आजादी का भुला दिया गया हीरो अल्लाह बख्श सूमरो, जिसके रहते मुश्किल था भारत का बंटवारा

सूमरो धर्म के नाम पर होने वाले बंटवारे के बेहद खिलाफ थे और उन्होंने ऐसा न हो इसके लिए अच्छा खासा जनसमर्थन भी जुटा लिया था।

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अल्लाह बख्श सूमरो को भारत और पाकिस्तान दोनों ने भुलाने का काम किया। Photo Source: Facebook/ Photo Archives of Pakistan

अल्लाह बख्श सूमरो आजादी से पहले का वो नाम था, जिसे भारत और पाकिस्तान दोनों ने ही भुला दिया है। इनका नाम न तो किताबों में है और न ही इतिहास की कहानियों में। सूमरो धर्म के नाम पर होने वाले बंटवारे के बेहद खिलाफ थे और उन्होंने ऐसा न हो इसके लिए अच्छा खासा जनसमर्थन भी जुटा लिया था। सामंती सिंधी परिवार में जन्में अल्लाह बख्श 1938 और 1942 में दो बार सिंध प्रांत के प्रधानमंत्री थे। लेकिन अपने सरल जीवन और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।

धार्मिक आधार पर बंटवारे का विरोध करने वाले सूमरो से मुस्लिम लीग और जिन्ना नफरत करते थे। उनका मानना था कि भारत एक देश बने जिसे संयुक्त राज्य भारत (United States of India) कहा जाए, जहां हिंदू और मुस्लिम मिलकर रहें। सांप्रदायिकता के सख्त विरोधी रहे सूमरो की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगता है कि खान अब्दुल गफ्फार खान और मौलाना आजाद भी उनके तर्क के समर्थक थे। यही वजह है कि स्वतंत्रता संग्राम में शामिल क्रांतिकारियों का एक बड़ा हिस्सा उनकी बात से सहमत था।

अंग्रेज भारत को आजाद तो करना चाहते थे कि लेकिन कई हिस्सों में बांटने के बाद। इसी वजह से उन्होंने सुविधा संपन्न मुसलमानों को मुस्लिम लीग बनाने में काफी सहयोग किया। इसमें अमीर जमींदार, कारोबारी और पेशेवर मुस्लिम लोग शामिल थे जो खुद को हिंदुस्तान के सभी मुसलमानों की आवाज कहते थे। मुस्लिम लीग ने 23 मार्च 1940 को लाहौर में मुसलमानों के लिए एक अलग आजाद देश की सिफारिश वाला प्रस्ताव पारित किया था।

इसके तुरंत बाद 27 से 30 अप्रैल 1940 के बीच अल्लाह बख्श सूमरो ने भी दिल्ली में देशभक्त मुसलमानों का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया था। इसका नाम आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस रखा गया था और इसमें पूरे देश से लगभग 75,000 लोग हिस्सा लेने पहुंचे थे। अंग्रेज सूमरो के आंदोलन से काफी नाराज थे और इसी वजह से उन्हें दी गई खान बहादुर की पदवी भी वापस ले ली गई थी। यही नहीं उन्हें सिंध के प्रधानमंत्री पद से भी हटा दिया गया था।

इतिहासकार केआर मलकानी और पीवी ताहिलरमानी की किताब ‘दि सिंध स्टोरी’ में सूमरो के जीवन के बारे में कई रोचक जानकारियां दी गईं हैं। सूमरो जब भी ट्रेन यात्रा करते थे तो हमेशा ऊपर की सीट लिया करते थे, जिससे कि नीचे की सीट पर ज्यादा से ज्यादा लोग बैठ सकें। एक बार उनके क्षेत्र शिकारपुर में बाढ़ आ गई तो उन्होंने बड़ी-बड़ी नालियां बनवाकर बाढ़ का पानी अपनी जमीनों की तरफ बहा दिया, जिससे अन्य लोगों के घर और जमीनें बच सकें।

14 मई, 1943 को शिकारपुर जाते समय ही कुछ अज्ञात लोगों ने उनकी हत्या कर दी थी। उस समय यह अफवाह थी कि मुस्लिम लीग ने उनकी प्रसिद्धि से घबराकर उनकी हत्या करवा दी थी। हालांकि सात दशक होने के बावजूद उनकी हत्या एक रहस्य ही बनी हुई है। उनकी मौत को उस समय कई समाचार पत्रों ने राष्ट्रीय आपदा कहा था। हालांकि तब के प्रमुख राजनीतिक दलों ने कभी भी उनकी हत्या को या उसकी जांच को महत्व नहीं दिया था।

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