पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने पंजाब में हिंदू-सिख भाईचारे को कायम रखने के लिए काम किया। पंजाब के पूर्व मुख्य सचिव और प्रकाश सिंह बादल के प्रधान सचिव रहे रमेश इंदर सिंह के मुताबिक, प्रकाश सिंह बादल आम लोगों के नेता थे और उन्होंने जीवन में किसी के भी प्रति यहां तक कि अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ भी दुश्मनी का भाव नहीं रखा।
बादल ने आतंकवाद का दंश झेल चुके पंजाब में सद्भाव और शांति को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। प्रकाश सिंह बादल का राजनीतिक सफर भारत के आजाद होने के साथ ही शुरू हो गया था। 1947 में सिर्फ 20 साल की उम्र में वह सरपंच चुने गए थे।
मोदी ने कहा था भारत का ‘नेल्सन मंडेला’
बादल ने पाकिस्तान के साथ भारत के युद्धों को देखा, आपातकाल को देखा और पंजाब में आतंकवाद के दौर के दर्द को भी झेला। आंदोलनों में शामिल होने की वजह से उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। आपातकाल के दौरान वह जेल में बंद रहे और तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भारत का ‘नेल्सन मंडेला’ कहा था।
हिंदू-सिख एकता में प्रकाश सिंह बादल का मजबूत विश्वास था। वह कहते थे- “हिंदू-सिख दा नौ-मांस दा रिश्ता है।” इसका मतलब यह कि हिंदू और सिखों का रिश्ता नाखून और मांस जैसा है।
रमेश इंदर सिंह बताते हैं कि प्रकाश सिंह बादल कभी भी अपनी राय किसी पर नहीं थोपते थे। वह हंसी-मजाक करने वाले नेता थे और तनाव भरे माहौल को भी हल्का-फुल्का कर देते थे। बादल विनम्र नेता थे और जूनियर या सीनियर ओहदे की परवाह किए बिना अफसरों को ‘सरदार साहब’, ‘काका जी’, ‘बीबी’ या ‘बीबाजी’ कहकर ही पुकारते थे। वह जनता की राय के प्रति बेहद संवेदनशील थे।
सुबह पांच बजे फोन कर देते थे बादल
रमेश इंदर सिंह बताते हैं कि कभी-कभी प्रकाश सिंह बादल सुबह पांच बजे ही फोन कर देते थे। अखबारों में कोई संवेदनशील खबर पढ़ने के बाद वह उस बारे में जवाब मांगते थे और उसे सुधारने का निर्देश देते थे।
रमेश इंदर सिंह के मुताबिक, प्रकाश सिंह बादल आधी रात को चंडीगढ़ से निकलते थे और 200 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय करके सुबह-सुबह फरीदकोट जिले के किसी दूर दराज इलाके में पहुंच जाते थे। तब वह शनिवार और रविवार को 10 से 12 गांवों का दौरा करते थे, लोगों से मिलते थे और उनकी परेशानियों को सुनते थे।
प्रकाश सिंह बादल अपने ‘संगत दर्शन’ कार्यक्रम के तहत आम लोगों के बीच जाकर उनसे मिलते-जुलते थे। खेती के प्रति उनका जुनून था और उन्होंने अपने फैसलों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर को बदल दिया था।
मोरारजी देसाई की सरकार में रहे मंत्री
प्रकाश सिंह बादल 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार में मंत्री बने थे। 1997 में उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन किया और यह गठबंधन लगभग ढाई दशक तक चला। इस गठबंधन को लेकर कहा जाता था कि यह पंजाब में सांप्रदायिक शांति की गारंटी है। 2021 में कृषि कानूनों को लेकर यह गठबंधन टूट गया था।
‘पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत’ का नारा दिया
