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मंगल व शुक्र ग्रह पर अपने झंडे गाड़ने के लिए तैयार हैं भारत और फ्रांस

मंगल के आगामी मिशन को लेकर भारत और फ्रांस के बीच समझौता हुआ है। गाल के मुताबिक,‘समझौता मंगल के अन्वेषण से जुड़ा है। हम लाल ग्रह को समझने की भारत की महत्वाकांक्षाओं को जानते हैं और मंगल की कक्षा में घूम रहे मंगलयान के काम से बहुत प्रभावित हैं।

Author नई दिल्ली | February 1, 2016 4:32 AM
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मंगलयान के पहले से ही मंगल की कक्षा में मौजूद होने के कारण मंगल पर लैंडर (अंतरिक्षीय पिंड का अध्ययन करने वाला यान) उतारना एक दिलचस्प पहलू हो सकता है। फ्रेंच स्पेस एजेंसी के प्रमुख का कहना है कि फ्रांस इस दिशा में भारत के साथ मिल कर काम करने के लिए तैयार है। एक साक्षात्कार में, फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजंसी के प्रमुख जॉ-इज ला गाल ने उम्मीद जताई है कि भारतीय और फ्रांसीसी झंडे मंगल और शुक्र पर एक साथ फहराए जा सकेंगे।

मंगल के आगामी मिशन को लेकर भारत और फ्रांस के बीच समझौता हुआ है। गाल के मुताबिक,‘समझौता मंगल के अन्वेषण से जुड़ा है। हम लाल ग्रह को समझने की भारत की महत्वाकांक्षाओं को जानते हैं और मंगल की कक्षा में घूम रहे मंगलयान के काम से बहुत प्रभावित हैं। फ्रांस में मंगल और शुक्र दोनों के लिए ही बेहद कुशल वैज्ञानिक हैं।

अब चूंकि भारत में पहले से ही मंगल के अन्वेषण की परियोजना चल रही है, इसलिए हमने इस पर भविष्य में सहयोग करने का एक समझौता लागू कर लिया। क्या फ्रांस और भारत दोनों मिल कर मंगल पर जाएंगे, इस सवाल के बारे में उन्होंने कहा,‘मंगल पर भारत के अगले मिशन में फ्रांसीसी दक्षता का भी इस्तेमाल होगा। हमें इस बात का गर्व है कि जिस भारत के साथ हम लंंबे समय से विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करते आए हैं, उसके साथ अब हम एक नए क्षेत्र यानी अंतरिक्ष के अन्वेषण की भी शुरूआत कर रहे हैं।’ मंगल यान मंगल की कक्षा में मौजूद है। एंजसी प्रमुख का कहना है कि अगला कदम अब मंगल पर लैंडर उतारने का होगा।

उन्होंने उम्मीद जताई कि फ्रांस के पास इसका कौशल है। यह दिलचस्प काम है लिहाजा इसलिए वह लैंडर उतारने को लेकर आशान्वित हैं। मंगल पर पहले भारतीय मिशन की प्रशंसा करते हुए गाल ने इसे मेक इन इंडिया की बेहतीन मिसाल बताते हुए कहा कि मंगलयान की कुल लागत 6 करोड़ डॉलर है, जो हॉलीवुड की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘ग्रेविटी’ की लागत से भी कम है। उन्होंने कहा,‘यह स्पष्ट तौर पर दिखाता है कि अगर आप बेहद होशियारी के साथ काम करें, तो आप बड़े संसाधनों के बिना भी महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशन को अंजाम दे सकते हैं, वह भी बहुत कम लागत में…।’

शुक्र के अध्ययन को लेकर भारत-फ्रांस सहयोग पर उन्होंने कहा कि चूंकि अंतरिक्ष अभियानों की वैश्विक लागत कम हो रही है, ऐसे में शुक्र पर मिशन भेजने पर विचार किया जा सकता है। बीते वर्षों की तुलना में इसकी लागत कहीं कम होगी…तो शुक्र पर क्यों न जाया जाए? यह व्यावहारिक है।’ फ्रांस और भारत के बीत एक नया थर्मल इमेजिंग उपग्रह बनाने के लिए भी समझौता हुआ था। इस मिशन के बारे में गाल ने कहा,‘यह नया उपग्रह मिशन हाल ही में पेरिस में हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के बाद उठाया गया कदम है।

हमने इसे आगे बढ़ाने का फैसला किया है। अंतरिक्ष में पहले ही हमारे पास दो साझा उपग्रह मेघा-ट्रॉपिक्स और सरल-एल्टिका हैं, जिनके जरिए जलवायु का अवलोकन किया जाता है। इन्हें 2011 और 2013 में प्रक्षेपित किया गया था।’ उन्होंने कहा कि अब एक नया उपग्रह विकसित किया जा रहा है, जो विशेष तौर पर जलवायु परिवर्तन के अवलोकन के लिए ही होगा। यह पृथ्वी की सतह का अवलोकन थर्मल इंफ्रारेड की रेंज में करेगा। तरंग की लंबाई की यह विशेष रेंज जलवायु परिवर्तन के निरीक्षण में मदद करेगी। इससे जलवायु परिवर्तन के वनस्पति पर पड़ने वाले असर को समझने में मदद मिलेगी।

पृथ्वी का अवलोकन करने वाले भारत और फ्रांस के तीन संयुक्त उपग्रह जलवायु परिवर्तन से जुड़ी एक बेहतर तस्वीर पेश करने में मदद करेंगे। भारत-फ्रांस सम्मेलन में दूसरे क्षेत्रों से इतर अंतरिक्ष से जुड़े अन्य समझौते भी हुए थे। तीसरे समझौते के बारे में उन्होंने कहा कि भारत के आगामी ओशियनसैट उपग्रह में फ्रांस एक एआरजीओएस नामक पेलोड लगाएगा। इसका काम अंतरिक्ष को एक मंच के तौर पर इस्तेमाल करते हुए प्रकाशस्तंभों को खोजना और बचाना होगा। भारत और फ्रांस की साझेदारी पर गाल ने कहा कि रॉकेटों और उपग्रहों के लिहाज से अंतरिक्ष में सहयोग की दोनों देशों के पास एक बड़ी विरासत है। फ्रांसीसी लॉन्चर भारतीय संचार उपग्रहों को प्रक्षेपित करते हैं और भारतीय रॉकेटों ने फ्रांसीसी उपग्रहों को प्रक्षेपित किया है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आज भारत, यूरोप से बाहर फ्रांस का दूसरा सबसे बड़ा साझेदार बन रहा है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की अन्य वैश्विक अंतरिक्ष एजंसियों से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि वह जब भी इसरो के केंद्रों में जाते हैं, तो बहुत प्रभावित होते हैं,‘सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली बात यह है कि लोग पूरी तरह समर्पित हैं। उनमें वही लगन है जो अंतरिक्ष कार्यक्रम के शुरुआती दिनों में हममें या अमेरिका में हुआ करती थी। भारत में एक किस्म का उत्साह और ताजगी है, जो कि बेहद स्फूर्तिदायक है। यह भविष्य के प्रति आशा पैदा करती है।’

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