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मौजूदा दौर से भी खस्ता हाल थी इकॉनोमी, वाजपेयी के वित्त मंत्री ने इन उपायों से अर्थव्यवस्था को दी थी पंख

वाजपेयी सरकार में जब यशवंत सिन्हा वित्त मंत्री थे तब पिछली सरकार से विरासत में उन्हें 5 फीसदी के करीब जीडीपी ग्रोथ मिली थी। ऊपर से परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर कई तरह वैश्विक प्रतिबंध लागू कर दिए गए थे।

यशवंत सिन्हा वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री थे। (फाइल फोटो सोर्स: द इंडियन एक्सप्रेस)

भारत की मौजूदा अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है। देश का जीडीपी ग्रोथ 5 फीसदी पर आकर टिक गया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर शशिकांत दास इस आंकड़े को उम्मीद से बेहद कम बता रहे हैं। वहीं, सरकार भी आनन-फानन में कॉरपोरेट जगत को टैक्स में राहत दे रही है। हालांकि, स्थिति में सुधार फिलहाल नज़र नहीं आ रहा। लेकिन, अगर इतिहास पर गौर फरमाएं तो इससे भी खराब हालात हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था देख चुकी है। 1991 के छोड़ दें तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को भी आर्थव्यवस्था की चुनौतियों से दो-चार होना पड़ा था। लेकिन, तब तत्कालीन वित्त मंत्री (जो इस वक्त मोदी सरकार के बड़े आलोचक हैं) यशवंत सिन्हा ने उस खस्ता हाल से इकॉनमी को उबारने में अहम भूमिका निभाई थी। ‘द लल्लनटॉप’ को दिए इंटरव्यू में यशवंत सिन्हा ने विस्तार से बताया कि कैसे गुजराल सरकार की विरासत में मिली 5 फीसदी से कम जीडीपी ग्रोथ को वाजपेयी सरकार ने नई ऊंचाई दी थी।

यशवंत सिन्हा ने कहा कि 1998 में जब वह वित्त मंत्री बने तब भी संकट था। उस वक्त पूर्वी एशिया के देश चारो खाने चित्त हो रहे थे। देश की विकास दर 5 फीसदी से नीचे थी और परमाणु परीक्षण करने से वैश्विक स्तर पर कई व्यापारिक प्रतिबंध लगे हुए थे। ऐसी हालत में भी इकॉनमी को न सिर्फ दुरूस्त किया गया बल्कि उसे गति देने का काम किया गया। सिन्हा ने कहा कि आज की हालत यह है कि अर्थव्यवस्था में डिमांड नहीं है। ऐसी ही हालत 1998 के दौरान भी थी। उन्होंने कहा, “अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए ‘डिमांड क्रिएशन’ और उसके बाद उसकी ‘सेक्वेंसिंग’ की जरूरत पड़ती है। (डिमांड के लिए) हम लोगों ने राष्ट्रीय राजमार्ग बनाना शुरू कर दिया। टेलिकॉम, पोर्ट, रेलवे में काम हो रहे थे। क्योंकि, इससे अर्थव्यवस्था का इजाफा हो रहा था।”

सिन्हा ने बताया कि 1999-2004 के दौरान अर्थव्यवस्था का माहौल ऐसा हो गया लोग 25 साल की उम्र में अपना घर खरीदने लगे, जबकि पहले घर खरीदने की औसत उम्र 40 साल हुआ करती थी। युवाओं के खरीद की क्षमता बढ़ने से इन्वेस्टमेंट गुड्स का डिमांड तैयार होने लगा। जो सड़के बन रही थीं, उसमें कई काम इन्वॉल्व हुए। जिसके साथ-साथ इंप्लॉयमेंट का सृजन शुरू हुआ। सिन्हा ने कहा कि जब लोगों की जेब में पैसे आएंगे तो वे गुड्स (सामान) पर खर्च करेंगे। उन्होंने कहा कि इस काम में हमें कामयाबी मिली।

सरकार को सुझाव देते हुए यशवंत सिन्हा ने कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर में काम का पैमाना और व्यापक करना होगा। हाउसिंग सेक्टर में पहल को और धार देनी होगी। बाजार में इन्वेस्टमेंट के संदर्भ में अपनी बात रखते हुए पूर्व वित्त मंत्री ने कहा कि इकॉनमी में एक ट्रांजैक्शन कॉस्ट होता है और इसमें इंटरेस्ट रेट की बड़ी भूमिका होती है। यदि इंटरेस्ट रेट कम होगा तो काम करने की संभावना ज्यादा होती है। लोगों को कार, घर या दूसरा बिजनस करने में सहूलियत मिलती है। इसके अलावा ‘इज ऑफ डूइंग बिजनस’ पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सिन्हा ने इस बात पर भी बल दिया कि चूंकि दुनिया की अर्थव्यवस्था चौपट हो रही है, ऐसे में भारत को बाहर से मदद नहीं मिलने वाली। उसे अपनी घरेलू मांग और रिसोर्सेज पर भी तरक्की करनी होगी।

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