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‘चिंता मत करें, कुछ नहीं होगा, सिर्फ आप पर बम फेंका जाएगा, पेट पर गोली चलेगी’, ऐसे दिलासा देते थे टीएन शेषन

टीएन शेषन के साथ काम कर चुके पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी बताते हैं कि 1996 के बिहार चुनाव के दौरान शेषन ने कैसे बिना डरे ड्यूटी पूरी करने को कहा था।

भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन। (फाइट फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

90 के दशक की शुरुआत में टीएन शेषन राजनीतिक दल और राजनेताओं के लिए किसी खौफ से कम नहीं थे। लेकिन, साथ ही साथ उनके इसी व्यवहार ने उन्हें देश का सबसे लोकप्रिय चुनाव आयुक्त बना दिया। जब भी चुनाव में कहीं धांधली या लापरवाही का जिक्र आता है, आज भी जनता पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन की कार्यशैली को याद करती है। देश के अन्य चुनाव आयुक्तों ने भी माना है कि शेषन ने ऐसा माइलस्टोन पेश किया है, जिसका बोझ उनकी कंधों पर हमेशा बना रहेगा। यह बात ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे एक आर्टिकल में खुद पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कही है।

कुरैशी ने अपने लेख में टीएन शेषन को एक धाकड़ चुनाव आयुक्त के रूप में याद किया है, जिससे नेता खौफ खाते थे और जनता प्यार करती थी। अपने लेख के जरिए उन्होंने कुछ चुनिंदा घटनाओं का जिक्र भी किया है, जिससे पता चलता है कि वह ड्यूटी को लेकर कितने समर्पित थे और दिलेर भी। साथ ही साथ वह अपने साथ काम करने वाली टीम की सहूलियत का भी विशेष ख्याल रखते थे।

टीएन शेषन के अंडर में बतौर पर्यवेक्षक काम कर चुके एसवाई कुरैशी बताते हैं कि जब वह बिहार में चुनाव संपन्न कराने जा रहे थे तो शेषन ने कैसे अपने अंदाज में उन्हें दिलासा दिया था। एसवाई कुरैशी अपने लेख में लिखते हैं, “मुझे बिहार का 1996 में हुआ चुनाव याद आता है, जब मैं बतौर पर्यवेक्षक वहां तैनात था। तब श्रीमान शेषन ने इन शब्दों के साथ हमारी ब्रिफिंग खत्म की थी: “चिंता मत करें। कुछ नहीं होगा- सिर्फ आपके चेहरे पर बम फेंका जाएगा और पेट पर गोली चलेगी!”

कुरैशी आगे बताते हैं कि उस दौरान कुछ ही दूरी पर उन्होंने दो बम फटते हुए देखा था। वह माजाकिया अंदाज में लिखते हैं कि उस तब वह भाग्यशाली रहे और अपना पेट बिना पंक्चर कराए लौट आए थे।

एसवाई कुरैशी ने टीम को सहूलियत देने वाली टीएन शेषन की एक भावना का जिक्र करते हुआ बताया है, “एक दफे मुझे झारखंड के माओवादी इलाके में पर्यवेक्षक बनाया गया। मैं हाल ही में स्लिप डिस्क की समस्या से उबरा था और आदिवासी इलाकों की खराब सड़कों पर यात्रा नहीं कर सकता था। उन्होंने ब्रिफिंग के वक्त मुझसे पूछा। मैंने साहस करके अपने मेडिकल कंडिशन का हवाला दिया और उनसे किसी शहरी इलाके में पोस्टिंग करने की गुजारिश की। उन्होंने बड़े ही मधुरता के साथ मुझे इन सबसे बाहर कर दिया।”

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