बीजेपी सांसद ने कहा- राजीव गांधी के हत्यारे की रिहाई नहीं हो, राष्ट्रपति को लिखूँगा खत

भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि वह एमके स्टालिन के पत्र के विरोध में राष्ट्रपति को पत्र लिखेंगे और कहेंगे कि राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई न हो।

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भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी (एक्सप्रेस फोटो: कमलेश्वर सिंह)

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या को 30 साल गुजर गए हैं। आज उनकी 30वीं पुण्यतिथि थी। इसी बीच तमिलनाडु के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री ने हत्या के दोषियों की रिहाई के लिए सिफारिश की है। इसपर भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘मैं राष्ट्रपति को ख़त लिखूंगा।’

स्वामी ने एक ट्वीट में कहा, ‘मैं एमके स्टालिन के ख़त के विरोध में राष्ट्रपति को पत्र लिखूंगा। LTTE के लोगों ने राजीव गांधी की हत्या की साजिश रची थी और इस आत्मघाती हमले में 18 पुलिसवालों की भी मौत हो गई थी।’

एमके स्टालिन ने अपने पत्र में कहा था कि दोषी पिछले 30 साल से सजा काट रहे हैं इसलिए तमिलनाडु की जनता की इच्छा है कि उन्हें रिहा कर दिया जाए। यह पत्र 19 मई को ही लिखा गया था। पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या मामले में सात दोषी हैं जिसमें वी शिरीहरन, उनकी पत्नी निलिनि, जयकुमार, संतन, एजी पेरारिवलन, रॉबर्ट पायस और पी रविचंद्रन शामिल हैं। इससे पहले तमिलनाडु सरकार ने राज्यपाल के पास भी माफी की सिफारिश भेजी थी। राज्यपाल ने कहा था कि इस संबंध में राष्ट्रपति ही कोई फैसला से सकते हैं।

क्या है इतिहास?
21 मई 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी। श्रीलंका में शांति सेना भेजने से तमिल विद्रोही संगठन लिट्टे ख़फा था। जब राजीव गांधी लोकसभा चुनाव प्रचार के लिए चेन्नै के श्रीपेरम्बदूर पहुंचे थे तभी फूलों के हार पहनाने के बहाने महिला ने आत्मघाती हमला कर दिया। बम फटा तो राजीव गांधी समेत कई लोगों के चीथड़े उड़ गए। घटनास्थल पर 18 लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए।

राजीव गांधी अपने भाई संजय गांधी की मौत के बाद राजनीति में आए थे। इससे पहले वह एक पायलट थे। 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्हें कांग्रेस की बागडोर संभालनी पड़ी थी। उस वक्त वह 40 साल के थे। 1991 में चंद्रशेखर सरकार गिरने के बाद चुनाव हुए थे औऱ इन्हीं चुनावों के प्रचार के लिए वह तमिलनाडु पहुंचे थे जहां उनकी हत्या कर दी गई।

ट्रायल कोर्ट ने 26 दोषियों को सजा-ए-मौत सुनाई थी। बाद में 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने 19 लोगों को बरी कर दिया। बाकी सात में से तीन दोषियों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया । आरोपियों ने 2011 में राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजी थी लेकिन इसे ठुकरा दिया गया। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन अन्य दोषियों की सजा को भी उम्रकैद में बदल दिया।

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