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सोनभद्र जाने की जिद पर अड़ीं प्रियंका वाड्रा, बेलछी नरसंहार के बाद इंदिरा गांधी भी हाथी पर सवार हो पहुंची थीं

गांव में जाने के लिए तब नदी पार करके जाना था, पर उस दौरान न तो नाव थी और न ही कोई और साधन। ऊपर से शाम भी ढल रही थी। सामने पानी से भरा कच्चे रास्ता था, जिस पर हिम्मत जुटाते हुए इंदिरा पैदल ही चल पड़ीं थी। आनन-फानन में जीप मंगाई गई। वह भी कीचड़ और पानी में फंस गई।

Author नई दिल्ली | July 19, 2019 9:37 PM
1977 में इंदिरा इसी मोती नाम के हाथी पर सवार होकर बेलछी पहुंची थीं।

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा शुक्रवार (19 जुलाई, 2019) को उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिला जाने की जिद पर अड़ गईं। हालांकि, उन्हें वहां पहुंचने से पहले ही नारायणपुर इलाके में हिरासत में लिया गया। प्रियंका ने इस पर मीडिया से कहा, “हम पीछे नहीं हटेंगे। हम शांतिपूर्ण तरीके से केवल पीड़ित परिवारों (सोनभद्र फायरिंग केस के) से मिलने जा रहे थे। मुझे नहीं पता, ये लोग मुझे कहां ले जा रहे हैं, हम कभी भी जाने को राजी हैं।” बता दें कि 17 जुलाई को जमीन विवाद को लेकर सोनभद्र में फायरिंग हुई थी, जिसमें 10 लोगों की जान चली गई थी। प्रियंका उसी के पीड़ितों का हाल जानने जाना चाह रही थीं।

हालांकि, प्रियंका ने आज जिस स्थिति का सामना किया, इससे भी विकट हालात 1977 में उनकी दादी इंदिरा गांधी के सामने आए थे। दरअसल, किस्सा बिहार में बेलछी नरसंहार से जुड़ा है। कांड के बाद इंदिरा कई मुश्किलों का सामना करते हुए हाथी पर सवार होकर पीड़ितों का हाल जानने गांव पहुंची थीं। उनकी बहू यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की जीवनी ‘द रेड साड़ी’ लिखने वाले जेवियर मोरो ने किताब में इसी किस्से का जिक्र किया है।

बेलछी में तब 11 दलितों को कुर्मी समाज के लोगों ने आग के हवाले कर दिया था। इंदिरा उसी घटना से बेहद आहत थीं और वह बेलछी जाना चाहती थीं। शुरुआत में उन्हें रोका गया। खुद सोनिया ने कहा था, “बिहार मत जाइए, वह बहुत खतरनाक जगह है।” यही नहीं, पार्टी नेताओं ने भी उन्हें लाख समझाया, फिर भी वह जिद पर अड़ी रहीं।

गांव में जाने के लिए तब नदी पार करके जाना था, पर उस दौरान न तो नाव थी और न ही कोई और साधन। ऊपर से शाम भी ढल रही थी। सामने पानी से भरा कच्चे रास्ता था, जिस पर हिम्मत जुटाते हुए इंदिरा पैदल ही चल पड़ीं थी। आनन-फानन में जीप मंगाई गई। वह भी कीचड़ और पानी में फंस गई। आगे ट्रैक्टर का सहारा लिया गया, वह भी साथ न दे पाया। ऐसे में हाथी (नाम- मोती) बुलाया गया, जिस पर बैठकर साढ़े 3 घंटे का सफर तय करने के बाद इंदिरा बेलछी पहुंची थीं। वाकये के अगले दिन हाथी पर बैठीं इंदिरा के फोटो ने देश-विदेश के मीडिया में खूब सुर्खियां बंटोरी थीं।

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