सुबह इनामुल हसन दिल्ली के सराय काले खां के एक स्कूल में उर्दू पढ़ा रहे थे। दोपहर तक उन्होंने छठी से दसवीं कक्षा के छात्रों की परीक्षा की निगरानी भी पूरी कर ली। लेकिन उनकी ड्यूटी यहीं खत्म नहीं हुई। परीक्षा खत्म होने के महज 15 मिनट बाद वह उसी इलाके की संकरी गलियों में एक ऐसे मकान की तलाश में निकल पड़े, जिसका पता कहीं मिल नहीं रहा था।

इस बार इनामुल शिक्षक नहीं, बल्कि दिल्ली के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) की भूमिका में थे। उनके कंधे पर नोटिसों से भरा एक बैग था। उनके ऊपर मतदाताओं तक पहुंचने की, उन्हें नोटिस देने, जरूरी दस्तावेज समझाने और उनकी सुनवाई करने की जिम्मेदारी थी। उनकी तलाश का पहला ठिकाना था ‘मकान नंबर 76’, जहां शुभम बशिष्ठ नाम के एक मतदाता का घर होना चाहिए था। लेकिन संकरी गलियों में ऐसा कोई मकान नजर नहीं आ रहा था।

इनामुल करीब तीन महीने से इस इलाके में बीएलओ के तौर पर काम कर रहे हैं। लेकिन ‘काले खां’ की इन संकरी गलियों में उन्होंने मकान नंबर 76 कभी नहीं देखा। स्थानीय लोग इस इलाके को इसी नाम से जानते हैं। यहां जगह इतनी कम है कि कार, बाइक, टेंपो, गाय, कुत्ते और बकरियां एक-दूसरे के बीच से निकलते नजर आते हैं। टूटी सड़कों के किनारे खुली नालियां हैं और जगह-जगह पानी से भरे गड्ढे हैं।

इनामुल के हाथ में जो नोटिस है, वह शुभम बशिष्ठ और उनके परिवार के दो सदस्यों ममता और गीता देवी के नाम है। इनामुल शुभम को बार-बार फोन करते हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलता। वह मकान की तलाश जारी रखते हैं। कुछ आगे मुख्य सड़क पर एक दुकान के बैनर से पता चलता है कि मकान नंबर 76 दाईं तरफ की गली में होना चाहिए। इनामुल गली में दाखिल होते हैं, लेकिन वहां किसी भी मकान पर नंबर लिखा नहीं मिलता।

76 नंबर का मकान गली में मिलता ही नहीं है

एक स्थानीय व्यक्ति उन्हें बताता है कि इस गली में मकान नंबर 76 नाम की कोई जगह है ही नहीं। आसपास की गलियों में भी ज्यादातर मकानों पर कोई नंबर नहीं है। सिर्फ एक मकान पर ‘86T’ लिखा दिखाई देता है। स्थानीय व्यक्ति बताता है, “हमारे दादा के पास कभी 86T का एक बड़ा खसरा था। बाद में वह कई हिस्सों में बंटता गया, लेकिन इन हिस्सों पर बने मकान कभी रजिस्टर्ड नहीं हुए।”

वह इनामुल को सलाह देता है, “शुभम नाम सुनकर लगता है कि वह गांव में मकान का मालिक होगा, किरायेदार नहीं। आप मुख्य सड़क पर वापस जाइए। चौराहे तक सीधे जाइए और वहां समोसे की दुकान वाले से पूछिए। शायद उसे पता हो।”

समोसे की दुकान का मालिक शुभम के बारे में सुन चुका है, लेकिन उसे यह नहीं पता कि वह रहता कहां है। वह आगे एक किराने की दुकान की ओर इशारा करता है और बताता है कि वह दुकान शुभम के किसी रिश्तेदार की है। करीब 200 मीटर चलने के बाद दुकान का मालिक बताता है कि शुभम इसी सड़क पर रहता है।

सड़क के आखिरी छोर पर कुछ स्थानीय लोग भी कहते हैं कि वे शुभम नाम के एक व्यक्ति को जानते हैं। उनमें से एक ऊपर जाता है और उसे बुलाता है। लेकिन यहां भी इनामुल को निराशा हाथ लगती है। ऊपर से आया व्यक्ति कहता है, “यह मेरा फॉर्म नहीं है। मैं शुभम बशिष्ठ नहीं हूं।”

एक मतदाता को खोजने में इनामुल अपनी दोपहर का बड़ा हिस्सा लगा चुके हैं। इसी बीच पास का एक दुकानदार, परवेश, उन्हें पहचान लेता है। वह इनामुल के क्षेत्र का मतदाता है और कुछ दिन पहले मिला नोटिस लेकर उनके पास आ जाता है। परवेश पूछता है, “इसके लिए मुझे कौन-कौन से दस्तावेज लाने होंगे?”

