Former BR Gavai Rajasthan CJ: देश के CJI यानी मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने शनिवार को कहा कि न्यायपालिका में अनुशासन सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जजों के खिलाफ मिलने वाली गंभीर शिकायतों की पूरी जांच होनी चाहिए और जो भी तथ्य सामने आएं, उनके आधार पर तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए।

पूर्व CJI गवई जयपुर स्थित राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित ‘यशराज सामंत मेमोरियल वार्षिक मध्यस्थता व्याख्यान’ देने के बाद मीडिया और उपस्थित लोगों से बात कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता और राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा के बीच चल रहे विवाद पर अपनी राय रखी।

खबर पढ़कर लगा था झटका

पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा कि जब उन्होंने पहली बार अखबारों में इस विवाद के बारे में पढ़ा, तो वे काफी हैरान रह गए थे। हालांकि, उन्होंने मामले की बारीकियों या योग्यता पर सीधा कमेंट करने से इनकार कर दिया क्योंकि यह न्यायपालिका के अंदरूनी कामकाज से जुड़ा विषय है।

जस्टिस गवई ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता उनके अच्छे दोस्त हैं और उन्होंने उनके साथ एक जूनियर जज के तौर पर भी काम किया है। उन्होंने पर्यावरण और ‘ओरण’ (पवित्र उपवन) से जुड़े कई अहम मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

“जब मां पर बात आए तो चुप कैसे रहूं”

जस्टिस गवई ने उस बातचीत का जिक्र किया जो इस विवाद के बाद उनकी जस्टिस मेहता से हुई थी। उन्होंने बताया, “मुझे जब पता चला कि जस्टिस मेहता ने ऐसा पत्र लिखा है तो मुझे बड़ा झटका लगा। जब मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा कदम क्यों उठाया, तो जस्टिस मेहता ने कहा – राजस्थान हाई कोर्ट मेरे लिए मां की तरह है। अगर मेरी मां के साथ गलत व्यवहार होगा तो मैं चुप कैसे रह सकता हूं? अब मेरे सब्र का बांध टूट चुका था।”

पूर्व CJI ने आगे कहा कि इस बातचीत के बाद उन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट के अपने कुछ अन्य साथी जजों से भी बात की ताकि जमीनी हकीकत को समझा जा सके।

बातचीत के बाद बदली पूर्व CJI की सोच

राजस्थान हाई कोर्ट के अन्य जजों से हुई बातचीत का जिक्र करते हुए जस्टिस गवई ने कहा कि उन चर्चाओं ने उनकी शुरुआती धारणा को पूरी तरह बदल दिया। पहले उन्हें लगा था कि जस्टिस मेहता ने शायद जल्दबाजी या अनुचित व्यवहार किया है, लेकिन अंदर की बातें सुनकर वे स्तब्ध रह गए।

उन्होंने कहा, “राजस्थान हाई कोर्ट के मौजूदा हालातों के बारे में मुझे जो कुछ सुनने को मिला, वह वास्तव में काफी चौंकाने वाला और चिंताजनक था।”

पुराने वाकये का दिया हवाला

अपनी बात को मजबूत करने के लिए पूर्व CJI गवई ने सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान की एक घटना को याद किया। उन्होंने बताया कि जब जस्टिस संजीव खन्ना देश के मुख्य न्यायाधीश थे, तब एक हाई कोर्ट जज के खिलाफ कॉलेजियम के पास गंभीर शिकायत आई थी।

जस्टिस खन्ना ने बिना कोई देरी किए उसी दिन कॉलेजियम की बैठक बुलाई। उस बैठक में सभी आरोपों और तथ्यों की गहन जांच की गई और तथ्य सही पाए जाने पर संबंधित जज का तुरंत तबादला कर दिया गया।

हर शिकायत का एक जैसा नियम संभव नहीं

जस्टिस गवई ने जोर देकर कहा कि ऐसी शिकायतों से निपटने के लिए कोई एक तय या एक समान नीति लागू नहीं की जा सकती। हर मामले के तथ्य और परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए फैसला भी उसी हिसाब से लिया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी माना कि आमतौर पर न्यायपालिका के ऐसे अंदरूनी मामलों को गोपनीय ही रखा जाना चाहिए। लेकिन, जब अनियमितताएं बहुत ज्यादा बढ़ जाएं या व्यापक रूप ले लें, तो फिर किसी के पास क्या रास्ता बचता है?

तीन चिट्ठियों से शुरू हुआ था पूरा विवाद

यह पूरा विवाद तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को तीन अलग-अलग पत्र (2 अगस्त, 10 अगस्त और 17 अगस्त को) लिखे। इन पत्रों में उन्होंने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।

सूत्रों के मुताबिक, जस्टिस मेहता ने अपने पत्रों में राजस्थान हाई कोर्ट के प्रशासनिक कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि एक्टिंग चीफ जस्टिस अपने पद और अधिकारों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं।

तबादले की धमकी और पद के दुरुपयोग का आरोप

जस्टिस मेहता ने अपने पत्र में यह संगीन आरोप भी लगाया था कि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अन्य जजों को तबादला करवाने की धमकी देते हैं और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के साथ अपनी नजदीकी का रौब दिखाते हैं। इसके साथ ही, जस्टिस मेहता ने राजस्थान हाई कोर्ट में स्थायी मुख्य न्यायाधीश की जल्द से जल्द नियुक्ति की मांग की थी। उनका तर्क था कि इस पद के खाली रहने और देरी होने से संस्थान की छवि को भारी नुकसान पहुंच रहा है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने खारिज किए आरोप

दूसरी ओर, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने इन आरोपों को पूरी तरह से झूठा, बेबुनियाद और व्यक्तिगत रंजिश से प्रेरित बताया है। जस्टिस शर्मा ने इस संबंध में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को अपना एक लिखित जवाब भी सौंपा है।

उन्होंने अपने जवाब के समर्थन में तथ्य और अन्य जरूरी दस्तावेज भी प्रस्तुत किए हैं, जिसके बाद से यह पूरा मामला कानूनी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

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