प्रकाश सिंह बादल ने शिरोमणि अकाली दल को पंथक पार्टी से बदलकर पंजाबियों की पार्टी भी बनाया। 1996 में मोगा में पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में उन्होंने ‘पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत’ का नारा दिया। इसके बाद से शिरोमणि अकाली दल (बादल) ने कई हिंदू नेताओं को चुनाव मैदान में उतारा। जब 2007 और 2012 में लगातार दो विधानसभा चुनाव में बीजेपी और अकाली दल की सरकार बनी तो इस जीत का श्रेय प्रकाश सिंह बादल को ही दिया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तो प्रकाश सिंह बादल के बहुत अच्छे संबंध थे ही, पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल के साथ उनका पग-वट (पगड़ी बदली) का रिश्ता था और अंतिम समय तक वह चौटाला परिवार के बेहद करीबी दोस्तों में शामिल रहे।
रिश्तेदार ने फाड़ दिया था सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र
1947 में सरपंच के रूप में राजनीतिक करियर शुरू करने से पहले प्रकाश सिंह बादल सरकारी नौकरी करना चाहते थे और उन्हें तहसीलदार की नौकरी भी मिल गई थी लेकिन उनके एक रिश्तेदार ने जो मंत्री भी थे, उनका नियुक्ति पत्र फाड़ दिया था और उनसे कहा था कि उन्हें एक ऐसा शख्स बनना चाहिए जो दूसरों को नौकरियां देता हो।
अंतिम चुनाव में हार गए थे प्रकाश बादल
प्रकाश सिंह बादल सिर्फ 25 साल की उम्र में देश में सबसे कम उम्र के विधायक बने और फिर 43 साल की उम्र में वह सबसे युवा मुख्यमंत्री चुने गए थे। 2022 में उन्होंने एक और रिकॉर्ड बनाया जब उन्होंने 94 साल की उम्र में विधानसभा चुनाव लड़ा और ऐसा करने वाले वह सबसे बुजुर्ग नेता बने हालांकि अपने जीवन के अंतिम चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन इस हार को भी उन्होंने विनम्रता से हाथ जोड़कर ही स्वीकार किया।
प्रकाश सिंह बादल बेहद विनम्र थे, लोगों से जुड़े रहते थे और इसी वजह से वह पांच बार मुख्यमंत्री बने। उन्हें लोगों के बीच रहना पसंद था और यही उनके राजनीतिक जीवन की सफलता की सबसे बड़ी वजह भी थी।
होटल या गेस्ट हाउस में नहीं रुकते थे बादल
दूसरे नेताओं से उलट राज्य का दौरा करते वक्त होटल या गेस्ट हाउस में नहीं रुकते थे बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही रुकना पसंद करते थे। उन्हें अपने संगत दर्शन पर गर्व था और वह कहते थे कि वह सरकार को लोगों के दरवाजे तक ले गए। बारिश हो या धूप, प्रकाश सिंह बादल उठने के बाद लोगों से मिलने निकल जाते थे।
पंजाब की सरकार में काम कर चुके कई डिप्टी कमिश्नर बताते हैं कि प्रकाश सिंह बादल सुबह-सुबह ही उन्हें फोन कर अखबारों में छपने वाली छोटी-बड़ी समस्याओं के बारे में फोन कर दिया करते थे।
प्रकाश सिंह बादल के बेटे और मौजूदा वक्त में शिरोमणि अकाली दल की कमान संभाल रहे सुखबीर सिंह बादल कहते हैं कि उनके पिता को राजनीति में महारत हासिल थी। जब किसानों की आय घटनी शुरू हुई तो उनके पिता ने किसानों के लिए मुफ्त बिजली और पानी का इंतजाम किया। इसके साथ ही दलित समुदाय के लिए मुफ्त आटा-दाल और लड़कियों के लिए शगुन जैसी योजनाएं भी उन्होंने शुरू की।
कुशल राजनेता थे प्रकाश सिंह बादल