इनामुल बताते हैं कि आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक खाते का प्रमाण, जन्म प्रमाणपत्र या स्कूल की मार्कशीट में से कोई भी दो दस्तावेज देने होंगे। किस्मत से परवेश के पास आधार कार्ड और बैंक की पासबुक दोनों हैं।

इनामुल कहते हैं, “बहुत अच्छा, मैं अभी आपकी सुनवाई कर देता हूं।” इनामुल अपना काम शुरू ही करते हैं कि उनका फोन लगातार बजने लगता है। नोटिस पाने वाले मतदाता फोन करके पूछ रहे हैं कि उन्हें कौन से दस्तावेज लाने हैं, सुनवाई के लिए कब और कहां पहुंचना है और इसके बाद उन्हें क्या करना होगा।

परवेश का बेटा कहता है कि शायद उसे पता है कि मकान नंबर 76 कहां हो सकता है। वह इनामुल को दो गलियां आगे ले जाता है, लेकिन वहां भी मकान नंबर 76 नहीं मिलता। इसके बाद एक और स्थानीय व्यक्ति इनामुल को बताता है कि शुभम का एक रिश्तेदार सड़क के नीचे की तरफ किराने की दुकान चलाता है। इस बार इनामुल की तलाश सफल होती है। वह दुकान वास्तव में शुभम के चचेरे भाई की ही होती है।

छोटी-सी दुकान के अंदर खड़े होकर इनामुल शुभम और उनके परिवार के लिए पावती के फॉर्म भरते हैं। हर फॉर्म की तस्वीर खींचते हैं, उसे अपलोड करते हैं और नोटिस पाने वाले व्यक्ति की नोटिस के साथ तस्वीर भी लेते हैं। शुभम का चचेरा भाई झुंझलाते हुए पूछता है, “क्या हमारे लिए अब यही एक काम बचा है? क्या हम अपनी दुकानें बंद करके पूरा दिन यही करते रहें?”

मैदान में तीन घंटे बिताने के बाद इनामुल पांच नोटिस बांट चुके हैं और दो मतदाताओं की सुनवाई कर चुके हैं। वह कहते हैं, “हम इस तरह के इलाके में सड़क पर खड़े होकर यह काम कैसे कर सकते हैं, जहां हमें यह तक नहीं पता कि मकान कहां हैं?” इनामुल सुबह घर से खाना लेकर नहीं निकले थे। अब वह घर जाकर खाना खाने और फिर दो घंटे के लिए वापस लौटने का फैसला करते हैं।

उन्हें कुल 519 मतदाताओं की जिम्मेदारी दी गई है। इनमें से 137 लोगों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं। अभी उन्हें 30 और लोगों को नोटिस देना है और करीब 100 लोगों की सुनवाई करनी बाकी है। लेकिन SIR उनके काम का सिर्फ एक हिस्सा है।

इनामुल सुबह 5 बजे नमाज के लिए उठे थे। सुबह 7:30 बजे तक वह स्कूल पहुंच गए थे और पूरा सुबह का समय वहीं बीता। शाम करीब 6 बजे जब वह आखिरकार घर के लिए निकलते हैं, तब उनके सामने 200 से ज्यादा परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएं जांचने का काम भी इंतजार कर रहा है।

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चुनाव आयोग ने बुधवार रात Form 6 से SIR से जुड़ा एक घोषणा पत्र हटा दिया। यह बदलाव उन राज्यों में किया गया है जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। आपको बता दें कि EC ने यह फैसला चार दिन पहले लिया गया था। Form 6 नए मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट में जोड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह घोषणापत्र चुनाव आयोग के ECINET पोर्टल पर ऑनलाइन फॉर्म में जोड़ा गया था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक