अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष को लेकर भारतीय वायुसेना के पूर्व वायुसेना प्रमुख बी.एस. धनोआ ने कहा कि ऐसे युद्धों में हवाई हमले आमतौर पर शुरुआत होते हैं, लेकिन केवल हवाई ताकत से बड़ी जीत हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए जमीन पर ग्राउंड ऑपरेशन भी जरूरी होती है।

इंटरव्यू के दौरान पूर्व वायु सेना प्रमुख ने कहा कि ईरान इस समय जो कर रहा है। उसका असली सैन्य असर बहुत कम है। यह ज़्यादातर सिर्फ प्रचार (प्रोपेगेंडा) के लिए है। क्योंकि सैन्य नजरिए से उसे कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल नहीं हो रही है। पढ़ें बातचीत के मुख्य अंश।

उन्होंने एक उदाहरण देकर समझाया कि अंग्रेजी में एक कहावत है- “एक बार की सफलता से बड़ी जीत साबित नहीं होती (‘One Swallow Does Not Make A Summer’)।” अगर हजारों उड़ानों में सिर्फ एक बार ही हमला सफल होता है और विमान भी नष्ट नहीं होता, तो यह बहुत कम नुकसान दर दिखाता है।

अमेरिका और इजरायल ने लगभग 5,700 से 7,600 उड़ानें भरीं और उनमें सिर्फ एक बार ही हमला सफल हुआ। अगर औसतन 6,000 उड़ानें मानें, तो नुकसान दर सिर्फ 0.0166% है, जो बेहद कम है। इसके मुकाबले 1971 के भारत-पाक युद्ध में भारत की नुकसान दर लगभग 0.85% थी, यानी हर 100 उड़ानों में लगभग 1 विमान का नुकसान होता था।

धनोआ के अनुसार, ईरान अगर एक भी स्टेल्थ विमान को निशाना बनाने का दावा करता है तो वह सिर्फ दिखावे और प्रचार के लिए है। इससे असली युद्ध में कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि ईरान फिलहाल सिर्फ “परेशानी पैदा करने” की क्षमता दिखा रहा है, लेकिन वह कोई बड़ी सैन्य उपलब्धि हासिल नहीं कर पा रहा है।

ईरान पर इतने लंबे समय से प्रतिबंध लगे होने के बावजूद, आपको क्या लगता है कि यह स्थिति कब तक बनी रह सकती है?

ईरान जैसे सख्त शासन वाले देश में सरकार अपनी जरूरत के हिसाब से काफी संसाधन रक्षा में लगा सकती है, भले ही देश की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी न हो। ईरान कई सालों से इस तरह की स्थिति के लिए तैयारी कर रहा है। उसने देखा है कि अमेरिका ने यूगोस्लाविया और इराक जैसे देशों में क्या किया। इराक ने अमेरिका से सीधे पारंपरिक युद्ध लड़ने की कोशिश की थी, लेकिन उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा। इससे सबक लेते हुए ईरान ने अपनी रणनीति बदली और लंबे समय से मजबूत तैयारी की है। देश का 40% से ज्यादा हिस्सा पहाड़ी है, जहां वे आसानी से सुरंगें बना सकते हैं और अपनी सैन्य ताकत को छिपाकर सुरक्षित रख सकते हैं। इस वजह से ईरान लंबे समय तक मुकाबला करने की क्षमता रखता है। भले ही उस पर आर्थिक दबाव हो।

वो कहते हैं कि दुश्मन ज्यादा से ज्यादा सुरंग के मुहाने को ही नष्ट कर सकता है। लेकिन उस मलबे को हटाकर फिर से बाहर निकला जा सकता है। अगर दुश्मन की खुफिया जानकारी बहुत मजबूत हो, तो वह सुरंग के वेंटिलेशन को भी नष्ट कर सकता है, जिससे अंदर रहना बहुत मुश्किल हो जाता है। इतने सालों से मिसाइल और ड्रोन जमा करने के कारण, उन्होंने कुछ हथियार जरूर रिजर्व रखे होंगे। जरूरत पड़ने पर वे इन्हें सुरंगों से निकालकर हमला कर सकते हैं। हालांकि, इस तरीके से ईरान पूरी जीत हासिल नहीं कर सकता, लेकिन वह दुश्मन के लिए लगातार परेशानी बना रह सकता है।

ईरान अपने ड्रोनों से नुकसान पहुंचाने में सक्षम रहा है, जिनकी कीमत लगभग 20,000 डॉलर प्रति ड्रोन है, जबकि इजरायल की आयरन डोम प्रणाली द्वारा प्रत्येक की लागत कहीं अधिक है। इससे क्या निष्कर्ष निकलते हैं?

