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हरियाणा की भाजपा सरकार में दस में चार बेरोज़गार, निजी कंपनियों में 75% आरक्षण ले आई खट्टर सरकार

ऐसा कानून बनाने वाला हरियाणा पहला राज्य नहीं है। इससे पहले आंध्र प्रदेश ने 2019 में इसी तरह का कानून बनाने की कोशिश की थी, लेकिन संवैधानिक आधार पर चुनौती मिलने के बाद सरकार इसे अमल में नहीं ला पाई।

ml khattarहरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर (फोटो सोर्सः ट्विटर@cmoharyana)

हरियाणा में बोरेजगारी की समस्या विकराल तेवर अख्तियार कर रही है। अप्रैल 2020 के दौरान आलम यह था कि नौकरी की तलाश कर रहे दस में 4 लोगों को काम मिल ही नहीं पाया। सरकार ने अपने लोगों को रोजगार देने का नया रास्ता निकाला है। इसके लिए खट्टर सरकार ने निजी कंपनियों में 75% आरक्षण स्थानीय लोगों को देने का फैसला किया है।

नए घटनाक्रम में निजी क्षेत्र में 75% नौकरियां स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित करने संबंधी अध्यादेश के प्रारूप को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। इसके तहत स्थानीय आबादी की बेरोजगारी की समस्या को प्राथमिकता दी गई है। यह कानून 50 हजार रुपये मासिक वेतन तक की नौकरियों पर ही लागू होगा। अब सभी कंपनियों को तीन महीने के भीतर सरकार को बताना होगा कि उनके यहां 50 हजार तक की तनख्वाह वाले कितने पद हैं और इन पर हरियाणा से कितने लोग काम कर रहे हैं। उन्हें यह जानकारी सरकार के पोर्टल पर देनी होगी। कंपनी को हर तीन महीने में इसकी स्टेटस रिपोर्ट सरकार को देनी होगी।

ध्यान रहे कि बीजेपी ने 2019 के चुनाव में स्थानीय लोगों की बेरोजगारी दूर करने के लिए वादा किया था कि उनकी सरकार उन उद्योगों को विशेष सुविधा प्रदान करेगी तो 95% रोजगार उन्हें देगी। फोर्ब्स मार्शल के को-चेयरमैन नौशाद फोर्ब्स का कहना है कि हरियाणा की बीजेपी सरकार की यह घोषणा पूरी तरह से राजनीतिक है। उनका कहना है कि सरकार का यह कदम उन कोशिशों से बिलकुल विपरीत है जिसके तहत राज्य में निवेश और रोजगार सृजन के लिए काम किया जा रहा है। केंद्र का एक सर्वे कहता है कि निजी कंपनियों 97% स्टाफ 50 हजार से कम तनख्वाह लेने वाला होता है। इससे स्थानीय लोगों को ज्यादा नौकरी के मौके मिलेंगे।

हालांकि, ऐसा कानून बनाने वाला हरियाणा पहला राज्य नहीं है। इससे पहले आंध्र प्रदेश ने 2019 में इसी तरह का कानून बनाने की कोशिश की थी, लेकिन संवैधानिक आधार पर चुनौती मिलने के बाद सरकार इसे अमल में नहीं ला पाई। सेंटर फॉर इंप्लायमेंट स्टडीज के रवि श्रीवास्तव कहते हैं कि संविधान में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। यही वजह है कि ज्यादातर सरकारें इसकी वकालत तो करती हैं पर इस तरह का कदम उठाने से गुरेज करती हैं। उनका कहना है कि यह भारत की लेबर मार्केट के लिए ठीक नहीं होगा। लेबर के काम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह पर जाने से राज्यों के बीच मौजूद वित्तीय व भौगोलिक असमानता काफी हद तक दुरुस्त होती है।

रवि श्रीवास्तव कहते हैं कि 80 के दशक के बाद से सरकारी कंपनियों में नौकरियां वैसे भी कम सृजित हो रही हैं। इसी वजह से आरक्षण का दायरा निजी कंपनियों की तरफ बढ़ रहा है। उनका कहना है कि हालांकि, इसके गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं। इस तरह के राज्यों में सब कुछ नौकरशाही ही तय करती है। हरियाणा में लाइसेंस परमिट राज फिर से अपना सिर उठा सकता है। सरकारी मशीनरी के भी इससे भ्रष्ट होने के चांस बढ़ेंगे, क्योंकि कानून बनेगा तो उसमें सेंध लगाने के रास्ते भी बनेंगे। हरियाणा जैसे औद्योगिक रूप से समृद्ध राज्य का इस तरह का कदम बिहार यूपी के लिए परेशानी का सबब बनेगा। वहां की ज्यादातर लेबर काम की तलाश में हरियाणा जैसे राज्यों का रुख करती है।

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