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खिसकता जनाधार और बढ़ता कंफ्यूजन, मतदान से पहले इन 5 चुनौतियों से कैसे निपटेगा लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन

West Bengal Assembly Elections 2021: वो कांग्रेस थी, जिसने सबसे पहले नंदीग्राम में ममता दीदी के साथ हुए हादसे को पॉलिटिकल स्टंट करार देने की जल्दीबाज़ी कर डाली थी…ये जानते हुए भी कि ऐसा करना बंगाली मानुष के एक बड़े तबके को नाराज़ कर सकता है…मगर परफॉरमेन्स का दबाव जब हद से ज्यादा हो तो […]

Author Updated: March 19, 2021 6:47 PM
क्रिएटिव- नरेन्द्र कुमार

West Bengal Assembly Elections 2021: वो कांग्रेस थी, जिसने सबसे पहले नंदीग्राम में ममता दीदी के साथ हुए हादसे को पॉलिटिकल स्टंट करार देने की जल्दीबाज़ी कर डाली थी…ये जानते हुए भी कि ऐसा करना बंगाली मानुष के एक बड़े तबके को नाराज़ कर सकता है…मगर परफॉरमेन्स का दबाव जब हद से ज्यादा हो तो आम तौरपर ऐसे कदम उठ ही जाते हैं…पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामदलों के गठबंधन के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है…

कंफ्यूजन ही कंफ्यूजन: कांग्रेस और वामदलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कंफ्यूजन। ये कंफ्यूजन कहीं और नहीं बल्कि खुद दोनों दलों के काडर और उनके समर्थकों के भीतर मौजूद है। कंफ्यूजन कि विधानसभा चुनाव में ये गठबंधन असल में बना किसके खिलाफ है…बीजेपी या तृणमूल कांग्रेस? विरोध करना है तो किसका.? राजनीतिक पंडित मानते हैं कि संशय की ये स्थिति मतदाताओं को भी दिग्भ्रमित करेगी। बीजेपी के नेताओं ने तो पहले ही गठबंधन को टीएमसी की ‘बी टीम’ बोलना शुरु कर दिया है…

बिखरता संगठन, सिमटते संसाधन: किसी भी चुनाव में जीत हासिल करने वाली पार्टी के लिए जरूरी है बूथ मैनेजमेंट… इसके लिए जरूरत होती है मोहल्ला और गांव स्तर पर मजबूत संगठन और समर्पित कार्यकर्ताओं की…1977 से सत्ता से बाहर कांग्रेस और 2011 से सरकार से बाहर चल रही लेफ्ट पार्टियां, इस मोर्च पर मुश्किल में घिरती नज़र आ रही हैं…बड़ी संख्या में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता या तो टीएमसी का दामन थाम चुके हैं या फिर बीजेपी का… ऐसे में मतदान वाले दिन पोलिंग बूथ तक अपने वोटरों को लाने का काम कौन करेगा ये एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा फंड का अभाव, कॉरपोरेट से चंदा ना लेने की लेफ्ट की पॉलिसी और बीजेपी-टीएमसी के मुकाबले भारी भरकम प्रचार तंत्र की कमी सरीखी कई चुनौतियां हैं, जिनसे निपटने में गठबंधन को एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना होगा।

घटता वोटबैंक, खिसकता जनाधार: कुछ सालों पहले तक पश्चिम बंगाल का मुस्लिम वोटर परंपरागत रूप से लेफ्ट का और हिंदू वोटर परंपरागत रूप से कांग्रेस का समर्थक माना जाता था…मगर अब स्थिति बदल चुकी है। मुस्लिम वोटबैंक जहां ममता दीदी के पाले में खड़ा है तो वहीं हिंदू वोट बैंक बीजेपी की तरफ जाता नज़र आ रहा है। कांग्रेस और लेफ्ट का घटता वोट शेयर इसकी मिसाल है। 2016 के विधान सभा चुनावों में लेफ्ट दलों को 25 फीसदी और कांग्रेस को करीब 12 फीसदी वोट मिले थे…जबकि 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और लेफ्ट दोनों का वोट शेयर 10 फीसदी से भी नीचे आ गया था….

कौन बनेगा मुख्यमंत्री?: कांग्रेस और लेफ्ट गठबंधन के सामने एक और बड़ी चुनौती ममता बनर्जी को टक्कर दे सकने लायक किसी करिश्माई चेहरे की कमी भी है। ज्योति बसु के बाद लेफ्ट के बाद कोई ऐसा नेता नहीं है, जो सर्वमान्य हो। 77 साल के बुद्धदेव भट्टाचार्य को 2011 में ममता के सामने करारी हार मिल चुकी है और 2019 के लोकसभा चुनावों में तो लेफ्ट खाता भी नहीं खोल पाई थी। उधर कांग्रेस में नेता के नाम पर सिर्फ अधीर रंजन चौधरी ही नजर आते हैं। मगर उनके नेतृत्व को परखा जाना अभी बाकी है।

कहीं ले ना डूबे, करो या मरो का दबाव: कांग्रेस और लेफ्ट दोनों ही के सामने करो या मरो वाली लड़ाई है। 2019 लोकसभा चुनावों में शून्य पर सिमट चुकी लेफ्ट और 43 सालों से राज्य की सत्ता से बेदखल चल रही कांग्रेस को राजनीतिक पंडित जीत का दावेदार कम और वोटकटुआ गठबंधन ज्यादा मान रहे हैं। ऐसे में डर है कि अस्तित्व की इस लड़ाई में कुछ बेहतर कर दिखाने की जल्दीबाज़ी कहीं ऐसे फैसले ना करवा दे, जिससे फायदा मिलने की जगह नुकसान पहुंच जाए।

कुल मिलाकर कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन को अगर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों का मुकाबला बीजेपी बनाम टीएमएसी से बदल कर त्रिकोणीय बनाना है, तो इसके लिए काफी मेहनत करनी होगी।

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