Former President of Sahitya Akademi says award wapasi was a political move of modi opponents - साह‍ित्‍य अकादमी के पूर्व अध्‍यक्ष ने कहा- मोदी व‍िरोध‍ियों की राजनीत‍िक चाल थी अवॉर्ड वापसी - Jansatta
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साह‍ित्‍य अकादमी के पूर्व अध्‍यक्ष ने कहा- मोदी व‍िरोध‍ियों की राजनीत‍िक चाल थी अवॉर्ड वापसी

साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि वर्ष 2015 में चलाया गया अवार्ड वापसी अभियान बिहार विधानसभा चुनाव के पहले मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए राजनीतिक रूप से प्रेरित आंदोलन था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि वर्ष 2015 में चलाया गया अवार्ड वापसी अभियान अपने आप से नहीं हुआ था, बल्कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए राजनीतिक रूप से प्रेरित आंदोलन था। यही नहीं, बिहार में चुनाव नतीजों के बाद इनलोगों ने जश्न भी मनाया था। बता दें कि तिवारी वर्ष 2013 से 2015 तक साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद पर थे। विश्वनाथ तिवारी ने टाइम्स नाऊ से बात करते हुए कहा कि, “अवार्ड वापसी अभियान पूरी तरह अप्राकृतिक था। लेखक को विरोध करने का अधिकार है। लेकिन इससे पहले ऐसा कभी नहीं देखा गया था कि लेखकों ने अपने अवार्ड वापस किए। इसलिए मैं इसे अप्राकृतिक कदम के रूप में देखता हूं।”

तिवारी ने कहा कि, “अवार्ड वापसी के लिए कोई बड़ा कारण नहीं था। यह अचानक शुरू हुआ था और अचानक बंद हो गया।” प्रसिद्ध कवि ने आगे कहा कि यह पूरी तरह राजनीति से प्रेरित दिखा। इसे पूरी तरह राजनीति से प्रेरित इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि सभी लेखक सरकार के खिलाफ थे। जिन-जिन लेखकों ने अपने अवार्ड वापस किए थे, सभी ने लोकसभा चुनाव से पहले मोदी जी का विरोध किया था। इस अवार्ड वापसी अभियान की शुरूआत कवि अशोक वाजपेयी और मार्क्सवादी लेखकों ने की थी।

 

‘द ट्रूथ ऑफ ऑफ अवार्ड वापसी एंड हिप्पोक्रेसी बिहाइंड इट’ शीर्षक वाले लेख में प्रसिद्ध कवि ने कथित रूप से आरोप लगाया है कि तीन प्रकार के लेखकों ने आंदोलन को प्रेरित किया था। एक, जिसे पीएम मोदी से व्यक्तिगत रूप से नफरत की। दूसरा, जिसका राजनेता मित्र सरकार को बदनाम करना चाहता था और तीसरा जो सिर्फ विवाद से कुछ प्रचार प्राप्त करना चाहता था। बता दें कि वर्ष 2015 में करीब 50 लेखकों ने मोदी सरकार में बढ़ती असहिष्णुता और बोलने की अाजादी पर बढ़ते हमले को लेकर अपने अवार्ड वापस कर दिए थे। गोविंद पनसारे और कलबुर्गी की हत्या के बाद अक्टूबर 2015 में अवार्ड वापसी की शुरूआत हुई थी।

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