गणेश शंकर विद्यार्थी: दंगा रोकने नि‍कल पड़े, दंगाइयों की भेंट चढ़ गए, लाशों के ढेर में म‍िली थी देह

गणेश शंकर विद्यार्थी उस दिन सुबह-सुबह नंगे पांव ही दंगों को रोकने निकल गए। मारकाट के बीच वह फंस गए और फिर गायब हो गए। एक दिन उनका शव अस्पताल के बाहर पड़ा मिला।

Ganesh Shankar Vidyarthi
भारतीय डाक ने गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम पर जारी किया था टिकट। क्रेडिट- Indian Post Website

एक ऐसा पत्रकार जिसने हिंदू-मुस्लिम दंगे को रोकने की कोशिश की और खुद दंगों की भेंट चढ़ गए। आज यानी 25 मार्च को पत्रकारिता जगत के सबसे सम्मानित शख्स गणेश शंकर विद्यार्थी की पुण्य तथि है। देश की आजादी के लिए खुद को न्योछावर कर देने वाले और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए अपनी पहचान बनाने वाले विद्यार्थी ने मानवता की रक्षा के लिए अपनी कुर्बानी दे दी।

बात 1931 की है। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी के बाद देशभर में लोग अंग्रेजों के खिलाफ आक्रोशित थे। इसी से घबराकर अंग्रेज सरकार ने दंगे भड़का दिए। कानपुर में भी दंगे होने लगे। ऐसे मौके पर गणेश शंकर विद्यार्थी से देखा न गया और वह अपना काम छोड़ सुबह नौ बजे ही नंगे पांव दंगे रोकने निकल पड़े।

दंगे रोकने को नंगे पांव निकल पड़े

विद्यार्थी घूम-घूमकर लोगों की जान बचाने का काम करने लगे। कई जगहों पर उन्हों दंगे रोकने में सफलता भी मिली लेकिन थोड़ी देर में उसी मार-काट के बीच फंस गए। साधारण दिखने वाले गणेश शंकर को लोगों ने हिंसा के बीच पहचाना भी नहीं। इसके बाद वह गायब हो गए। लोगों ने खूब खोज की लेकिन वह नहीं मिले। बाद में उनका शव एक अस्पताल के बाहर लाशों के ढेर पर पाया गया था।

कई दिन बीत जाने की वरह से उनका शरीर फूल गया था और बड़ी मुश्किल से ही पहचान में आता था। उनका इस तरह दुनिया से विदा होना बेहद दुखद था लेकिन आज वह लोगों के लिए एक मिसाल बन गए हैं। उन्होंने अपनी पत्रकारिता और जीवन को लोगों के लिए समर्पित कर दिया और जब मानवता की बात आई तो पत्रकारिता को पीछे छोड़, बिना जान की परवाह किए मारकाट की होली में शांति का संदेश लेकर कूद पड़े।

कई बार जाना पड़ा जेल

‘प्रताप’ में वह निष्पक्ष होकर बड़ी निर्भीकता के साथ अपनी बात रखते थे। इसी वजह से उन्हें पांच बार जेल जाना पड़ा। आखिरी बार 1921 में वह जेल गए। मामला एक किसान पर गोली चलाने का था। प्रताप में जब पूरी कहानी छपी तो जमींदार ने उनपर मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया। केस लंबा चला। गणेश शंकर के पास केस लड़ने के पैसे भी नहीं बचे। अंत में अंग्रेजों को बदला लेने का मौका मिल गया और उन्हें जेल की सजा सुना दी।

महात्मा गांधी से थे प्रेरित

महात्मा गांधी से वह इतने प्रेरित थे कि 16 साल की उम्र में ही किताब लिख डाली। विद्यार्थी की मौत के बाद गांधी जी ने भी इसे शानदार मौत कहा और इच्छा व्यक्त की कि काश, वह भी ऐसी ही मौत पाएं। गणेश शंकर ने 1913 में प्रताप का संपादन शुरू किया था। बीच में वह जेल भी गए लेकिन प्रताप का सिलसिला नहीं रुका। माखनलाल चतुर्वेदी जैसे लेखकों ने इस मुहिम को रुकने नहीं दिया।

आज गणेश शंकर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके आदर्शों की हर प्रोफेशन को जरूरत है। गणेश शंकर की जब मृत्यु हुई तो उनकी लाश की इतनी दुर्गति हो गई थी कि उनकी पहचान भी जेब में मिली चिट्टियों से की जा सकी। गणेश शंकर विद्यार्थी की यह आहुती महात्मा गांधी को भी हिंदू-मुस्लिम सौहार्द की राह दिखा गई।

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