आप देख सकते हैं कि इस उपद्रव से निपटने में लागत-लाभ का अनुपात कितना है। इज़राइल और खाड़ी देश ईरान के ड्रोन का मुकाबला करने के लिए महंगे मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि ईरान के ड्रोन बनाने में कहीं अधिक सस्ते हैं। पहले इन सभी देशों ने वायु रक्षा तोपों का इस्तेमाल बंद कर दिया है। हमने ऑपरेशन सिंदूर में देखा कि पाकिस्तान से इतने सारे ड्रोन आए, फिर भी भारतीय वायु सेना के बुनियादी ढांचे को लगभग कोई नुकसान नहीं हुआ क्योंकि हमारे पास वायु रक्षा तोपें थीं।

मुझे सेवानिवृत्त हुए लगभग छह वर्ष हो गए हैं, लेकिन अब तक भारत में क्लोज-इन वेपन सिस्टम (CIWS) आ जाना चाहिए था, जो पुराने L-70 गनों की तुलना में शाहेद ड्रोनों को बेहतर ढंग से मार गिरा सकता है, और एक गोले की कीमत ड्रोन की कीमत का एक अंश है। CIWS स्मार्ट गोला-बारूद का उपयोग करता है, जिसमें लक्ष्य की दूरी से संबंधित जानकारी गोले में ही अंतर्निहित होती है।

CIWS में “स्मार्ट गोला-बारूद” इस्तेमाल होता है। इसमें टारगेट की दूरी और जानकारी पहले से ही गोले में सेट कर दी जाती है। जमीन पर लगा सिस्टम टारगेट की दूरी नापता है, गोली की स्पीड मापता है और फ्यूज (फटने का समय) को प्रोग्राम कर देता है। यह सब माइक्रोसेकंड में होता है। फिर गोली ड्रोन के पास जाकर फटती है, जैसे 12-बोर बंदूक से पक्षियों को मारते हैं।

इससे लागत का संतुलन हमारे पक्ष में आ जाता है। इसलिए हैरानी होती है कि ऐसे सिस्टम अभी तक बड़ी संख्या में क्यों नहीं लगाए गए। अमेरिका ने अफगानिस्तान के अपने बड़े एयरबेस जैसे बैग्राम में C-RAM सिस्टम लगाए थे, जो तालिबान के मोर्टार तक को हवा में ही नष्ट कर देते थे। ईरान के ड्रोन तो उससे बड़े होते हैं, इसलिए CIWS से उन्हें गिराना और भी आसान है।

भारत में सेना महत्वपूर्ण जगहों जैसे रिफाइनरी और सैन्य ठिकानों की रक्षा के लिए एयर डिफेंस गन लगाती है। ड्रोन सीधे मजबूत बंकर में खड़े विमान को नुकसान नहीं पहुंचा सकता, लेकिन रिफाइनरी के टैंक पर हमला कर आग लगा सकता है। इससे बड़ा नुकसान दिखाया जाता है, भले असली नुकसान कम हो। यही वजह है कि ईरान इस समय “धारणा की लड़ाई” भी लड़ रहा है। यानी असली नुकसान से ज्यादा दिखाना।

आगे चलकर इस स्थिति को लेकर आपकी क्या राय है?

अमेरिका तब ही पीछे हटेगा, जब उसकी अपनी जनता सरकार पर दबाव बनाती है। ऐसा पहले वियतनाम युद्ध के दौरान हुआ था। नेतृत्व पर दबाव डालने के दो मुख्य तरीके होते हैं:

सैनिकों की मौत

जब बड़ी संख्या में सैनिक मारे जाते हैं, तो देश के अंदर विरोध बढ़ता है। इसका उदाहरण 1983 बेरूत बैरक बम विस्फोट है, जहां एक आत्मघाती हमले में 240 से ज्यादा अमेरिकी मरीन मारे गए थे। इसके बाद अमेरिका को लेबनान से हटना पड़ा।

महंगाई बढ़ाना (ईंधन और सामान की कीमतें)

अगर पेट्रोल-डीजल और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाएं, तो आम जनता नाराज होती है और सरकार पर दबाव डालती है। ईरान पहले तरीके (सैनिकों की मौत बढ़ाना) में सफल नहीं हो पाया, इसलिए अब वह दूसरा तरीका अपना रहा है- यानी Strait of Hormuz को बंद करने की कोशिश। अगर यह समुद्री रास्ता बंद होता है, तो तेल की सप्लाई रुक सकती है और दुनिया भर में कीमतें बढ़ सकती हैं।

हालांकि, आधुनिक हथियारों से लैस नौसेना के जहाज, जिनमें क्लोज-इन वेपन सिस्टम (CIWS) और माइन स्वीपर होते हैं। वे दिन के समय इस रास्ते से सुरक्षित निकल सकते हैं, लेकिन असली समस्या तेल के टैंकर हैं। इन्हें बीमा (Insurance) की जरूरत होती है, जो Lloyd’s of London जैसी कंपनियां देती हैं। अभी इन कंपनियों ने या तो बीमा बंद कर दिया है या बहुत महंगा कर दिया है।

इसका असर यह हुआ कि शिपिंग खर्च बहुत बढ़ गया। कई टैंकर मालिक इंतजार करना बेहतर समझ रहे हैं। अंत में, ईरान के मिसाइल और ड्रोन का सबसे ज्यादा असर आम नागरिकों पर पड़ा है, क्योंकि इससे महंगाई और सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है।

आपके विचार से अमेरिका के उद्देश्य क्या हैं और इससे निकलने के संभावित रास्ते क्या हैं?

