गंगा की छाती को चीर रहे हैं खनन माफिया

जिले में खनन माफिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट नमामि गंगे की धज्जियां उड़ा रहे हैं। जिले के नरौरा, अहार, रामघाट व कर्णवास स्थित गंगा तटों से बड़े पैमाने पर बालू का अवैध खनन हो रहा है। अवैध खनन में लगे इन माफियाओं को न ही नेशलन ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की परवाह है और […]

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केंद्र सरकार ने गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए नमामि गंगे परियोजना चलायी है। (फाइल फोटो)

जिले में खनन माफिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट नमामि गंगे की धज्जियां उड़ा रहे हैं। जिले के नरौरा, अहार, रामघाट व कर्णवास स्थित गंगा तटों से बड़े पैमाने पर बालू का अवैध खनन हो रहा है। अवैध खनन में लगे इन माफियाओं को न ही नेशलन ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की परवाह है और न ही प्रशासन का डर। रोजाना शाम होते ही शुरू होने वाला बालू खनन पूरी रात चलता है। बालू से भरी सैकड़ों ट्रॉलियां जिले भर में बेरोकटोक निकलती हैं। खास बात ये है कि यह बालू खनन भोर होते ही रोक दिया जाता है। इस पर न तो पुलिस कोई ध्यान दे रही है और न ही प्रशासन। गंगा किनारे चल रहे अवैध खनन से जहां गंगा की जलधारा प्रभावित हो रही है। वहीं जल जीवों पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। खासकर डॉल्फिन की संख्या में तेजी से कमी आई है।

गंगा में बढ़ रहे अवैध खनन को रोकने के लिए भले ही एनजीटी ने नदियों के तल से बगैर लाइसेंस या पर्यावरणीय इजाजत रेत के खनन पर रोक लगा रखी है। लेकिन सरकारी मशीनरी की मिलीभगत से अवैध रूप से बालू निकालने का काम धड़ल्ले से हो रहा है।

घाटों तक जलधारा लाने, मलबा हटाने और गंगा की सफाई के बहाने अवैध खनन किया जा रहा है। इससे गंगा में जगह जगह 20 से 25 फुट तक गहरे गड्ढे हो गए हैं। जिससे कई जगह गंगा की जलधारा बदल गई है। जबकि अन्य कई जगहों पर भी जलधारा बदलने का खतरा बढ़ गया है। जलधारा बदलने से गंगा किनारे बसी आबादी के लिए खतरा बढ़ रहा है। इसके अलावा मछलियों के अंडे देने का स्थान नष्ट होने के साथ साथ जलजीवों पर भी बुरा असर पड़ रहा है। गंगा में निरंतर बढ़ते अवैध खनन और सरकारी नाकामियों की वजह से इसकी गोद में अठखेलियां करने वाली डॉल्फिन का अस्तित्व खतरे में है।

जिले के नरौरा स्थित प्रदेश के इकलौते वेटलैंड (रामसर साइट) पर अवैध खनन जोरों से चल रहा है। इससे
इसमें विचरण करने वाले जलीय जीवों खासकर डॉल्फिन की संख्या में तेजी से कमी आई है। इसके अलावा लगातार हो रहे अवैध खनन से जहां भूजल स्तर प्रतिदिन नीचे जा रहा है, वहीं पेयजल व सिंचाई की योजनाएं भी प्रभावित हो रही हैं। प्रशासन की उदासीनता के कारण खनन माफिया के हौसले बुलंद हैं। उन्होंने जिले में 200 करोड़ से ज़्यादा का साम्राज्य खड़ा कर दिया है। खनन रोकने के लिए कुछ पंचायतों के बाशिंदे अपने स्तर पर पहल करते हैं। मगर खनन माफियाओं के आगे उनकी एक नहीं चलती।

अधिकारियों और खनन माफियाओं का सिंडिकेट रेत से मोटी कमाई करता है। सूरज ढलते ही ट्रैक्टर, डंपर और जेसीबी मशीनें गंगा के किनारे लग जाती हैं। पौ फटने के पहले तक सैकड़ों ट्रॉलियों से अवैध खनन हो जाता है। सुबह होते ही गंगा के किनारे मशीनरी का नामों निशान नहीं रहता। उसके बाद सभी तहसील क्षेत्रों में बालू की मंडियां सजने लगती हैं। सब कुछ तय होता है। कोई रोक-टोक नहीं। बालू से लदे वाहनों का रेला जिले के सभी इलाकों में बेरोकटोक निकलता है।

खनन माफिया सरकारी तंत्र से सांठगांठ कर एक ट्रक बालू की कीमत लगभग 22 से 25 हजार रुपए वसूल रहे हैं। जबकि बालू की एक ट्राली छह से दस हजार रुपए और बुग्गी 1500 रुपए में बिक रही है। हर रोज लाखों की अवैध कमाई के इस धंधे में जहां शासन को चपत लग रही है। वहीं अधिकारी मालामाल हो रहे हैं। पुलिस प्रशासन की सख्ती महज दिखावटी होने से अवैध खनन का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।

सैफ सलीम

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