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विशेष: असहयोग से पहले जरूरी प्रयोग

जो बात यहां समझने की है, वह यह कि सत्य और अहिंसा का जो साझा उन्होंने भारत आकर विकसित किया, वह महज प्रतिरोध का एक तरीका भर नहीं था बल्कि मानव विकास और सभ्यता का भी ऐसा विकल्प था, जिसमें मानवीय सहअस्तित्व को लेकर एक प्रेमल और कारुणिक समझ थी।

गांधी जी ने अपने सपनों का भारत बनाने के लिए ऐसे प्रयोग किए जो आज भी उतने ही अनुकूल और प्रासंगिक हैं, जितने ब्रिटिश रूल के समय थे।

इतिहास अपने को दोहराता है, यह तो खैर एक मिथ है। अलबत्ता इतिहास का अपना देशकाल हर कालचक्र में अनुभव की कुछ ऐसी बारिकियों को हमारे साथ जरूर साझा करता है, जो समयसिद्ध सबक की तरह होते हैं, साखी की तरह होते हैं। तारीख के पुराने हर्फ दोहराने की यही उपयोगिता है। दिलचस्प है कि 1920 के असहयोग आंदोलन से तीन साल पहले गांधी चंपारण में सत्याग्रह का प्रयोग कर चुके थे। तब देश में कांग्रेस ने भी वह हैसियत अख्तियार नहीं की थी कि वह अंग्रेजों के खिलाफ कोई आंदोलनात्मक रणनीति बनाए या सार्वजनिक तौर पर उसके विरोध में मुखरता का साहस दिखाए।

दरअसल, गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आए तो गोपालकृष्ण गोखले ने उन्हें सलाह दी कि वे कम से कम सालभर देशभर में घूमें, खासतौर पर भारत के ग्राम्य जीवन का अध्ययन करें। गांधी इससे पहले दक्षिण अफ्रीका में ब्रितानी सत्ता का नस्ली रंग देख चुके थे। इसके खिलाफ उन्होंने वहां शुरुआती आवाज भी उठाई थी। यानी संघर्ष का अहिंसक पाठ वे दक्षिण अफ्रीका में न सिर्फ सीख चुके थे बल्कि उसे आजमा भी चुके थे।

लिहाजा जो बात यहां समझने की है, वह यह कि सत्य और अहिंसा का जो साझा उन्होंने भारत आकर विकसित किया, वह महज प्रतिरोध का एक तरीका भर नहीं था बल्कि मानव विकास और सभ्यता का भी ऐसा विकल्प था, जिसमें मानवीय सहअस्तित्व को लेकर एक प्रेमल और कारुणिक समझ थी। गांधी के बाद जिन लोगों ने भी उनके विचार का अध्ययन किया है, उनमें ज्यादातर ने इस बात को रेखांकित किया है कि गांधी जिसे सत्याग्रह कहते हैं, वह महज अहिंसक संघर्ष भर नहीं है।

यह भी कि उनके सत्याग्रह में कोई पक्ष-विपक्ष नहीं है। वे जीत-हार की बात नहीं करते, बल्कि सबके सामने समान रूप से सत्य का आग्रह रखते हैं। आज जब हम गांधी के अहिंसक प्रयोगों को सौ साल बाद याद कर रहे हैं तो सबसे अहम सबक हमारे लिए यही है कि हम अपने दौर के सत्य को सबसे पहले चिह्नित करें।

स्वच्छता से लेकर विकास तक जितने भी मुद्दे आज हमारे सामने हैं, उसमें मानव मन की श्रद्धा और प्रेम कहां है? अगर हम इस विलोप के साथ आगे बढ़ेंगे तो फिर किसी मुद्दे का कारगर या स्थायी समाधान शायद ही ढूंढ़ पाएं। यह बात देश के किसानों-मजदूरों को लेकर भी अलग से समझने की जरूरत है क्योंकि कोरोना की मार सबसे ज्यादा देश के इसी तबके पर पड़ी है।

प्राचीन भारत की गरिमा में अपना आदर्श और संतोष देखने वालों से पूछना चाहिए कि देश की खेती-किसानी की वह दशरथी परंपरा कहां है, जिसमें अन्न उत्पादन को ऋषि साधना तो माना गया है पर उसके व्यापार या खरीद-फरोख्त को उतना ही कुत्सित कर्म। रही बात किसानों के संघर्ष की तो याद रखना होगा कि गांधी ने चंपारण में निलहे अंग्रेजों के उत्पीड़न के खिलाफ कोई मोर्चा सीधे नहीं खोला था, बल्कि वे तो इस सत्य को वहां लगातार रेखांकित करते रहे कि किसानों के साथ जो हो रहा है, वह अन्यायपूर्ण है, अमानवीय है। सत्याग्रही व्याख्या की दृष्टि से देखें तो अहिंसक संघर्ष में ताकतवर आप नहीं होते बल्कि आपका वह सत्य होता है, जो पूरी तरह निरावृत है। उसकी कसौटी सबके लिए एक है।

चंपारण में सत्याग्रह के प्रयोग के पहले 1909 में ‘हिंद स्वराज’ लिख चुके गांधी अगर भारत की स्वाधीनता के लिए ग्राम स्वराज की दरकार लेकर सामने रखते हैं, तो कहीं न कहीं वे भारत की असली ताकत को उस परंपरा में देखते हैं, जिसमें संयम, स्वावलंबन, पुरुषार्थ, सामाजिक परस्परता आदि को लेकर या तो एक लोक विवेक रहा है या फिर इनके लिए चित्त और मानस की अनुकूलता वहां सर्वाधिक है।

कृषक भारत की खुशहाली गांधी के सपनों का भारत था। तभी तो 1917 से शुरू होकर कम से कम 1920 तक वे लगातार किसानों के बीच जाते हैं। पहले चंपारण, फिर खेड़ा और बारदोली। इससे आगे जब वे साबरमती से दांडी मार्च के लिए निकलकर वापस लौटते हैं, तो अपने लिए रास्ता और समाधान गांवों के बीच ही देखते हैं।

कह सकते है कि गांधी भारत के गांवों और वहां के लोगों के साथ खड़े होकर अहिंसक स्वाधीनता संघर्ष का शील और धज एक साथ तय कर रहे थे। महज 2200 रुपए के खर्च से उन्होंने चंपारण में अपना सत्याग्रह चलाया था। आखिर यह कामयाबी इसलिए उनके हाथ लगी क्योंकि ग्राम समाज उनके भरोसे का समाज था, उनके मन का विस्तार था। यहीं वे लोकतंत्र की अपनी विकेंद्रित समझ को गढ़ते हैं और ट्रस्टीशिप की दरकार को भी आगे बढ़ाते हैं।

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