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Gandhi Jayanti 2019: दक्षिण अफ्रीका में गांधी- वकील से महात्मा तक का सफर, जानें किन हस्तियों का रहा प्रभाव

Gandhi Jayanti 2019: पोरबंदर के रहने वाले दादा अब्दुल्ला जो नटाल में बस गए थे, उन्हीं ने गांधी को दक्षिण अफ्रीका बुलाया था। उनकी जिंदगी पर शायद यह सबसे बड़ा वैश्विक प्रभाव था।

Gandhi Jayanti 2019: टॉल्सटॉय आश्रम की तस्वीर (फोटो- एक्सप्रेस अर्काइव)

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Father of Nation Mahatma Gandhi) की उनके निधन के बाद जिस तरह से प्रशंसा हुई थी, वह आज भी उसी तरह बरकरार है। वकील से महात्मा तक के सफर में उनके जीवन पर कई लोगों का प्रभाव रहा। उनके निधन पर किंग जॉर्ज षष्टम (King George VI) ने लंदन में कहा था कि यह मानव जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। न्यूयॉर्क के एक स्तंभकार एल्बर्ट ड्यूश ने कहा था कि उस दुनिया के लिए अभी भी एक उम्मीद है जिसने गांधी के निधन (Gandhi’s Death) पर दुख और उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया था।

‘तुमने वकील दिया, हमने महात्मा’: गांधी जी के प्रभाव को नेल्सन मंडेला, रॉबर्ट मुगाबे और मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसी महान शख्सियतों ने भी पहचाना था, हालांकि उन्होंने गांधी को बतौर भारतीय उतना नहीं सराहा। दक्षिण अफ्रीकी लोग शेखी बघारते हुए कहते हैं, ‘तुमने हमें वकील दिया था, हमने तुम्हें महात्मा दिया।’ हर जगह से विचारों को स्वीकार करना, उनका अपने अद्भुत दिमाग में विश्लेषण करना और व्यवहार में लाना गांधी जी की विलक्षण प्रतिभा थी।

‘कभी फैशन में खासी रूचि लेते थे गांधी’: 1888-90 के दौरान लंदन के पिकैडली सर्कस में स्टूडेंट गांधी को देखा गया था, महंगे कपड़े और बेहतरीन टोपी लगाए हुए मोहनदास उस समय भी चर्चा में आए थे। बीआर नंदा की ‘महात्मा गांधी- एक जीवनी (1958)’ में उनके साथी छात्रों सच्चिदानंद सिन्हा का भी जिक्र है, सिन्हा के मुताबिक गांधी फैशन में खासी रूचि लेते थे। उस गांधी में और 1931 में लॉर्ड इरविन से बात करने वाले में बहुत अंतर था। इस समय गांधी मुट्ठी भर कॉटन की बनी धोती पहने हुए थे। अब तक वे लंबा सफर तय कर चुके थे।

भारत को आजादी दिलाने में महात्मा गांधी ने महत्वपूर्ण निभाई थी। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

गांधी की जिंदगी में दादा अब्दुल्लाः पोरबंदर के रहने वाले दादा अब्दुल्ला जो नटाल में बस गए थे, उन्हीं ने गांधी को दक्षिण अफ्रीका बुलाया था। उनकी जिंदगी पर शायद यह सबसे बड़ा वैश्विक प्रभाव था। दक्षिण अफ्रीका की जिंदगी के नए अनुभवों को बताते हुए गांधी ने लिखा था, ‘मुझे अनुभव का उपन्यास मिल गया। मुझे हरे-भरे खेत और नई जगह देखना बेहद पसंद है। उन लोगों को कमीशन देना बेहद घृणास्पद था जो मुझे काम देते थे। सौराष्ट्र में साजिश का वातावरण मेरा दम घोंट रहा था। एक साल तक यह सब चलता रहा और मैंने इसे स्वीकार करने में कोई आपत्ति भी नहीं जताई। मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था क्योंकि मेसर्स दादा अब्दुल्ला ने मेरे आवागमन समेत बाकी के खर्चे और 105 पाउंड की फीस उठाने की इच्छा जताई थी। यह व्यवस्था मेरे बड़े भाई के जरिये हुई थी, अब उनका निधन हो चुका था, मेरे लिए वो पिता की तरह थे। मेरे लिए उनकी इच्छा अनिवार्य आदेश की तरह थी। उन्हें मेरे दक्षिण अफ्रीका जाने का विचार पसंद आया था। मई 1893 में मैं डरबन पहुंचा।’

