पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की नई किताब ‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड’ (The Curious and the Classified) आ गई है। इसके लॉन्च से पहले जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने अपनी अप्रकाशित आत्मकथा पर हुए विवाद को पूरी तरह से पीछे छोड़ दिया है। जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कहा कि विवाद से मैं आगे बढ़ गया हूं। उन्होंने कहा कि मेरा टारगेट अब साल में एक किताब लिखना है और किताबें अलग-अलग तरह (फिक्शन और नॉन-फिक्शन) की होंगी।

हालांकि रिटायर्ड आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने इस बारे में विस्तार से नहीं बताया कि उनकी अप्रकाशित किताब, ‘द फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ की कॉपी असल में छपी थीं या नहीं। लेकिन वह इस बात से सहमत थे कि उनके जैसे रिटायर्ड मिलिट्री के लोगों के लिए मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस को क्लीयरेंस के लिए ड्राफ्ट जमा करने के लिए नियम और गाइडलाइन नहीं था।

ड्राफ्ट को पब्लिकेशन से पहले वेरिफाई करना गलत नहीं- जनरल नरवणे

जनरल नरवणे ने कहा, “अगर ड्राफ्ट को पब्लिकेशन से पहले वेरिफाई किया जाता है तो इसमें कोई नुकसान नहीं है। रिटायर्ड मिलिट्री लेखकों के लिए नियम बनाए जा सकते हैं और आखिर नियम तो बदलते रहते हैं, है ना? मेरी आत्मकथा का ड्राफ्ट वेरिफाई के लिए देर से दिया गया था या नहीं, इस बारे में सवाल पब्लिशर पेंगुइन रैंडम हाउस से पूछे जाने चाहिए।”

‘पूरे विवाद में सरकार ने साथ दिया था’

जनरल नरवणे ने साफ कहा कि पूरे विवाद में सरकार ने उनका साथ दिया था। उन्होंने कहा, “न तो मेरा और न ही मेरे पब्लिशर का पार्लियामेंट में हुई शरारतों से कोई लेना-देना था। तो मुझे परेशान क्यों होना चाहिए था? मैं तब परेशान था और अब मैं खुशी-खुशी रिटायर्ड ज़िंदगी जी रहा हूं और और किताबें लिखूंगा। मैंने पुरानी बातों पर ध्यान न देने का फैसला किया है। मुझे अपनी यादें लिखने में मज़ा आया और मुझे इससे खुशी मिली। बस इतना ही।”

‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड’ किताब में कैप्टन बाबा हरभजन सिंह की कहानी, वायुसेना के जवानों के कॉल साइन और पेड़ोंगी नाम के बहादुर सैन्य खच्चर की अनसुनी कहानियां बताई गई हैं।

जनरल नरवणे ने कहा कि उनका मौजूदा टाइटल उन सभी सैनिकों, नाविकों और एयर वॉरियर्स को समर्पित है। उन्होंने कहा, “मेरी मौजूदा किताब में तीनों सेनाओं के किस्से हैं। चाहे सच हों या झूठ, वे कैसे लोककथाओं का हिस्सा बन गए हैं। हर कहानी किसी असल ज़िंदगी की घटना या मिलिट्री हिस्ट्री से जुड़ी है।”

‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड’ की अपनी प्रस्तावना में जनरल नरवणे ने लिखा कि सभी कहानियों की शुरुआत असल ज़िंदगी की घटनाओं से होती है। उन्होंने लिखा, “हर कहानी का मकसद जरूरी घटनाओं या किरदारों को ज़िंदा करना है, आर्म्ड फ़ोर्सेज और आम लोगों के बीच की दूरी को कम करना है, साथ ही हमारी दुनिया (आर्म्ड फ़ोर्सेज़ की) की एक झलक दिखाना है।”

शशि थरूर की किताब से प्रेरित होकर लिखी किताब

जनरल नरवणे ने लिखा है कि शशि थरूर की किताब, ‘ए वंडरलैंड ऑफ़ वर्ड्स’ को पढ़ने के बाद उन्हें इंडियन आर्मी के बारे में ऐसी ही एक किताब लिखने के लिए प्रेरित किया। इस कलेक्शन में जनरल नरवणे ने दो दर्जन कहानियां लिखी हैं। उन्होंने कहा, “कहानियों की जड़ें सिर्फ़ आम इतिहास में नहीं, बल्कि खास तौर पर मिलिट्री के अतीत, संस्कृति और परंपरा में होनी चाहिए, जो बहुत पहले लड़ी गई लड़ाइयों की याद दिलाती हों, जिनकी विरासत आज तक बनी हुई है।”

साथ ही मिलिट्री सैल्यूट (और यह आर्मी, नेवी और एयर फ़ोर्स में कैसे अलग है) से लेकर मिसिंग मैन फ़्लाईपास्ट के ऐतिहासिक महत्व तक, जैसे सिंबल के बारे में बड़े पैमाने पर बताया गया है। इसके अलावा अलग-अलग चैप्टर में बताया गया है कि ‘चक दे फट्टे’ (जिसका मतलब है तख्ते उठाओ) कहावत की शुरुआत कैसे हुई और यह सिख गुरिल्ला युद्ध से कैसे जुड़ा। ‘ओ कैप्टन! माई कैप्टन’ नाम का एक और चैप्टर है जिसमें एक कैप्टन के अपने डूबते जहाज़ के साथ डूबने की परंपरा के बारे में बताया गया है, जिसमें नरवणे याद करते हैं कि कैसे 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान INS खुकरी के कैप्टन ने जहाज़ पर टॉरपीडो लगने के बाद अपनी जान दे दी थी।

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