मेरे अनुसार, इस पूरे मामले में आदर्श स्थिति यह होती कि ईरान की परमाणु क्षमता पूरी तरह खत्म कर दी जाती। उसके मिसाइल और ड्रोन सिस्टम भी खत्म हो जाते और वहां सरकार (रिजीम) बदल जाती, क्योंकि साल की शुरुआत में ईरान में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे

अमेरिका और इजरायल की उम्मीद कम से कम यह रही होगी कि ईरान अपना व्यवहार बदले हिज़्बुल्लाह और हमास को समर्थन देना बंद करे। इजरायल के खिलाफ भड़काऊ बयान देना बंद करे।

परमाणु क्षमता के मामले में, वे उन्हें काफी हद तक पीछे धकेल सकते थे। मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं को बेअसर कर दिया गया है, हालांकि यह शून्य नहीं है। छोटी-मोटी मार करने की क्षमता हमेशा बनी रहेगी। सत्ता परिवर्तन के लिए जमीनी स्तर पर सैन्य बलों की आवश्यकता होगी।

अगर अमेरिका का लक्ष्य सिर्फ ईरान का व्यवहार बदलवाना है, न कि सरकार बदलना, तो ट्रंप कभी भी पीछे हट सकते हैं। ऐसी स्थिति में, शांति समझौता जल्दी भी हो सकता है, क्योंकि लक्ष्य सीमित है- सिर्फ व्यवहार बदलवाना, न कि पूरा शासन बदलना।

हाल के संघर्षों से भारत को क्या सीख मिली है, जिनमें रूस-यूक्रेन, ऑपरेशन सिंदूर और अब ईरान शामिल हैं?

हवाई युद्ध अक्सर ऐसे संघर्षों की शुरुआत करता है, लेकिन अकेले इससे पूरी जीत हासिल नहीं होती। असली सफलता तब मिलती है जब हवाई ताकत के साथ जमीनी सेना (ग्राउंड फोर्स) भी काम करे।

उदाहरण के लिए, Bangladesh Liberation War और Iraq War में सरकार बदलने (रेजीम चेंज) का काम जमीनी सेना ने किया, जबकि उन्हें हवाई ताकत का पूरा समर्थन मिला हुआ था। अगर सिर्फ हवाई हमले किए जाएं, तो उनका मकसद आमतौर पर दुश्मन के व्यवहार में बदलाव लाना होता है, पूरी जीत नहीं।

रूस-यूक्रेन युद्ध में रूसी वायु सेना हवाई श्रेष्ठता हासिल करने में सक्षम नहीं रही है और इसलिए उनकी जमीनी सेना भी बहुत सफल नहीं रही है। बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर दोनों ही मुख्य रूप से हवाई अभियान थे जिनका उद्देश्य पाकिस्तान में आतंकवाद के प्रायोजकों के रवैये में बदलाव लाना था, ताकि उन्हें यह संदेश दिया जा सके कि हम आपको कहीं भी पकड़ सकते हैं और भारत में आतंकवादी हमलों का आपको भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा। ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय वायु सेना की पाकिस्तान के कोने-कोने में पाकिस्तानी ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता का प्रदर्शन किया। जिसके जवाब में पाकिस्तानी वायु सेना जवाबी कार्रवाई करने में असमर्थ रही।

‘अगर इजरायल ने लेबनान और फिलिस्तीन में नागरिकों को बनाया निशाना तो करेंगे पलटवार’, IRGC ने दी चेतावनी

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का आज 25वां दिन है। इस बीच ईरान के आईआरजीसी ने इजरायल पर लेबनान और फिलिस्तीन में नागरिकों के खिलाफ व्यापक युद्ध अपराध करने के लिए मौजूदा परिस्थितियों का फायदा उठाने का आरोप लगाया है। ईरान की आईआरएनए समाचार एजेंसी के अनुसार आईआरजीसी ने कहा कि यदि ऐसे कृत्य जारी रहे, तो वह उत्तरी इजरायल और गाजा के निकटवर्ती क्षेत्र में इजरायली सैनिकों पर बिना किसी रोक-टोक के भारी मिसाइल और ड्रोन हमले करेगा। पढ़ें परी खबर।