…इन हस्तियों का भी रहा असरः गांधी के धारदार संवाद, तर्क-वितर्क, पत्र और उनके साथ हुए विश्वासघातों ने उन्हें एक वैश्विक नागरिक बना दिया, इसका श्रेय उन्हें जाता है। हिंद स्वराज (1909) के हिंदी संस्करण की प्रस्तावना में गांधी ने बताया कि भारतीय दार्शनिकों के साथ-साथ उन पर लियो टॉल्सटॉय, जॉन रस्किन, हेनरी डेविड थोरियू, राल्फ वाल्डो इमरसन और अन्य लोगों का भी प्रभाव रहा।

टॉल्सटॉय के नाम पर रखा था आश्रम का नामः महात्मा की उपाधि मिलने से काफी पहले गांधी ने दुनिया से संवाद किया और सभी प्रभावों को स्वीकार किया। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने अपने आश्रम का नाम टॉल्सटॉय के नाम पर रखा था। टॉल्सटॉय की किताब 1894 में आई ‘द किंगडम ऑफ गॉड इस विदिन यू’ ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा और टॉल्सटॉय की कही 10 में से 5 बातों ने अहिंसा और प्रेम के सिद्धांतों में गांधी के विश्वास को और मजबूत किया। गांधी के संपादन में छपने वाले साप्ताहिक अखबार ‘इंडियन ओपिनियन’ में टॉल्सटॉय के पत्र प्रकाशित होते थे, इन पत्रों ने दोनों के बीच बातचीत को आगे बढ़ाया।

यूं मिला ‘सर्वोदय’ का विचारः दर्शन और कला के ज्ञाता रस्किन ने भी कई बार गांधी का जिक्र किया। दक्षिण अफ्रीका के पीटरमैरिट्जबर्ग में जब गांधी को अश्वेत होने के चलते ट्रेन से बाहर निकाल दिया गया था, गांधी ने दूसरी ट्रेन से यात्रा की। जब वे जोहानिसबर्ग पहुंचे तो एक मित्र ने उन्हें एक किताब दी, यह किताब जॉन रस्किन की ‘अनटू दिस लास्ट’ (1860) थी, यहीं से गांधी को सर्वोदय या सर्व-कल्याण का विचार आया। जुलाई 1946 में पुणे में राज्य के उद्योग मंत्रियों की एक सभा को संबोधित करते हुए गांधी ने इस किताब के जादुई प्रभाव को याद किया था। आजाद भारत का औद्योगिक भविष्य लिखने जा रहे लोगों से उन्होंने कहा, ‘यदि मानव अपनी प्रगति की ओर बढ़ रहा हो, उसे समानता और भाईचारे का अनुभव हो तो उसे अनटू दिस लास्ट के सिद्धांतों पर काम करना चाहिए, उसे मूक बधिरों और अपाहिजों को भी साथ लेकर चलना चाहिए। जिस देश में कमजोरों के लिए जगह न हो वह मेरे लिए आजादी की तस्वीर नहीं है। मैं मशीनी संसाधनों के इस्तेमाल पर विचार से पहले उपलब्ध मानव श्रम का इस्तेमाल करना चाहिए।’

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हर्मन कैलनबेक से रहा गहरा नाताः गांधी और हर्मन कैलनबेक की गहरी दोस्ती थी। दक्षिण अफ्रीकी यहूदी जिसने गांधी को अपने लिए जान से प्यारा बताया था। 1910 में कैलनबेक ने ही उन्हें टॉल्सटॉय आश्रम बनाने में मदद की थी, उन्हें हजारों एकड़ जमीन दी थी। जब गांधी को जेल हो गई तो कैलनबेक ने ‘इंडियन ओपिनियन’ के संपादन में मदद की थी। कैलनबेक ने भारत आकर भी गांधी से मुलाकात की थी और उनके आश्रम में कुछ वक्त बिताया था। जब वो बीमार पड़े तो गांधी भी उनके साथ रहे और उन लोगों में शामिल थे, जिन्होंने कैलनबेक का अंतिम संस्कार किया। उनकी मौत ने गांधी को गहरा धक्का पहुंचाया था।

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