गैंगस्टर से नेता बने गुरप्रीत सिंह सेखों रविवार को औपचारिक रूप से आम आदमी पार्टी (AAP) में शामिल हो गए। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने फिरोजपुर जिले के जीरा में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में सेखों का आम आदमी पार्टी में स्वागत किया।
इसके साथ ही गुरप्रीत सिंह सेखों पंजाब के उन कई अंडरवर्ल्ड चेहरों की सूची में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने अपराध की दुनिया से निकलकर मुख्यधारा की राजनीति में कदम रखा है। हालांकि, इनमें से कोई भी पंजाब विधानसभा का सदस्य बनने के लिए चुनाव नहीं जीत पाया है।
फिरोजपुर जिले के मुडकी गांव के रहने वाले सेखों का परिवार कांग्रेस से जुड़ा हुआ है। हालांकि आम आदमी पार्टी में शामिल होने से पहले जब उनका राजनीतिक प्रभाव बढ़ा तो विभिन्न राजनीतिक दलों ने उनसे संपर्क किया था।
सेखों पहले ही अपने परिवार के जरिए चुनावी राजनीति में अपनी किस्मत आजमा चुके थे। उनकी दोनों पत्नियां- मनदीप कौर सेखों और कुलजीत कौर सेखों पहले शिरोमणि अकाली दल (SAD) के समर्थन से जिला परिषद चुनाव जीत चुकी हैं। मनदीप कौर ने बाजिदपुर जोन, जबकि कुलजीत कौर ने फिरोजेशाह जोन से चुनाव जीता था।
सेखों का आम आदमी पार्टी (AAP) में शामिल होना परिवार की कांग्रेस से जुड़ी जड़ों से एक बदलाव का प्रतीक है और यह जिला परिषद चुनावों के दौरान उनकी गिरफ्तारी के कुछ महीनों बाद हुआ है। एक गिरफ्तारी जिसके बारे में उनके समर्थकों ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन सत्तारूढ़ दल द्वारा उनके बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए रची गई थी।
हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। कहा जाता है कि इस घटना ने उनके उम्मीदवारों के लिए सहानुभूति मत को और मजबूत किया है। हालांकि, पंजाब में गैंगस्टरों से लेकर राजनीति तक का यह सिलसिला कहीं अधिक पुराना है।
फरीदकोट के चांदभान गांव के प्रभजिंदर सिंह बराड़ उर्फ डिम्पी चांदभान, जिन्हें व्यापक रूप से पंजाब का पहला बड़ा डॉन माना जाता है। उनके शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) से घनिष्ठ संबंध थे, जिसका नेतृत्व सिमरनजीत सिंह मान कर रहे थे और जिनकी पार्टी ने 1989 के लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया था।
लेकिन पंजाब में चुनावों को रद्द करने और उग्रवाद पर पुलिस की व्यापक कार्रवाई ने चांदभान की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को खत्म कर दिया, जिससे उन्हें राज्य छोड़कर उत्तर प्रदेश भागने के लिए मजबूर होना पड़ा, जहां उन्होंने मुख्तार अंसारी जैसे लोगों के साथ संबंध बनाए। 2006 में चंडीगढ़ के लेक क्लब के बाहर उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
जसविंदर सिंह भुल्लर उर्फ रॉकी फाजिल्का, जो कभी डिम्पी चांदभान के सहयोगी थे। उन्होंने बाद में चुनावी राजनीति में खुद हाथ आजमाया। उन्होंने 2012 के विधानसभा चुनाव में फाजिल्का से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें एसएडी का मौन समर्थन प्राप्त था और वे भाजपा के सुरजीत कुमार ज्यानी से 1,700 से भी कम वोटों से हार गए।
रॉकी को 2016 में हिमाचल प्रदेश के परवानू के पास कथित तौर पर एक अन्य गैंगस्टर जयपाल भुल्लर ने गोली मार दी थी। उनकी बहन राजदीप कौर ने परिवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाया और कांग्रेस का टिकट न मिलने के बाद फाजिल्का से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ा।
उन्हें 38,000 से अधिक वोट मिले, लेकिन वे हार गईं। उन्होंने 2018 में सुखबीर सिंह बादल द्वारा संबोधित एक “पोल खोल” रैली में एसएडी में शामिल हुईं और इस अवसर पर उन्हें सिरोपा भेंट किया गया।
40 से अधिक आपराधिक मामलों में कुख्यात और सबसे वांछित गैंगस्टर जयपाल भुल्लर खुद 2021 में कोलकाता में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था। उनके पिता, पंजाब पुलिस के सेवानिवृत्त निरीक्षक हरपाल भुल्लर ने एक समय चुनाव लड़ने की अपनी मंशा की घोषणा की थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया।
गुरदासपुर में इस बीच, जेल में बंद गैंगस्टर जग्गू भगवानपुरिया की मौसी राजविंदर कौर, जिन्हें इलाके में “मासी” के नाम से जाना जाता है, डेरा बाबा नानक क्षेत्र में एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में उभरी हैं। वह पहले से ही डेरा बाबा नानक ब्लॉक समिति की चेयरपर्सन हैं और उन्होंने विधानसभा चुनाव में डेरा बाबा नानक सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा भी जाहिर कर दी है।
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की नियुक्ति पर पंजाब में राजनीतिक टकराव देखने को मिल रहा है। केंद्र सरकार ने जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस नियुक्त किया है। इसे लेकर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने रविवार शाम कैबिनेट की एक इमरजेंसी बैठक बुलाई है। पढ़ें पूरी खबर।