प्रकाश सिंह बादल कुशल राजनेता थे। ऐसे नेता जो उनके लिए चुनौती बन सकते थे, उन्होंने उन्हें राजनीति में किनारे लगा दिया था। ऐसे नेताओं में गुरु चरण सिंह टोहड़ा, बलदेव सिंह और अमरिंदर सिंह के नाम शामिल हैं। इसी तरह उन्होंने सुखबीर बादल को पंजाब की राजनीति में आगे बढ़ाया और अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित किया।
पारिवारिक पार्टी बन गई अकाली दल (बादल)
शिरोमणि अकाली दल (बादल) जो पंजाब में कार्यकर्ताओं पर आधारित पार्टी थी, धीरे-धीरे पारिवारिक पार्टी बन गई। एक वक्त में बादल परिवार के कई सदस्य पंजाब और केंद्र की सरकार में शामिल थे। इनमें मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल, दामाद आदेश प्रताप सिंह कैरों, सुखबीर बादल के साले बिक्रम सिंह मजीठिया पंजाब सरकार में मंत्री थे जबकि सुखबीर की पत्नी हरसिमरत कौर बादल केंद्र सरकार में मंत्री थीं।
प्रकाश सिंह बादल को जीवित रहते हुए ही अकाली दल के बेहद खराब दिन भी देखने पड़े। पार्टी को 2017 के विधानसभा चुनाव में हार मिली और 2022 के विधानसभा चुनाव में तो वह सिर्फ तीन सीट ही जीत सकी।
बादल के मुख्यमंत्री रहते हुए ही ऐसी घटनाएं भी हुई जिससे उन्हें बेहद दुख पहुंचा। 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाएं हुई, इसके बाद पंजाब में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और पुलिस की फायरिंग में दो लोगों की मौत भी हुई। बेअदबी और फायरिंग के लिए विपक्षी दलों ने उनकी आलोचना की।
2021 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय से क्लीन चिट मिलने के दो साल बाद मार्च, 2023 में उन्हें कोटकापुरा फायरिंग मामले में आरोपी बनाया गया था।
मेरा जीवन खुली किताब की तरह…
इसके बाद प्रकाश सिंह बादल ने पंजाबियों के नाम खुला खत लिखा था और 2015 में हुई बेअदबी की घटनाओं के पीछे साजिश होने की बात कही थी और इनकी जांच की मांग की थी। देश के लोगों के नाम अपने आखिरी संबोधन में बादल ने कहा था, “मैंने हर किसी के साथ न्याय करने की कोशिश की, हर धर्म और आस्था के व्यक्ति का सम्मान किया और राज्य में शांति तथा सांप्रदायिक सद्भाव को सुनिश्चित किया… मेरा जीवन एक खुली किताब की तरह है। मैं पंथ या पंजाब के खिलाफ साजिश करने के बारे में कभी सोच भी नहीं सकता।”
प्रकाश सिंह बादल बेहद सादगी भरा जीवन जीते थे और बिल्कुल भी दिखावा करने वाले नेता नहीं थे। वह लगभग 19 साल तक पंजाब के मुख्यमंत्री रहे लेकिन कभी उन्होंने अपने हाथ में घड़ी नहीं पहनी और पैन जेब में नहीं रखा। बावजूद इसके भी वह किसी कार्यक्रम में लेट नहीं होते थे और जिससे भी मिलना होता था या कार्यक्रम में जाना होता था, समय के पाबंद रहते थे।
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जून, 1984 में भारतीय सेना ने खालिस्तान समर्थक जरनैल सिंह भिंडरांवाला और उसके समर्थकों को स्वर्ण मंदिर या गोल्डन टेंपल से बाहर निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया था। इसके दो साल बाद ही आखिर ऐसा क्या हुआ था कि नेशनल सिक्योरिटी ग्रुप (एनएसजी) और पंजाब पुलिस को ऑपरेशन ब्लैक थंडर करना पड़ा। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।
