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संत परंपरा: वैष्णव भक्ति केंद्र गलताजी मठ

कृष्णदास पायोहारी के शिष्य भगवान जी और नारायण जी ने वर्ष 1604 में गुरदासपुर के निकट पिंडोरी नामक स्थान पर एक विशाल मठ की स्थापना की जो आज भी भव्य स्थिति में है।

Sant parampara, tradition, ramanandi sectराजस्थान के जयपुर के पास अरावली की पहाड़ियों में स्थित गलताजी पीठ।

राज सिंह
विशिष्टद्वैत सिद्धांत के प्रतिपादक महान वैष्णव संत, स्वामी रामानुज ने श्री संप्रदाय की स्थापना दक्षिण भारत में की। वैष्णव भक्ति की इस परंपरा को उत्तर भारत में स्थापित करने का श्रेय स्वामी रामानुज की ही परंपरा के संत स्वामी रामानंद जी को जाता है। वैसे तो स्वामी रामानंद जी के अनेक शिष्य थे, लेकिन लंदन विश्वविद्यालय द्वारा किए गए शोध के अनुसार रामानंदी संप्रदाय की स्थापना उनके शिष्य अनंतानंद ने की थी और इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी उनके पौत्र शिष्य श्री कृष्ण दास पयोहारी जी ने। रामानंदी संप्रदाय के कुल 36 द्वारे (पीठ) हैं। इन द्वारों के अधीन भारत, पाकिस्तान और नेपाल में सैकड़ों मठ मंदिर हैं। इन 36 रामानंदी वैष्णव पीठों में से एक, जयपुर के पास अरावली की पहाड़ियों में स्थित गलताजी पीठ का विशेष महत्व है।

गलताजी तीर्थ ऊंची पर्वत मालाओं से घिरा हुआ है। गलताजी में बहुत सारे मंदिर हैं। जिनमें सीताराम मंदिर ,बालाजी मंदिर और सूर्य मंदिर प्रमुख हैं। यद्यपि अधिकांश मंदिरों का निर्माण दक्षिण भारतीय शैली में किया गया है लेकिन रामानंदी संप्रदाय की परंपरा मंदिरों में बहुत आसानी से देखी जा सकती है। इसमें आठ प्रसिद्ध कुंड है जिनके नाम हैं : यज्ञ कुंड, कर्म कुंड, चौकोर कुंड ,मदार्ना कुंड, जनाना कुंड, बावरी कुंड केले का कुंड और लाल कुंड।

इन सब में बड़ा और प्रधान कुंड, मदार्ना कुंड है। गलताजी के इस बड़े कुंड में निर्बाध रूप से जलधारा गिरती रहती है। सावन और कार्तिक मास में यहां पवित्र कुंडों में हजारों की संख्या में श्रद्धालु स्नान करने के लिए आते हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह स्थान गालव ऋषि की तपोभूमि भी रही है। गलताजी पीठ की स्थापना 16 वीं शताब्दी में स्वामी रामानंद जी के पौत्र शिष्य कृष्णदास पायोहारी जी ने की थी। इस पीठ के लिए जमीन कछवाहा राजपूत वंश के शासक पृथ्वीराज की रानी बालन बाई की मदद से मिली। रानी बालन बाई, वैष्णव संत कृष्ण दास पायोहारी से अत्यंत प्रभावित थी। इतिहासकारों के अनुसार कृष्णदास पायोहारी ने तारानाथ नाम के एक संत को शास्त्रार्थ में हराया था।

दक्षिण भारत में टोडरी नामक स्थान वैष्णव भक्ति और परंपरा का बहुत महत्त्वपूर्ण केंद्र माना जाता रहा है। 16वीं शताब्दी में जब गलताजी पीठ की स्थापना हुई तो इसे उत्तर भारत का टोडरी भी कहा जाने लगा। गुरु नानक जी के मौसेरे भाई और रामानंदी संत बाबा राम थमन जी भी कृष्णदास पायोहारी की परंपरा से ही थे। बाबा राम थमन जी ने वर्तमान पाकिस्तान में कसूर से 20 किलोमीटर दूरी पर कालूखेड़ा नामक स्थान पर एक मठ की स्थापना की थी। स्वतंत्रता से पूर्व देश में बैसाखी पर सबसे बड़ा मेला इसी मठ पर भरता था।

17 वी शताब्दी के महान योग गुरु किलादेवाचार्य भी कृष्णदास पायोहारी के ही शिष्य थे। किला देवाचार्य को उस समय का सबसे बड़ा योग गुरु माना जाता था। भक्तमाल के रचयिता नाभादास के गुरु स्वामी अग्रदास भी कृष्णदास पायोहारी के शिष्य थे। अविभाजित पंजाब में भी कृष्णदास पायोहारी ने अपने शिष्यों के द्वारा अनेक मठों और मंदिरों का निर्माण करवाया। 17 वीं शताब्दी में आध्यात्मिक जगत में विश्व भर में प्रसिद्धि पाने वाले संत बाबा लाल दयाल के दादा गुरु भी कृष्णदास पायोहारी ही थे, जिन्होंने न केवल पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में में अनेक मठों की स्थापना की, बल्कि चेन्नई में प्रसिद्ध बैरागी मठ भी बनाया।

कृष्णदास पायोहारी के शिष्य भगवान जी और नारायण जी ने वर्ष 1604 में गुरदासपुर के निकट पिंडोरी नामक स्थान पर एक विशाल मठ की स्थापना की जो आज भी भव्य स्थिति में है। रामानंदी संत कृष्णदास पायोहारी हिमाचल प्रदेश में कुल्लू के राजा जगत सिंह के भी राजगुरु रहे। उन्होंने ही राजा जगत सिंह से कहकर कुल्लू में रघुनाथ जी का मंदिर बनवाया। इस मंदिर में स्थापित भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति, दामोदर दास बैरागी , कृष्णदास पायोहारी के कहने पर ही अयोध्या से लाए थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि रामानंदी संप्रदाय के संगठन का देशभर में विस्तार करने का श्रेय कृष्णदास पायोहारी को ही जाता है।

(लेखक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं)

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