य अभिलेखागार इतना अव्यवस्थित है कि इस नोट को गलत तरीके से 1948 का बताया गया। मुझे नहीं पता कि यह वहां कैसे पहुंचा। इसे ‘निजी संग्रह’ श्रेणी में रखा गया है। मुझे यह भी पता नहीं है कि यह किसका निजी संग्रह है।”

सेवानिवृति के बाद शुरुआती वर्षों राजनीति और लोकतंत्र के बारे में करिअप्पा के बयानों ने बहस छेड़ दी थी। ऐसा माना जाता है कि उन्हें सरकार द्वारा 1953 से 1956 तक ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भारतीय उच्चायुक्त के रूप में तैनात किया गया था, ताकि उन्हें घरेलू मामलों से से दूर रखा जा सके।

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